गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

पुजा पाठ करने पर भी हम दुखी क्यो

संसार में जितने भी पूजा पाठी लोग है उनसे अगर पूँछा जाये कि आप कितने सुखी हैं? तो उनका जबाब यही होता है कि हम तो इतनी पूजा पाठ करते है फ़िर भी दुखी है और पडौसे में जो बिलकुल ही पूजा पाठ नही करता है वह बहुत सुखी है उसके पास हर चीज उपलबध है और उसे आसपास वाले सभी जानते है।
पूजा पाठ करने वाले लोग कई तरह की पूजा पाठ करते है कोई मन्दिर में जाता है,किसी ने अपने घर पर ही मन्दिर बना रखा है,कोई रामायण भागवत और तरह तरह के धार्मिक ग्रंथ पढता है कोई अपने गुरु को मानता है और गुरू की कही हुयी बात को लेकर चलता है कोई गुरु मंत्र को लगातार जपे जा रहा है कोई अपने सभी कामो को एक तरफ़ रखकर अपने में ही मस्त है और कोई समाधि लगा रहा है कोई ध्यान लगा रहा है कोई तीर्थ यात्रा में भटक रहा है कोई नदी का स्नान कर रहा है कोई जल चढा रहा है कोई प्रसाद बांट रहा है कोई अगरबत्ती जला रहा है कोई दीपक जलाकर हाथ जोड कर बैठा है,कोई किसी प्रकार से कोई किसी प्रकार से अपने को पूजा पाठ में लगाये है और कोई किसी में लेकिन सुख फ़िर भी नही मिल रहा है।जब जीवन में कष्ट संघर्ष आते हैं तो पूजा -पाठ ,मंदिर -गुरुद्वारा ,भगवान -देवी ,ज्योतिषी -तांत्रिक अधिक दिखाई देते हैं |हम जीवन में कष्टों का समाधान अक्सर वहां खोजते हैं जहाँ सीधा कष्ट का कोई मतलब नहीं होता |कष्ट -दुःख होने पर हम अपनी शक्ति बढाने ,कष्टों का कारण जान उन्हें हल करने की बजाय भगवान् की कृपा से उसे हटाने का प्रयास करते हैं पर अक्सर हमें असफलता मिलती है |बहुत प्रयास के बाद भी जब कोई अंतर नहीं आता तो हम अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं की इतनी पूजा –आराधना करते हैं किन्तु कोई लाभ नजर नहीं आता ,पता नहीं भगवान् है भी की नहीं ,या वह हमारी सुनता क्यों नहीं |हम तो रोज पूरे श्रद्धा से इतनी देर तक पूजा करते हैं |पर हमारे कष्ट कम होते ही नहीं |पाप करने वाले ,पूजा न करने वाले सुखी हैं और हम इतनी सदाचारिता से रहते हैं ,पूजा–पाठ करते हैं ,अपने घर में भगवान् को बिठाये हैं पर हम कष्ट ही कष्ट उठा रहे हैं |हमने अपने पिछले अंक में कुछ कारणों का विश्लेष्ण इस सम्बन्ध में किया है|


अधिकतर लोग भगवान् या देवी /देवता को मनुष्य मानकर चलते हैं जबकि वास्तविकता यह है की यह सब उर्जाये या शक्तियाँ हैं ,जिनके विशिष्ट गुणों के कारण हमने काल्पनिक रूप से उन्हें अपने जैसा मानकर ,अपने से जोड़ने के लिए उन्हें विशिष्ट आकृति ,विशिष्ट हथियार ,विशिष्ट रूप दिए हैं |इन्हें अपनी बात सुनाने के लिए इनके पद्धति के अनुसार ही पूजा ,अर्चना करनी होती है या भावनात्मक रूप से भी तब यह सुनती हैं जब आपकी भावना मीरा जैसी गहन हो जाए की कृष्ण को आना ही पड़े |यह उक्ति की “कलयुग केवल नाम अधारा “कष्टों -दुखों में फंसे होने पर पुकारने पर काम नहीं आती |आपकी पुकार में इतनी शक्ति होनी चाहिए की भगवान् नामक ऊर्जा आपसे जुड़ जाए |आपकी पूजा -अर्चना -साधना में इतनी शक्ति होनी चाहिए की सम्बंधित शक्ति का संपर्क आपके ऊर्जा से हो जाए |जब यह शक्ति संतुलन आपको कष्ट दे रहे समस्या के ऊर्जा से अधिक होगी तभी आपके कष्ट कम होंगे |भगवान् की आपसे जुडी शक्ति अगर कम हुई तो कष्ट कम नहीं होंगे |भगवान् की शक्ति सबसे बड़ी होती है पर महत्त्व यह रखता है की उसकी कितनी शक्ति आपसे जुडी है |इसे ही कहते हैं पुकार पर सुनना |जब अधिक शक्ति आपसे जुडती है तो वह शक्ति आपके मनोभावों के अनुसार क्रिया करती है और आपकी सफलता बढती है ,कार्य सफल होते हैं ,कष्ट कम होते हैं |
अधिकतर लोगों के कष्ट उनके भाग्य में भी नहीं होते ,अपितु इसके कारण उन्हें प्रभावित कर रहे नकारात्मक प्रभाव होते हैं |भाग्य तो ग्रहों ,नक्षत्रों के संयोग से उत्पन्न प्रभाव हैं |यह प्रभाव पूरा मिले तो कहते हैं की पूरा भाग्य मिल रहा |ऐसे में ज्योतिषी की सारी भविष्यवाणी सही होती है |पर कितने लोगों के लिए ज्योतिषी की भविष्यवाणी सही होती है ?,कुछ बाते सही हो जाती हैं और कुछ नहीं |अच्छी बातें कम सही होती हैं और बुरी बातें जितना बताते हैं उससे भी अधिक सामने आती हैं |ऐसा नकारात्मक प्रभावों के कारण होता है |इनके कारन ही आपके कष्ट बढ़ा जाते हैं |कारण यह होते हैं और लोग दोष भगवान् को देते हैं |भगवान् तो नहीं कहता की आप वास्तु दोष उत्पन्न करें ,आप पितरों को असंतुष्ट रखें ,आप भूत -प्रेत -आत्माओं को पूजें ,आप कुल देवता /देवी को भूल जाएँ |जब आप ऐसा करते हैं तो भगवान् को क्यों दोष दे रहे |किसी ने आप या आपके परिवार पर किसी प्रकार का अभिचार ,टोना -टोटका ,भूत -प्रेत भेज दिया ,आपकी किसी गलती से ब्रह्म -जिन्न -पिशाच आपके या आपके परिवार को प्रभावित करने लगा ,आपकी पूजा में इतनी शक्ति है नहीं की भगवान् की ऊर्जा आपसे इतनी जुड़े की इन शक्तियों को हटा सके तो यह आपको प्रभावित करेंगे ही |इसमें भगवान की कोई गलती नहीं |सच है की वह सर्वशक्तिमान है ,पर उसे पूरी शक्ति से आप बुलायेंगे तभी वह आएगा और आपसे जुड़ेगा |ब लोगों को बताया जाता है की आप पर या घर पर नकारात्मक उर्जा का प्रभाव है जिसके कारण कष्ट आ रहे हैं तो कुछ लोग यह भी कहते मिलते हैं की हम तो शिव ,हनुमान ,कृष्ण ,दुर्गा आदि की पूजा करते हैं रोज नियमित फिर हमें कष्ट क्यों है ,नकारात्मकता कैसे है |क्या यह भगवान् इसे नहीं हटा सकते ,या कोई तांत्रिक अभिचार कर रहा है तो क्यों ये देवी देवता रक्षा नहीं कर रहे |हमारे कष्ट क्या उन्हें दिखाई नहीं देते |क्यों वे हमारी नहीं सुन रहे |कुछ अंध श्रद्धालु अंक इसे पूर्व जन्म का दोष देकर अपने को संतुष्ट रखने का प्रयत्न करते हैं की यह हमारे पूर्व जन्म के दोष हैं जिससे कोई पूजा पाठ नहीं लग रहा |इन सब की बातों में जाकर जो देखने को मिला वह मन की जिज्ञासा को जानने का एक अजूब सा अनुभव ही कहा जा सकता है। पूजा पाठ का उद्देश्य अपने इष्ट को मानना होता है और जो अपने को किसी भी प्रकार के ईश्वर में लगाकर चल रहा है और उसे कोई ईश्वर से चाहत नही है केवल कर्म में विश्वास रखकर चल रहा है तो उसे फ़ल की प्राप्ति जरूर होती है। लेकिन जो पूजा किसी उद्देश्य विशेष से की जाती है उसके अन्दर अधिकतर फ़ल नही मिल पाते है और जो भी कार्य पूजा पाठ के प्रति किया जाता है वह बेकार का ही साबित होता है। इसके साथ ही पूजा पाठ का रूप जो अधिकतर सामने आया उसके अन्दर पूजा पाठ करने का मुख्य उद्देश्य लोगों का मानसिक डर भी देखने को मिला। अक्सर डर पैदा करने के लिये कई प्रकार की धारणायें समाज में चल रही है,वह समाज चाहे किसी भी जाति धर्म  देश और संस्कृति से जुडा हो,सभी में अपनी अपनी तरह की भावनायें लोगों के ह्रदय में निवास कर रही है।यह सब पूजा पाठ करने से क्या कोई फ़ल मिल सकता है और यह पूजा पाठ हम किसके कहने से कर रहे है,यह सब बातें समझने के लिये बहुत ही गहरे में जाना पडेगा।
   इस संसार में हर जीव को अपने अपने कर्मों का भुगतान करने के लिये जन्म लेना पडा है। कोई अपनी चाहत से जन्म लेकर इस संसार में नही आया है,प्रकृति का रूप अपने आप जन्म देता है और वही मौत को देता है। इस जन्म लेने और मरने के बीच की कहानी को ही जीवन का नाम दिया गया है। जब हम माता के पेट से जन्म लेते है तो परिवार सामने आता है,परिवार की प्राथमिक शिक्षायें हमारे दिलो दिमाग में घर कर जातीं है। लेकिन सभी बातें घर नही कर पाती है जैसे जैसे जीवन चलता है वैसे वैसे समय के अनुसार भी समाज की शिक्षायें स्कूल कालेज की शिक्षायें आदि भी जीवन में आती जाती हैं। इन शिक्षाओं के प्रति हम कभी अपने घर में और कभी बाहर की बातें सुनते है,कहते है,प्रतिक्रिया करते है,इन सब बातों के अन्दर और मिलने वाली शिक्षाओं के अन्दर जो मुख्य बातें होती है वे दिमाग में घर कर जाती है,किसी एक बात को बार बार कहा जाये तो वह बात भी दिमाग में घर कर जाती है काफ़ी समय तक भूली नही जा सकती है,जब कोई कारण अचानक सामने आता है तो वह बात जो पहले दिमाग में कफ़ी समय से घर कर गयी थी अचानक प्रकट होकर सामने आती है और हमारा दिमाग उसी बात की तरफ़ जाना शुरु हो जाता है। एक बार जब हम किसी बात की तरफ़ चले जाते है तो वह बात हमेशा के लिये भी याद रह जाती है। लेकिन जब किसी बात को बुद्धि से सोचा जाता है तो हर बात के दो पहलू मिलते है। एक तो किसी बात को मान लिया जाये और एक उस बात को नही माना जाये,अगर मान लिया जाता है तो उसके पीछे मान लेने के कारण भी देखने पडते है और नही माना जाता है तो उस बात के कारणो को खोजने की बात दिमाग में घूमती है। दिमाग किसी बात को जान लेने के लिये इसलिये और अधिक उतावला होता है क्योंकि हमने या तो उस बात को पहले कभी देखा या सुना नही है,और दूसरे अगर देखा और सुना है तो उससे कुछ भिन्नता होनी चाहिये। भिन्नता के लिये भी अपने को पहले उस पहली बात पर जाना पडेगा जो हमने देखी है,लेकिन कुछ अलग देखी है तो इसे भी अलग से देखने की चाहत दिमाग में पैदा होगी। हमारा दिमाग भूलने का आदी है,इसी बात का ख्याल भी दिमाग में आता है,जैसे हमारे साथ कोई आफ़त एक्सीडेंट आदि हुआ होता है जिस समय तक पीडा रहती है उस समय तक तो उस घटना का ज्यों का त्यों ब्यौरा दिमाग में रहता है लेकिन कालान्तर में जब सब कुछ ठीक होजाता है तो उस बात का दिमाग से निकलना धीरे धीरे शुरु हो जाता है,अक्सर को घटना हमारे दिमाग में घूमती है,और हम उस घटना से डरने लग जाते है,वही डर हमारे दिमाग में तब तक भरा रहता है जब तक कि उसका कोई अटल नियम हमारे पल्ले नही पड जाये। सन्यासियों के मुंह से एक बात सुनी जा सकती है कि "जा मौज कर भरोसा रख सब ठीक होगा",इतना सा वाक्य जीवन में आने वाले संकटों से अचानक दूर करने लगता है,मतलब हमे आसरा मिल गया होता है कि हमारे ऊपर कोई संकट इसलिये नही आ सकते है क्योंकि अमुक सन्यासी ने हमारे प्रति कह दिया है,इस बात और तब अधिक बल मिल जाता है जब उस सन्यासी के आसपास के माहौल को देखते है,कितनी भीड होती है सन्यासी किसी को देखने के लिये भी सामने नही आ पाते है,उनके आसपास कितने लोग घिरे रहते है,जितना अधिक सम्मोहन होता है उतना ही हमारे अन्दर विश्वास जमता चला जाता है।मैने के लाटरी सट्टा खेलने वाले से पूंछा कि वह पहले बहुत पूजा पाठ किया करता था,लेकिन आज तू शराब पीकर लाटरी को खेलता है,पहले तेरे पास अपनी साइकिल नही होती थी,आज तू बडी से बडी गाडी को कुछ नही समझता है। उसका एक जबाब सुनकर मुझे काफ़ी आश्चर्य हुआ कि वह शराब पीने का आदी नही है,लेकिन जुआ और लाटरी सट्टा आदि के लिये हिम्मत की जरूरत पडती है,वह केवल लाटरी खेलने के समय तक नशे में रहना चाहता है उसके बाद उसे नशे की कोई जरूरत नही पडती है,वह जब नशा कर लेता है तो उसका दिमाग एक ही बात पर निर्भर हो जाता है कि उसे जीतना है,लेकिन कभी कभी नशा कम होने से हार भी हो जाती है लेकिन नशे के अन्दर वह जरूर जीतता है,आखिर उस नशे के अन्दर कौन सी शक्ति है,जो उस व्यक्ति को आराम से जीतने के लिये आगे से आगे ले जाती है। उसका भी इस बात पर जबाब था कि जब नशा हो जाता है तो जो लोग दिमाग से जीतने के स्वप्न देखते है अपने अपने आकडे लगाते रहते है तब तक मैं मन चाहे नम्बर पर दांव लगा चुका होता हूँ,अक्सर दिमाग वाले लोग इतिहास को सामने रखकर लाटरी खेलते है मै कभी इतिहास को सामने रखकर लाटरी को नही खेलता हूँ,मेरे सामने तो आज का नम्बर होता है वह भी अचानक दिमाग में आया हुआ और उसी नम्बर पर मैं विश्वास करता हूँ और जीतता जाता हूँ,किसी भी नम्बर को मैं डर कर नही खेलता और न ही मुझे अलग अलग नम्बरों से खेलने की जरूरत होती है जो भी नम्बर सुबह से मेरे दिमाग में गूंजने लगता है उसे ही मैं अपने दिमाग में पक्का कर लेता हूँ मेरा दिमाग भटके नही इसके लिये मैं नशे का सहारा लेता हूँ। मन में समझ में आया कि लोग अपने दिमाग को बलवान बनाने के लिये और मानसिक शक्ति को स्थिर रखने के लिये शराब के नशे का प्रयोग करते है,लेकिन वे नशे वाले बेकार होते है जो जरा सी पीकर अपने मन के उद्गारों को गाली गलौज से दूर करते है। हर व्यक्ति के अन्दर किसी न किसी प्रकार का नशा होता जरूर है वह चाहे शराब से बिलकुल सम्बन्ध नही रखता हो लेकिन वह बिना नशे के तरक्की कर ही नही सकता है यह एक अटल दावा मैने कई लोगों के मुंह से सुना है। अगर किसी ने अपने जीवन को बडी शिक्षा के अन्दर लगा लिया है तो उसके अन्दर अपनी शिक्षा का नशा है कि मैं इतना पढा लिखा हूँ,किसी ने अधिक धन किसी भी प्रकार से कमा लिया है तो उसको अपने धन का नशा होता है कि मैं इतने पैसे वाला हूँ,किसी ने अपनी इज्जत को इतना अधिक प्राप्त कर लिया है कि वह अपने दिमाग से अपनी इज्जत के नशे को दूर नही कर पाता है। भगवान के प्रति जाने का नशा भी लोगों के अन्दर होता है,जब तक वे भगवान की पूजा पाठ नही कर लेंगे उन्हे एक अजीब सा डर लगा रहेगा,वह डर उन्हे उनके दिन भर के काम और रात की नींद को पूरी नही करने देगा,लेकिन अगर वे अपने पूजा पाठ के नशे को किसी प्रकार से समय काल और परिस्थिति के अनुसार कुछ समय के लिये नही कर पाते है तो उन्हे चैन नही आता है और दिमाग का भटकाव अधिक से अधिक पूजा पाठ की तरफ़ ही चलता रहता है।
 मेरे एक मित्र ने मुझे बताया  हमारे पास में एक काली के भक्त रहते है वे दिन भर तो किसी होटल में काम करते है लेकिन शाम को उनके यहां काली का दरबार जरूर लगता है। माता काली के नाम से लोग उनके पास आते है और जो भी उनकी मनोकामना होती है उसके अनुसार माता के पास आकर मांगते है,उन्हे कुछ मन्त्रों का ज्ञान है वे जब कोई उनके पास आकर अपनी फ़रियाद को करता है तो वे कुछ जाने हुये मंत्रों का उच्चारण करते है और फ़रियादी से कह देते है जाओ तुम्हारा काम हो जायेगा,फ़रियादी अपने स्थान पर चला जाता है और जब वह वापस आता है तो उसका सोचा गया काम पूरा हो जाता है। इस बात की सत्यता को समझने के लिये मैने उन सज्जन से कहा कि मै भी अपनी फ़रियाद को पूरा करने के लिये कुछ आपका साथ चाहता हूँ,तो उन्होने मुझे भी वही मंत्र दे दिया और कहा कि जब भी काम शुरु करो इस मंत्र का जाप कर लेना और अपने काम में लग जाना,मैने उनकी बात को पूरा माना और जब भी मै अपने काम को चालू करता उनके मंत्र को जरूर जाप कर लेता,मेरा काम भी पूरा हो गया तो उनसे मैने कहा कि इस मंत्र के कारण मेरा काम पूरा हो गया लेकिन इसके बीच में ऐसा कोई हादसा या चमत्कार नही हुआ जो मुझे समझ में आता कि मंत्र वाली देवी मेरे सामने आकर उस काम को पूरा कर गयीं हो,उन्होने जबाब दिया कि आप अपने दिमाग से काम करते है जो नौकरी करता है वह पूजा पाठ कम करता है कारण उसे चिन्ता नही होती है कि शाम को भोजन के लिये उसे भी धन की जरूरत पडेगी उसे पता है कि उसकी तन्खाह महिने के शुरु में मिलेगी और उसका काम चलने लगेगा,लेकिन जो लोग अपना काम करते है उनके सामने कोई मालिक नही होता है और इन्सान की आदत के अनुसार बिना मालिक के सहारे के उसे काम करने से डर लगता है कि कहीं किये जाने वाले काम में असफ़ल नही हो जाऊं,इस डर के कारण अधिकतर कामों के अन्दर इन्सान लगातार असफ़फ़लता की सोच रखने के कारण असफ़ल ही हो जाता है,लेकिन जब उसे सहारे के रूप में एक मंत्र मिल जाता है जो उसके दिमाग में यह भाव भर देता है कि अमुक आदमी का काम इस मंत्र ने सफ़ल कर दिया था तो यह मंत्र मेरे काम को भी सफ़ल करेगा,इस विश्वास से वह व्यक्ति अपने काम को करता रहता है और वह मंत्र की मालिकी से सफ़ल हो जाता है,मुझे उन काली भक्त का विचार समझ में आ गया था।
   कई बार हमने देखा है कि कई लोग धार्मिक स्थानों की तरफ़ अपना अधिक झुकाव रखते है,जब भी उनके ऊपर कोई आफ़त आती है तो वे अपने आप किसी न किसी धार्मिक स्थान की तरफ़ जाने का अपना मानस बना ही लेते है,और जब वे अपने धार्मिक स्थान से लौट कर आते है तो वे अधिकतर उनकी समस्या से दूर हो जाते है। इस बात के अन्दर एक बात समझ में आयी कि जब व्यक्ति एक ही दायरे में लगातार घूमता रहता है तो उसके आसपास के कार्यों और समझने वाले और नही समझने वाले लोगों का घेरा बना रहता है उसके दिमाग में वही रोजाना की बातें ही दिमाग में चलती रहती है,वही देखना वही सुनना और वही करना,लेकिन जैसे ही वह धार्मिक स्थान की तरफ़ जाता है उसका दिमाग जलवायु और अलग अलग प्रकार के लोगों से मिलने तथा अचानक दिमाग के अन्दर धर्म स्थान के धार्मिक वातावरण का प्रभाव पहले की चिन्ताओं को दूर कर देता है, इस प्रकार से दिमाग का बदलाव उसी प्रकार से होता है जैसे कि चलते हुये कम्पयूटर को रीफ़्रेस कर दिया जाये। अगर किसी प्रकार की पूजा पाठ को नही भी किया जाये और विश्वास को दिमाग में बैठा लिया जाये कि जो कार्य किया जायेगा वह जितनी उसकी कार्यक्षमता है उसके अनुसार पूरा जरूर होगा तो वह व्यक्ति उस काम का नशा लेकर अपने साथ चलने लगेगा,वह काम को करेगा और काम के अन्दर उस शराबी की तरह जरूर सफ़ल होगा,यह सब ऊर्जा का खेल है |देवी/देवता सब उर्जायें हैं |जो जितनी शक्ति से इन्हें जो दिखाता है उनसे वैसा करा लेता है |यह पूजा -साधना करने वालों की आँखों से ,उसके मनोभावों से सब देखती है |यह तब होता है जब वह व्यक्ति से जुडती हैं |मात्र पूजा करने ,माथा पटकने से यह नहीं देखती |इन्हें कुछ दिखाने के लिए ,इन्हें सुनाने के लिए इन्हें खुद से जोड़ना होता है और खुद से इन्हें जोड़ना आसान नहीं होता |जब आप इतना डूब जाएँ उनके भाव में की वह और आप एकाकार हो जाएँ तब वह आपसे जुड़ता है और तभी वह आपकी सुनता है |इसके पहले तक आप जितनी ऊर्जा उत्पन्न कर रहे और आपको जितनी ऊर्जा विपरीत प्रभावित कर रही इसके शक्ति संतुलन पर ही आपका जीवन चलता है |यह उपरोक्त कुछ कारण हैं जो लोगों की पूजा के अपेक्षित परिणाम में बाधक होते हैं |यद्यपि और भी कारण होते हैं पर अधिकतर कष्ट के और पूर्ण परिणाम न मिलने के ये कारण हैं |इन पर अगर ठीक से ध्यान दिया जाए तो लाभ बढ़ सकती है |लेकिन सितारों पर विश्वास जरूर रखना पडेगा।

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

सुर्य ग्रहण क्या आपकी कुंडली में भी ग्रहन दोष है,,?

जबसे यह वर्ष 2018 प्रारंभ हुआ है तब से ग्रहण का सिलसिला भी चल रहा है, पहले चंद्र ग्रहण और अब सूर्य ग्रहण, जो 16 फरवरी को रहेगा। जाहिर तौर पर ज्योतिष के दृष्टिकोण से यह समीकरण सही नहीं है लेकिन विज्ञान इन सभी घटनाओं को लेकर हमेशा उत्साहित रहता है।..कई मित्रों ने अनुरोध किया है की आप ग्रहण दोष पर भी कुछ कहें .इसी क्रम में आज कुछ चर्चा करते हैं 15 फरवरी को पड़ने वाला सूर्य ग्रहण साल का पहला सूर्य ग्रहण होगा।  जनवरी में पूर्णिमा के दिन पड़े चंद्र ग्रहण के बाद अमावस्या को सूर्य ग्रहण पड़ेगा।  यह सूर्य ग्रहण आंशिक है। यह ग्रहण दक्षिणी अमेरिका उरुग्वे और ब्राजील में देखा जाएगा। हालांकि कहा जा रहा है कि ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। सूर्य ग्रहण के 12 घंटे पहले सूतक लग जाते हैं और इस दौरान कुछ कामों को करने की मनाही होती है। यह सूर्य ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण होगा। भारतीय समयानुसार, यह सूर्य 15 फरवरी की रात 12 बजकर 25 मिनट पर शुरू होगा और सुबह चार बजे ग्रहण का मोक्ष होगा। लेकिन बताया जा रहा है 15 फरवरी को सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं दे.सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना ,धारण करना ,मान जाना आदि
.ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . .पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र  सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .अब ग्रहण क्या होता है ?राहु व केतु का सूर्य या चन्द्र के साथ युति करना आमतौर पर ग्रहण मान लिया जाता है .किन्तु वास्तव में सूर्य ग्रहण मात्र राहु से बनता है व चन्द्र ग्रहण केतु द्वारा .ज्योतिष में बड़े जोर शोर से इसकी चर्चा होती है .बिना सोचे समझे इस दोष के निवारण बताये जाने लगते हैं .बिना यह जाने की ग्रहण दोष बन रहा है तो किस स्तर का और वह क्या हानि जातक के जीवन में दे रहा है या दे सकता है .बात अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग १८ महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है .यानी दुनिया की एक तिहाई आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब कई ज्योतिषियों द्वारा राहु केतु की दृष्टि भी सूर्य चन्द्र पर हो तो ग्रहण दोष होता है .हम जानते हैं की राहु केतु अपने स्थान से पांच सात व नौवीं दृष्टि रखते हैं .यानी आधे से अधिक आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब ये आंकड़ा कम से कम मुझे तो विश्वसनीय नहीं लगता मित्रों .इसी लिए फिर से स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह  एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है ,और इस टर्मिनोलॉजी के अनुसार संसार के लगभग दस प्रतिशत से कम जातक ही ग्रहण दोष का कुफल भोगते हैं .हाँ आंकड़ा अब मेरी पसंद का बन रहा है. अन्य प्रकार की युतियाँ कुछ असर डाल सकती है जिनके बारे में आगे जिक्र करूँगा।किन्तु किसी भी भ्रमित करने वाले ज्योतिषी से सावधान रहें जो ग्रहण दोष के नाम पर आपको ठग रहा है .दोष है तो उपाय अवश्य है किन्तु यह बहुत संयम के साथ करने वाला कार्य है .मात्र  तीस सेकंड में टी .वी पर बिना आपकी कुंडली देखे ग्रहण दोष सम्बन्धी यंत्र आपको बेचने वाले ठगों से सचेत रहें ,शब्दों पर मित्रों से थोडा रिआयत चाहूँगा ,बेचने  वाले नहीं अपितु भेड़ने वाले महा ठगों से बचना दोस्तों.एक पाठक का पैसा भी बचा तो जो भी प्रयास आज तक ब्लॉग के जरिये कर रहा हूँ ,समझूंगा काम आया .   जैसा की हमें ज्ञात है सूर्य हमारी कार्य करने की क्षमता का ग्रह है,हमारे सम्मान ,हमारी प्रगति का कारक है यह जगतपिता है,इसी की शक्ति से समस्त ग्रह चलायमान है,यह आत्मा कारक और पितृ कारक है,पुत्र राज्य सम्मान पद भाई शक्ति दायीं आंख चिकित्सा पितरों की आत्मा शिव और राजनीति का कारक है..राहु के साथ जब भी यह ग्रहण दोष बनाता है तो देखिये इसके क्या परिणाम होते हैं राहु की आदत को समझने के लिये केवल छाया को समझना काफ़ी है। राहु अन्दरूनी शक्ति का कारक है,राहु सीमेन्ट के रूप में कठोर बनाने की शक्ति रखता है,राहु शिक्षा का बल देकर ज्ञान को बढाने और दिमागी शक्ति को प्रदान करने की शक्ति देता है,राहु बिजली के रूप में तार के अन्दर अद्रश्य रूप से चलकर भारी से भारी मशीनो को चलाने की हिम्मत रखता है,राहु आसमान में बादलों के घर्षण से उत्पन्न अद्रश्य शक्ति को चकाचौन्ध के रूप में प्रस्तुत करने का कारक होता है,राहु जड या चेतन जो भी संसार में उपस्थित है और जिसकी छाया बनती है उसके अन्दर अपने अपने रूप में अद्रश्य रूप में उपस्थित होता है।.राहु जाहिर रूप से बिना धड का ग्रह  है ,जिस के पास स्वाभाविक रूप से दिमाग का विस्तार है .यह सोच सकता है,सीमाओं के पार सोच सकता है .बिना किसी हद के क्योंकि यह बादल है ..जिस कुंडली में यह सूर्य को प्रभावित करता है वहाँ जातक बिना कोई सार्थक प्रयास किये ,कल्पनाओं के घोड़े  पर सवार रहता है .बार बार अपनी बुद्धि बदलता है .आगे बढने के लिए हजारों तरह की तरकीबों को आजमाता है किन्तु एक बार भी सार्थक पहल उस कार्य के लिए नहीं करता, कर ही नहीं पाता क्योंकि प्लान को मूर्त रूप देने वाला धड उसके पास नहीं है .अब वह खिसियाने लगता है .पैतृक  धन  बेमतलब के कामों में लगाने लगता है .आगे बड़ने की तीव्र लालसा के कारण चारों तरफ हाथ डालने लगता है और इस कारण किसी भी कार्य को पूरा ही नहीं कर पाता .हाथ में लिए गए कार्य को (किसी भी कारण) पूरा नहीं कर पाता ,जिस कारण कई बार अदालत आदि के चक्कर उसे काटने पड़ते हैं
.सूर्य की सोने जैसी चमक होते हुए भी धूम्रवर्णी  राहु के कारण उसकी काबिलियत समाज के सामने मात्र लोहे की रह जाती है. उसकी क्षमताओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता .अब अपनी इसी आग को दिल में लिए वह इधर उधर झगड़ने लगता है.पूर्व दिशा उसके लिए शुभ समाचारों को बाधित कर देती है .पिता से उसका मतभेद बढने लगता है .स्वयं को लाख साबित करने की कोशिश भी उसे परिवार की निगाह में सम्मान का हक़दार नहीं होने देती .घर बाहर दोनों जगह उसकी विश्वसनीयता पर आंच आने लगती है सूर्य के साथ राहु का होना भी पितामह के बारे में प्रतिष्ठित होने की बात मालुम होती है ,जातक के पास कानून से विरुद्ध काम करने की इच्छायें चला करती है,पिता की मौत दुर्घटना में होती है,या किसी दवाई के रियेक्सन या शराब के कारण होती है,या वीमारी सेजातक के जन्म के समय पिता को चोट लगती है,जातक को नर  सन्तान भी कठिनाई से मिलती है,पत्नी के अन्दर गुप चुप रूप से सन्तान को प्राप्त करने की लालसा रहती है,पिता के किसी भाई को जातक के जन्म के बाद मौत जैसी स्थिति होती है।.वहीँ दूसरी और केतु (जिस के पास सिर नहीं है ) से सूर्य की युति होने पर  जातक बिना सोचे समझे कार्य करने लगता है .यहां वहां मारा मारा फिरता है .बिना लाभ हानि की गणना किये कामों में स्वयं को उलझा देता है .लोगों के बहकावे में तुरंत आ जाता है . मित्र ही उसका बेवक़ूफ़ बनाने लगते हैं केतु और सूर्य का साथ होने पर जातक और उसका पिता धार्मिक होता है,दोनो के कामों के अन्दर कठिनाई होती है,पिता के पास कुछ इस प्रकार की जमीन होती है,जहां पर खेती नही हो सकती है,नाना की लम्बाई अधिक होती है,और पिता के नकारात्मक प्रभाव के कारण जातक का अधिक जीवन नाना के पास ही गुजरता है या नाना से ख़र्च में मदद मिलती है इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय  कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी  राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी ख़ास नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है. ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण  ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकारप की दुश्वारियों का कारण बनता है . अतः एक ज्योतिषी की जिम्मेदारी है की जब भी किसी कुंडली का अवलोकन करे तो इस दोष पर लापरवाही ना करे .उचित मार्गदर्शन द्वारा क्लाइंट को इस के उपचारों से परिचित कराये .किस दोष के कारण जातक को सदा जीवन में किन किन स्थितियों में क्या क्या सावधानियां रखनी हैं ताकि इस का बुरा प्रभाव कम से कम हो , इन बातों से परिचित कराये . यहां पर कुछ उपाय वता रहा हु जो आप कर सकते हैं अगर असल में आपकी कुंडली में ग्रहन  दोष हो तो पहले यह कुंडली दिखाकर जानकारी हासिल कर ले कोशिश करूँगा की कभी भविष्य में इन योगों को कुंडलियों का उदाहरण देकर बताऊँ .उपाय :- 1) यह योग जन्मपत्रिका के जिस भाव में हो, उतनी ही मात्रा में सूर्य के शत्रु ग्रहो (शनि, राहू और केतु) का समान ले, और ग्रहण अवधि में मध्यकाल में अपने सिर से सात बार एंटीक्लॉक वाइज उसारा करके किसी भी नदी के तेज बहते जल में प्रवाहित दे। जैसे की इस पत्रिका में यह युति सप्तम भाव में है तो इसलिए जातक या जातिका को  700 ग्राम जौ को दुघ का छींटा लगाकर 700 ग्राम सरसो का तेल, 700 ग्राम साबुत बादाम, 700 ग्राम लकड़ी के कोयले, 700 ग्राम सफ़ेद व काले तिल मिलेजुले, 7 नारियल सूखे जटावले और बजने वाले तथा 70 सिगरेट बगैर फ़िल्टर वाली ले। 
2) कम से कम 60 ग्राम का शुद्ध चांदी का हाथी जिसकी सूंड नीचे की और हो, अपने घर पर लाकर चांदी या स्टील की कटोरी में गंगाजल भरकर उसमे खड़ा करके अपने बेड रूम में रखें। ध्यान रखे की इस हाथी पर सूर्य की रौशनी न पहुँचे। 
3) सूर्य की किरणें सीधे अपने सिर पर न पड़ने दे अर्थात अपना सिर ढक कर रखें।
4) अपने पुश्तैनी मकान की दहलीज के नीचे चांदी का पतरा या तार बिछाए। 
5) राहु से सम्बंधित कोई भी वस्तु अपने घर पर न रखें और न ही उनका सेवन/ग्रहण करे। जैसे कि : नीला और सलेटी रंग, तलवार, अभ्रक, खोटे सिक्के (जो आज चलन में नही है), बंद घड़ियाँ, बारिश में भीगी लकड़ी, जंग लगा लोहा, ख़राब बिजली का समान, रद्दी, लकड़ी के कोयले, धुँआ, टूटे-फूटे खिलौने, टूटी-फूटी चप्पलें, टूटे-फूटे बर्तन, खली डिब्बे, टूटा हुआ शिक्षा, ससुराल पक्ष, मूली या इससे बनी  वस्तु, जौ या इससे बनी कोई वस्तु, नारियल (कच्चा या पक्का) या इससे बनी कोई भी वस्तु, नीले जीव, नीले फूल या नीले रंग के कोई भी वस्तु आदि।   
6) अपने घर की छत, सीढ़ियों के नीचे का स्थान और लेट्रिंग-बाथरूम सदा साफ़ रखें। 
7) लाल और नीले कलर का कॉम्बिनेशन या ये दोनों कलर अलग अलग कभी भी धारण न करे। 
8) अपने जीवन में कभी भी मांस-मदिरा, बीयर, तम्बाकू आदि का सेवन न करें। आशा करता हु आप को लेख पसंद आया होगा मित्रों आप भी अपनी कुंडली दिखाना चाहते हैं या अपनी समस्या का हल चाहते हैं तो आप समर्पक करें हमारी फीस हमारे bank ac में जमा करानी होगी अघिक जानकारी के लिए हमारे नम्वरो पर वात करें 7597718725-9414481324 आचार्य राजेश कुमार

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

: भाग्यशाली रत्न  या अमंगलकारी

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भाग्यशाली रत्न  या अमंगलकारी 
रत्नों के बारे में किताबों में सामग्री भरी पड़ी है | असली रत्न की पहचान से लेकर रत्नों के प्रयोग और प्रभाव दुष्प्रभाव का वर्णन किताबों में  दिया गया है | तक़रीबन हर जगह एक ही बात को घुमा फिराकर लिख दिया जाता हैं | पर सब कोरी बकवास और बे सिर पैर की बातें लिखी है  सबसे पहले जिन्हें रत्नों के विषय में सामान्य ज्ञान भी नहीं है 
उनके लिए किताबों में पढ़कर रतन खरीदना बहुत भारी पड़ सकता है क्योंकि किताबों में ऐसी बातें लिखी हुई है जो असली रतन को ना लैकर आप नकली रतन खरीदना ज्यादा पसंद करोगे जो रतन असली होते हैं वह प्रकृति उसमें कोई न कोई दोष जरूर छोड़ देती है जैसे कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत क्ट या रंग कहीं से हल्का या उस में कुछ ना कुछ होगा जो नकली रतन


 होगा वह चमकदार गहरे रंग का और एकदम से साफ जो आपको देखने में बहुत अच्छा लगेगा क्योंकि रत्नों को गर्म करके treatment की,या जाता है जिससे रतन चमकदार साफ ओर गहरे रंग में लाया जाता है ऐसा करने से रतन अपना असली कुदरती महत्त्व को खो  देते हैं 
: ब्रह्मांड में नौ ग्रह हैं जिनका महत्वपूर्ण प्रभाव जातक पर पड़ता है। इन ग्रहों से निकली रश्मियों को एकत्रित करने की क्षमता नवरत्नों में पाई जाती है, अतः ये रत्न ही प्रमुख रत्न हुए। अन्य रत्न अल्पमात्रा में इन रश्मियों को एकत्रित करने में सक्षम हैं, अतः वे उपरत्न कहलाए। प्रश्न: रत्न, उपरत्न, कृत्रिम रत्न व रंगीन कांच में क्या अंतर है? उत्तर: चारों में अंतर उनकी ग्रह रश्मियों को अवशोषित करने की क्षमता पर आधारित है। रत्न सब से अधिक रश्मियां ग्रहण करते हैं। उनके बाद उपरत्न और फिर कृत्रिम रत्न। रंगीन कांच न के बराबर रश्मियां ग्रहण करता है।  ओर कांच तो नुकसान भी कर सकता है अच्छे रत्नों का प्रभाव निश्चय ही अधिक होता है क्योंकि ये रत्न रश्मियों को ज्यों की त्यों अवशोषित करने में सक्षम होते ह प्रश्न: यदि कोई व्यक्ति अच्छा रत्न धारण करने में सक्षम नहीं हो तो क्या वह उपाय से वंचित रह जाएगा? उत्तर: जैसे कोई गरीब व्यक्ति अपना डाॅक्टरी इलाज नहीं करा पाता है वैसे ही वैदिक रत्न धारण करने में असमर्थ व्यक्ति रत्न के उपाय से वंचित रह जाता है। जिस प्रकार डाॅक्टरी इलाज में भी कम मूल्य की दवाइयां होती हैं जिनका सेवन कर या फिर परहेज या संयम द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार,असली रत्न कम कीमत में भी मील जाते हैं जिसका प्रभाव भी महंगे रत्नों जैसे ही होता है  प्रश्न: क्या रत्न को धातु विशेष में पहनना आवश्यक है? उत्तर: धातु रत्न की क्षमता को कम या अधिक कर देती है। अतः उपयुक्त धातु में ही रत्न धारण करना उचित है। जैसे नीलम, गोमेद व लहसुनिया पंचधातु में, मोती चांदी में, हीरा प्लैटिनम में व अन्य रत्न स्वर्ण में धारण करने चाहिए। प्रश्न: रत्न खो जाए, टूट जाए या उसमें दरार आ जाए तो क्या करना चाहिए? उत्तर: रत्न का टूटना या उसमें दरार आना अशुभ माना गया है। ऐसे में  नया, बड़ा तथा अच्छी गुणवत्ता का रत्न धारण करना चाहिए। यदि रत्न खो जाए तो इसे शुभ माना गया है। ऐसे में समझना चाहिए कि ग्रह दोष दूर हुआ। रत्न का पाना अशुभ है। माना जाता है कि दूसरे के ग्रह कष्ट पाने वाले को प्राप्त हो रहे हैं। रतन का दान लैना भी अशुभ माना जाता है प्रश्न: सवाए में रत्न पहनने का क्या अर्थ है? उत्तर: सवाए में रत्न पहनने का अर्थ है उसका निर्दिष्ट भार से अधिक होना। यदि पांच रत्ती का रत्न बताया गया हो तो उससे अधिक अर्थात साढ़े पांच, छह या सात रत्ती का रत्न धारण करना चाहिए। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि केवल सवा पांच रत्ती का रत्न ही धारण करना है, पौने छह रत्ती का नहीं। पौने छह रत्ती का रत्न लगभग सवा पांच कैरेट और सवा पांच रत्ती का पौने पांच कैरेट के बराबर होता है। अतः पौना या सवाया मापक इकाई पर निर्भर करता है।रती भी पक्की ओर कच्ची होती है  प्रश्न: कौन सा रत्न कब तक धारण करना चाहिए? उत्तर: कुछ रत्न जीवनपर्यंत पहन सकते हैं, कुछ रत्नों को समयानुसार परिवर्तित करना चाहिए, और कुछ रत्न आपको बिल्कुल नहीं पहनने चाहिए। यह आपकी कुंडली  में ग्रह स्थिति के अनुसार ही जाना जा सकता है। योगकारक या शुभस्थ ग्रहों के रत्न सर्वदा धारण किए जा सकते हैं। किंतु मारक या अशुभ स्थान में स्थित ग्रहों के रत्न धारण नहीं करने चाहिए। अन्य ग्रहों क रतन जन्मकुंडली के अनुसार चायन करने चाहिएे किसी भी रत्न को दूध में ना डालें. अंगूठी को जल से एक बार धोकर पहनें. रत्न को दूध में डालकर रात भर ना रखें. कई रत्न दूध को सोख लेते हैं और दूध के कण रत्नों में समा कर रत्न को विकृत कर देते हैं. अपने मन की संतुष्टि के लिए अपने ईष्ट देवी की मूर्ति से स्पर्श करा कर रत्न धारण कर सकते हैं.असल में रत्न स्वयं सिद्ध ही होते है। रत्नों में अपनी अलग रश्मियाँ होती है और कुशल ज्योतिष ही सही रत्न की जानकारी देकर पहनाए तो रत्न अपना चमत्कार आसानी से दिखा देते है। माणिक के साथ मोती, पुखराज के साथ मोती, माणिक मूँगा भी पहनकर असीम लाभ पाया जा सकता है। फिर भी किसी कुशल ज्योतिष की ही सलाह लें तभी इन रत्नों के लाभ  पा सकते है। कुछ लोग सोचते हैं की रतन पहनते ही चमत्कार हो जाएगा ऐसा सोचना मुर्खतापूर्ण है रतन 10-या15दिन पहनने के वाद सोचते हैं यह रतन तो वेकार  है कोई लाभ नहीं हुआअपने लक्ष्य के अनुसार उनका लाभ प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये रत्न जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते किस प्रकार हैं। हम अपने आस-पास व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रत्न पहने हुए देखते हैं। ये रत्न वास्तव में कार्य कैसे करते हैं और हमारी जन्मकुंडली में बैठे ग्रहों पर क्या प्रभाव डालते हैं और किस व्यक्ति को कौन से विशेष रत्न धारण करने चाहिये, ये सब बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। रत्नों का प्रभाव: रत्नों में एक प्रकार की दिव्य शक्ति होती है। वास्तव में रत्नों का जो हम पर प्रभाव पड़ता है वह ग्रहों के रंग व उनके प्रकाश की किरणों के कंपन के द्वारा पड़ता है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने अपने प्रयोगों, अनुभव व दिव्यदृष्टि से ग्रहों के रंग को जान लिया था और उसी के अनुरूप उन्होंने ग्रहों के रत्न निर्धारित किये। जब हम कोई रत्न धारण करते हैं तो वह रत्न अपने ग्रह द्वारा प्रस्फुटित प्रकाश किरणों को आकर्षित करके हमारे शरीर तक पहुंचा देता है और अनावश्यक व हानिकारक किरणों के कंपन को अपने भीतर सोख लेता है। अतः रत्न ग्रह के द्वारा ब्रह्मांड में फैली उसकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराने में एक विशेष फिल्टर का कार्य करते हैं।जितने भी रत्न है वे सब किसी न किसी प्रकार के पत्थर है। चाहे वे पारदर्शी हो, या अपारदर्शी, सघन घनत्व के हो या विरल घनत्व के, रंगीन हो या सादे…। और ये जितने भी पत्थर है वे सब किसी न किसी रासायनिक पदार्थों के किसी आनुपातिक संयोग से बने हैं। विविध भारतीय एवं विदेशी तथा हिन्दू एवं गैर हिन्दू धर्म ग्रंथों में इनका वर्णन मिलता है।यहां एक ओर व साफ करुंगा की रतन ओर उपरत्नों की न रसयानिक आनुपातिका अलग होती है वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है।
वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं।
प्राचीन संहिता ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है, उसमें एकल तत्व मात्र 108 ही बताए गए हैं। इनसे बनने वाले यौगिकों एवं पदार्थों की संख्या 39000 से भी ऊपर बताई गई हैं। इनमें कुछ एक आज तक या तो चिह्नित नहीं हो पाए है, या फिर अनुपलब्ध हैं। इनका विवरण, रत्नाकर प्रकाश, तत्वमेरू, रत्न वलय, रत्नगर्भा वसुंधरा, रत्नोदधि आदि उदित एवं अनुदित ग्रंथों में दिया गया है।मैंने अपने अनुभव में देखा है की 80 % लोगों ने गलत रत्न डाला होता है । ध्यान रहे की अगर बुरे घरों के रत्न डाले जाएँ तो वो नुक्सान भी कर सकते हैं । अति आवश्यक है की मारक घरों के रत्न न डाले जाएँ क्योंकि उनसे नुक्सान हो सकता है । जहाँ तक हो सके पाप ग्रहों के रत्नों से बचना चाहिए क्योंकि वह नुक्सान कर सकते हैं और वह नुक्सान सेहत, कारोबार, शादी किसी भी क्षेत्र में हो सकता है ।  मित्रों अगर आप अपनी कुंडली दिखाकर रतन पहनना चाहतें हैं या रतन रैना चाहते हैं या कुंडली वनवाना चाहते हैं तो समर्पक करें  आचार्य राजेश

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

तारे और ग्रह

 रात में आकाश में कई पिण्ड चमकते रहते हैं, इनमें से अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं और एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा (Star) कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्ड के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे – यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है जिसका अर्थ इधर-उधर घूमने वाला है। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया।
हमारे लिये आकाश में सबसे चमकीला पिण्ड सूरज है, फिर चन्द्रमा और उसके बाद रात के तारे या ग्रह। तारे स्वयं में एक सूरज हैं। ज्यादातर, हमारे सूरज से बड़े ओर चमकीले, पर इतनी दूर हैं कि उनकी रोशनी हमारे पास आते आते बहुत क्षीण हो जाती है इसलिये दिन में नहीं दिखायी पड़ते पर रात में दिखायी पड़ते हैं। कुछ प्रसिद्ध तारे इस प्रकार हैं:
सबसे प्रसिद्ध तारा, ध्रुव तारा (Polaris या North star) है। यह इस समय पृथ्वी की धुरी पर है इसलिये अपनी जगह पर स्थिर दिखायी पड़ता है। ऐसा पहले नहीं था या आगे नहीं होगा। ऐसा क्यों है, इसके बारे में आगे चर्चा होगी।
तारों में सबसे चमकीला तारा व्याध (Sirius) है। इसे Dog star भी कहा जाता है क्योंकि यह Canis major(बृहल्लुब्धक) नाम के तारा समूह का हिस्सा है।
मित्रक (Alpha Centauri), नरतुरंग (Centaurus) तारा समूह का एक तारा है। यदि सूरज को छोड़ दें तो तारों में यह हमसे सबसे पास है। प्रकाश की किरणें 1 सेकेन्ड मे 3x(10)8 मीटर की दूरी तय करती हैं। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जो कि प्रकाश की किरणें एक साल में तय करती हैं। इसकी हमसे दूरी लगभग 4.3 प्रकाश वर्ष है। वास्तव में यह एक तारा नहीं है पर तीन तारों का समूह है जो एक दूसरे के तरफ चक्कर लगा रहें हैं, इसमें Proxima Centauri हमारे सबसे पास आता है।
ग्रह और चन्द्रमा, सूरज नहीं हैं। यह अपनी रोशनी में नहीं चमकते पर सूरज की रोशनी को परिवर्तित करके चमकते हैं। तारे टिमटिमाते हैं पर ग्रह नहीं। तारों की रोशनी का टिमटिमाना, हवा में रोशनी के अपवर्तन (refraction) के कारण होता है। यह तारों की रोशनी पर ही होता है क्योंकि तारे हमसे बहुत दूर हैं और इनके द्वारा आती रोशनी की किरणें हम तक पहुंचते पहुंचते समान्तर हो जाती हैं पर ग्रहों कि नहीं।प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
पहले के ज्योतिषाचार्य वास्तव में उच्च कोटि के खगोलशास्त्री थे और अपने देश के खगोलशास्त्री दुनिया में सबसे आगे। अपने देश में तो ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ चक्कर लगाती हैप्राचीन भारत में अन्य प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:
याज्ञवल्क्य ईसा से दो शताब्दी पूर्व हुऐ थे। उन्होने यजुर्वेद पर काम किया था। इसलिये यह कहा सकता है कि अपने देश ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ घूमती है। यूरोप में इस तरह से सोचना तो 14वीं शताब्दी में शुरु हुआ।
आर्यभट्ट (प्रथम) (476-550) ने 'आर्य भटीय' नामक ग्रन्थ की रचना की। इसके चार खंड हैं– गीतिकापाद, गणितपाद, काल क्रियापाद, और गोलपाद। गोलपाद खगोलशास्त्र (ज्योतिष) से सम्बन्धित है और इसमें 50 श्लोक हैं। इसके नवें और दसवें श्लोक में यह समझाया गया है कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है।
भास्कराचार्य (1141-1185) ने 'सिद्धान्त शिरोमणी' नामक पुस्तक चार भागों में लिखी है– पाटी गणिताध्याय या लीलावती (Arithmetic), बीजागणिताध्याय (Algebra), ग्रह गणिताध्याय (Astronomy), और गोलाध्याय। इसमें प्रथम दो भाग स्वतंत्र ग्रन्थ हैं और अन्तिम दो सिद्धांत शिरोमणी के नाम से जाने जाते हैं। सिद्धांत शिरोमणी में पृथ्वी के सूरज के चारो तरफ घूमने के सिद्धान्त को और आगे बढ़ाया गया है।
यूरोप में खगोल शास्त्र
यूरोप के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:
टौलमी (90-168) नाम का ग्रीक दर्शनशास्त्री दूसरी शताब्दी में हुआ था। इसने पृथ्वी को ब्रम्हाण्ड का केन्द्र माना और सारे पिण्डों को उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हुये बताया। इस सिद्धान्त के अनुसार सूरज एवं तारों की गति तो समझी जा सकती थी पर ग्रहों की नहीं।
कोपरनिकस (1473-1543) एक पोलिश खगोलशास्त्री था, उसका जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ। यूरोप में सबसे पहले उसने कहना शुरू किया कि सूरज सौरमंडल का केन्द्र है और ग्रह उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हैं।
केपलर (1571-1630) एक जर्मन खगोलशास्त्री था, उसका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था। वह गैलिलियो के समय का ही था। उसने बताया कि ग्रह सूरज की परिक्रमा गोलाकार कक्षा में नहीं कर रहें हैं, उसके मुताबिक यह कक्षा अंड़ाकार (Elliptical) है। यह बात सही है।
गैलिलियो (1564-1642) एक इटैलियन खगोलशास्त्री था उसे टेलिस्कोप का आविष्कारक कहा जाता है पर शायद उसने बेहतर टेलिस्कोप बनाये और सबसे पहले उनका खगोलशास्त्र में प्रयोग कियाटौलमी के सिद्धान्त के अनुसार शुक्र ग्रह पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है और वह पृथ्वी और सूरज के बीच रहता है इसलिये वह हमेशा बालचन्द्र (Crescent) के रूप में दिखाई देगा। कोपरनिकस के मुताबिक शुक्र सारे ग्रहों की तरह सूरज के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है इसलिये चन्द्रमा की तरह उसकी सारी कलायें (phases) होनी चाहिये। गैलिलियो ने टेलिस्कोप के द्वारा यह पता किया कि शुक्र ग्रह की भी चन्द्रमा की तरह सारी कलायें होती हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि ग्रह – कम से कम शुक्र तो – सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं। गैलिलियो ने सबसे पहले ग्रहों को सूरज का चक्कर लगाने का प्रयोगात्मक सबूत दिया। पर उसे इसका क्या फल मिला। चर्च ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह बात ईसाई धर्म के विरूद्ध है और गैलिलियो को घर में नजरबन्द कर दिया गया।भौतिक शास्त्र में हर चीज देखी नहीं जा सकती है और किसी बात को सत्य केवल इसलिये कहा जाता है कि उसको सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जा सकता है। यदि पृथ्वी को सौरमंडल का केन्द्र मान लिया जाय तो किसी भी तरह से इन ग्रहों की गति को नहीं समझा जा सकता है पर यदि सूरज को सौरमंडल का केन्द्र मान लें तो इन ग्रहों और तारों दोनों की गति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। इसलिए यह बात सत्य मान ली गयी कि सूरज ही हमारे सौरमंडल के केन्द्र में है जिसके चारों तरफ पृथ्वी एवं ग्रह घूम रहे हैं। Iपृथ्वी की गतियॉं
हमारी पृथ्वी की बहुत सारी गतियां हैं:
पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक चक्कर लगा रही है। इसलिये दिन और रात होते हैं।
पृथ्वी सूरज के चारों तरफ एक साल में एक चक्कर लगाती है। यदि हम उस तल (plane) की कल्पना करें जिसमें पृथ्वी और सूरज का केन्द्र, तथा उसकी परिक्रमा है तो पायेंगे कि पृथ्वी की धुरी, इस तल से लगभग साढ़े 23 डिग्री झुकी है पृथ्वी के धुरी झुके रहने के कारण अलग-अलग ऋतुयें आती हैं। हमारे देश में गर्मी के दिनों में सूरज उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है और जाड़े में दक्षिणी गोलार्द्ध में चला जाता है। यानी कि साल के शुरू होने पर में सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है पर वहां से चलकर उत्तरी गोलार्द्ध और फिर वापस दक्षिणी गोलार्द्ध के उसी विन्दु पर पहुंच जाता है।
पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और पृथ्वी की धुरी लगभग 25700 साल में एक बार घूमती है। इस समय हमारी धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है और दूसरे तारे घूमते दिखाई देते हैं। हजारों साल पहले हमारी धुरी न तो ध्रुव तारा पर थी और न हजारों साल बाद यह ध्रुव तारा पर होगी। तब ध्रुवतारा भी रात में पूरब की तरफ से उदय होगा और पश्चिम में अस्त होता दिखायी देगा।
हमारा सौरमंडल एक निहारिका में है जिसे आकाश गंगा कहा जाता है। इसका व्यास लगभग 1,00,000  प्रकाश वर्ष है। हमारी पृथ्वी आकाश गंगा के केन्द्र से लगभग 30,000 प्रकाश वर्ष दूर है और हमारा सौरमंडल भी इस आकाश गंगा के चक्कर लगा रहा है और हमारी पृथ्वी भी उसके चक्कर लगा रही है।
हमारी आकाश गंगा और आस-पास की निहारिकायें भी एक दूसरे के पास आ रही हैं। यह बात डाप्लर सिद्धान्त से पता चलती है। हमारी पृथ्वी भी इस गति में शामिल है।
मुख्य रूप से हम पृथ्वी की पहली और दूसरी गति ही समझ पाते हैं, तीसरी से पांचवीं गति हमारे जीवन से परे है। वह केवल सिद्धान्त से समझी जा सकती है, उसे देखा नहीं जा सकता है। हमारे विषय के लिये दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।तारा समूह
ब्रम्हाण्ड में अनगिनत तारे हैं और अनगिनत तारा समूह। कुछ चर्चित तारा समूह इस प्रकार हैं:सप्त ऋषि (Great/ Big bear or Ursa Major): यह उत्तरी गोलार्ध के सात तारे हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।ध्रुवमत्स्य/ अक्षि (Little Bear or Ursa Minor): यह सप्त ऋषि के पास उसी शक्ल का है इसके सबसे पीछे वाला तारा ध्रुव तारा है।कृतिका (कयबचिया) Pleiades: पास-पास कई तारों का समूह है हमारे खगोलशास्त्र में इन्हें सप्त ऋषि की पत्नियां भी कहा गया है।
मृगशीर्ष (हिरन- हिरनी) Orion: अपने यहां इसे हिरण और ग्रीक में इसे शिकारी के रूप में देखा गया है पर मुझे तो यह तितली सी लगती है।बृहल्लुब्धक (Canis Major): इसकी कल्पना कुत्ते की तरह की गयी पर मुझे तो यह घन्टी की तरह लगता है। व्याध (Sirius) इसका सबसे चमकीला तारा है। अपने देश में इसे मृगशीर्ष पर धावा बोलने वाले के रूप में देखा गया जब कि ग्रीक पुराण में इसे Orion (शिकारी) के कुत्ते के रूप में देखा गया।
शर्मिष्ठा (Cassiopeia): यह तो मुझे कहीं से सुन्दरी नहीं लगती यह तो W के आकार की दिखायी पड़ती है और यदि इसके बड़े कोण वाले भाग को विभाजित करने वाली रेखा को उत्तर दिशा में ले जायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचेगी।महाश्व (Pegasus): इसकी कल्पना अश्व की तरह की गयी पर यह तो मुझे टेनिस के कोर्ट जैसा लगता है।
जाहिर है मैं इन सब तारा समूह के सारे तारे देख कर आकृतियों कि कल्पना नहीं कर रहा हूं, पर इन तारा समूह के कुछ खास तारों को ले कर ही कल्पना कर रहा हूं।
राशियां (Signs of Zodiac)
यह तो थे आकाश पर कुछ मुख्य तारा समूह। इन सब का नाम हमने कभी न कभी सुना है। इनके अलावा बारह तारा समूह जिन्हें राशियां कहा जाता है उनका नाम हम अच्छी तरह से जानते हैं। इन सब को छोड़ कर, किसी तारा समूह के लिये तो खगोलशास्त्र की पुस्तक ही देखनी पड़ेगी। बारह तारा समूह, जिन्हें राशियां कहा जाता है, उनके नाम तो हम सब को मालुम हैं पर साधरण व्यक्ति के लिये इन्हें आकाश में पहचान कर पाना मुश्किल है। यह बारह राशियां हैं,मेष से लेकर मीन तकइन 12 तारा समूहों को ही क्यों इतना महत्व दिया गया? इसके लिये पृथ्वी की दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।
यदि पृथ्वी, सूरज के केन्द्र और पृथ्वी की परिक्रमा के तल को चारो तरफ ब्रम्हाण्ड में फैलायें, तो यह ब्रम्हाण्ड में एक तरह की पेटी सी बना लेगा। इस पेटी को हम 12 बराबर भागों में बांटें तो हम देखेंगे कि इन 12 भागों में कोई न कोई तारा समूह आता है। हमारी पृथ्वी और ग्रह, सूरज के चारों तरफ घूमते हैं या इसको इस तरह से कहें कि सूरज और सारे ग्रह पृथ्वी के सापेक्ष इन 12 तारा समूहों से गुजरते हैं। यह किसी अन्य तारा समूह के साथ नहीं होता है इसलिये यह 12 महत्वपूर्ण हो गये हैं। इस तारा समूह को हमारे पूर्वजों ने कोई न कोई आकृति दे दी और इन्हें राशियां कहा जाने लगा मित्रों यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।
विषुव अयन (precession of equinoxes)
विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग 20 मार्च तथा 23 सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।
विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी 25,700 साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।
पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 25,700 साल में एक बार घूमती है। वह 1/12वें हिस्से को 2141 या लगभग 2150  साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से 1650 साल पहले (1650BC) से, ईसा के 500 साल बाद (500 AD) तक लगभग 2150 साल रहा। अलग-अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसीलिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के 500 साल बाद (500 AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है – तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।
ईसा के 500 साल (500 AD) के 2150 साल बाद तक यानि कि 27वीं शताब्दी (2650 AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति ‘This is the dawning age of Aquarius’ का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते – ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।
विषुव अयन (precession of equinoxes)
विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग 20 मार्च तथा 23 सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।
विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी 25,700 साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।
पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 25,700 साल में एक बार घूमती है। वह 1/12वें हिस्से को 2141 या लगभग 2150  साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से 1650 साल पहले (1650BC) से, ईसा के 500 साल बाद (500 AD) तक लगभग 2150 साल रहा। अलग-अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसीलिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के 500 साल बाद (500 AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है – तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।
ईसा के 500 साल (500 AD) के 2150 साल बाद तक यानि कि 27वीं शताब्दी (2650 AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति ‘This is the dawning age of Aquarius’ का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते – ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।पुराने समय के ज्योतिषाचार्य बहुत अच्छे खगोलशास्त्री थे।पर समय के वदलते कुछ लोगो ने उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि किसी व्यक्ति के पैदा होने के समय सूरज जिस राशि पर होगा, उस आकृति के गुण उस व्यक्ति के होंगे। इसी हिसाब से उन्होंने राशि फल निकालना शुरू कर दिया। हालांकि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि आप ज्योतिष को उसी के तर्क पर परखें, तो भी राशी फल  गलत बैठती है।
यदि ज्योतिष का ही तर्क लगायें तो – विषुव अयन के समय सूरज की स्थिति बदल जाने के कारण – जो गुण ज्योतिषों ने मेष राशि में पैदा होने वाले लोगों को दिये थे वह अब मीन राशि में पैदा होने वाले व्यक्ति को दिये जाने चाहिये। यानी कि, हम सबका राशि फल एक राशि पहले का हो जाना चाहिये

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अंकों का खेल अंक ज्योतिष



       मित्रों आज बात करते हैं अंक ज्योतिष        की अंक विद्या पर बात करने से पहले         हम लोग ओमेन नाम की फिल्म की चर्चा       करेंगे।
डेमियन: ओमेन – फिल्म
1976 में एक फिल्म आयी थी जिसका नाम ओमेन (Omen) था। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार की है कि एक अमेरिकन राजनयिक (Diplomat) के पुत्र की म़ृत्यु हो जाती है और उसकी जगह एक दूसरा बच्चा रख दिया जाता है। इस बच्चे का नाम डेमियन (Damien) है। यह बच्चा वास्तव में एक शैतान का बच्चा है और आगे चलकर इसके एन्टीक्राइस्ट (Antichrist) बनने की बात है। यह बात बाइबिल की एक भविष्यवाणी में है। कुछ लोगों को पता चल जाता है कि यह शैतान का बच्चा है और उसे मारने का प्रयत्न किया जाता है पर पुलिस जिसे नहीं मालुम कि वह शैतान का बच्चा है, उसे बचा लेती है। यह फिल्म यहीं पर समाप्त हो जाती है।
इस फिल्म के बाद, 1978 में दूसरी फिल्म Damien: Omern II नाम से आयी। यह डैमियन के तब की कहानी है, जब वह 13 साल का हो जाता है। 1981 में इस सीरीज में तीसरी फिल्म Oemn III: The Final Conflict आयी। इस सिरीस की चौथी फिल्म टीवी के लिये 1991 में Omen IV : The Awakening के नाम से बनी। इन फिल्मों में यह महत्वपूण है कि डेमियन के शैतान का बच्चा होने की बात कैसे पता चली।
डेमियन के सर की खाल (Scalp) पर बालों से छिपा 666 अंक लिखा था। इस नम्बर को शैतान का नम्बर कहा जाता है। इससे पता चला कि यह शैतान का बच्चा है। पर क्या आप जानते हैं कि इस नम्बर को क्यों शैतान का नम्बर क्यों कहा जाता है। चलिये कुछ अंक लिखने के इतिहास के बारे में जाने, जिससे यह पता चलेगा।
अंक लिखने का इतिहास
अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को 5 का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।
नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें 1,2,3 आदि कहा गया और एक चिन्ह 0 भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया। फिर वहां से 16वीं शताब्दी के लगभग पाश्चात्य देशों में गया, इसलिये इसे अरेबिक अंक कहा गया। वास्तव में इसका नाम हिन्दू अंक होना चाहिये था। यह नयी अंक प्रणाली जब तक आयी तब तक वर्णमाला के अक्षरों और अंकों के बीच में सम्बन्ध जुड़ चुका था। जिसमें काफी कुछ गड़बड़ी और उलझनें (Confusion) पैदा हो गयीं।
इस कारण सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई कि किसी भी शब्द के अक्षरों से उसका अंक निकाला जाने लगा और उस शब्द को उस अंक से जोड़ा जाने लगा। कुछ समय बाद गड़बड़ी और बढ़ी। उस अंक को वही गुण दिये जाने लगे जोकि उस शब्द के थे। यदि वह शब्द देवी या देवता का नाम था तो उस अंक को अच्छा माना जाने लगा। यदि वह शब्द किसी असुर या खराब व्यक्ति का था तो उस अंक को खराब माना जाने लगा। यहीं से शुरू हुई अंक विद्या: इसका न तो कोई सर है न तो पैर, न ही इसका तर्क से सम्बन्ध है न ही सत्यता से।
666 – शैतान का नम्बर
नीरो एक रोमन बादशाह हुआ था। वह बहुत क्रूर था लेकिन कोई यह खुले तौर पर नहीं कह सकता था। उसके नाम के अक्षरों का अंक 666 था। इसलिये इसे शैतान का अंक कहा जाने लगा इस प्रचलित अंक ज्योतिष में व्यक्ति की जन्मतिथि (ईसवी कलेंडर के अनुसार) के अंकों को जोड़कर एक मूलांक बना दिया जाता है और फिर उसे आधार बनाकर अधकचरा भविष्य बाँच दिया जाता है। इसी तरह अंग्रेजी के अक्ष्ररों (ए, बी, सी, डी आदि) को एक एक अंक दिया है. और लोगों के नाम के अंग्रेजी अक्षरों के अंकों के योग से उसका मूलांक निकाला जाता है. फिर उसी आधार पर उसका भी भविष्य बाँच दिया जाता है।अंक ज्योतिष ईसवी कलेंडर की तिथि के अनुसार चलता है जिसका एक सौर वर्ष मापने के अलावा कोई सार्वभौमिक आधार नहीं है। समय के अनंत प्रवाह में ईसवी कलेंडर मात्र 20 शताब्दी पुराना है। जिसमें अचानक एक दिन को 1 जनवरी लेकर वर्ष की शुरुआत कर दी गयी और शुरु हो गया 1 से 9 अंकों की श्रेणी में जातक को बाँटने का सिलसिला। यह सर्वविदित है कि इतिहास की धारा में अनेक सभ्यताओं तथा राजाओं ने अपने अपने कलेंडर विकसित किये जिन सबके वर्ष और तिथियों में कोई तालमेल नहीं है। तब सवाल यह उठता कि अंक ज्योतिष का आधार ईसवी कलेन्डर ही क्यों? अंग्रेज़ों ने चुँकि विश्व के एक बड़े हिस्से पर राज किया, इसलिये ईसवी कलेंडर का प्रचलन बढ़ गया। यहाँ तक कि विभिन्न गिरजाघरों ने इस कैलेंडर के दिनों की मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगाए हैं. और तो और, जो सबसे अवैज्ञानिक बात इसकी सार्वभौमिकता को चुनौती देती है, वो यह है कि भिन्न भिन्न देशों ने इस कैलेंडर को भिन्न भिन समय पर अपनाया.ईसवी कलेंडर की शुरुआत 1 ए.डी. से होती है जो 1बी.सी. के समाप्त होने के तुरत बाद आ जाता है, यह तथ्य मज़ेदार है, क्योंकि इस बीच किसी ज़ीरो वर्ष का प्रावधान नहीं है। देखा जाये तो ईसवी कलेंडर की तिथियाँ, मूलत: सौर वर्ष को मापने का एक मोटा मोटा तरीका भर है। जब हम ईसवी कलेंडर के विकास पर दृष्टि डालतें हैं तो पाते हैं कि कलेंडर के बारह महीनों के दिन समान नहीं हैं और इनमें अंतर होने का कारण भी स्पष्ट नहीं है. यदि इस कलेंडर का इतिहास देखें तो इतनी उथल पुथल है कि इसकी सारी वैज्ञानिक मान्यताएँ समाप्त हो जाती हैं. इस कलेंडर पर कई राजघरानों का भी प्रभाव रहा, जैसे जुलियस और ऑगस्टस सीज़र. 13 वीं सदी के इतिहासकार जोहान्नेस द सैक्रोबॉस्को का कहना है कि कलेंडर के शुरुआती दिनों में अगस्त में 30 व जुलाई में 31 दिन हुआ करते थे। बाद में ऑगस्टस नाम के राजा ने (जिसके नाम पर अगस्त माह का नाम पड़ा) इस पर आपत्ति जतायी कि जुलाई (जो ज्यूलियस नाम के राजा के नाम पर था) में 31 दिन हैं, तो अगस्त में भी 31 दिन होने चाहिये. इस कारण फरवरी (जिसमें लीप वर्ष में 30 व अन्य वर्षॉं में 29 दिन होते थे) से एक दिन निकालकर अगस्त में डाल दिया गया। अब क्या वे अंक ज्योतिषी कृपा कर यह बताएँगे कि दिनों को आगे पीछे करने से कालांतर में तो सभी अंक बदल गये, तो इनका परिमार्जन क्या और कैसे किया गया?सारी सृष्टि एक चक्र में चलती है सारे अंक एक चक्र में चलते हैं जैसे 1 से 9 के बाद पुन: 1 (10=1+0=1) आता है. ईसवी कलेंडर के आधार पर अंक ज्योतिष में अजब तमाशा होता है जैसे 30 जून (मूलांक 3) के बाद 1 जुलाई (मूलांक 1) आता है। इसी तरह 28 फरवरी (2+8=10=1) के बाद 1 मार्च (1 अंक) आता है। नाम के अक्षरों के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणियाँ अंगरेज़ी (आजकल हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को भी) के अक्षरों के अंकों को जोड़कर की जाती हैं. अब यह तो सर्वविदित है कि नाम के हिज्जे उस भाषा का अंग है जो जातक के देश या प्रदेश में बोली जाती है और जो साधारणतः निर्विवाद होता है. जैसे ही इसका अंगरेज़ी लिप्यांतरण किया जाता है, वैसे ही विरोध प्रारम्भ हो जाता है. ऐसे में सारे अंक बिगड़ सकते हैं और साथ ही जातक का भविष्य भी इसी अधूरे ज्ञान का सहारा लेकर आजकल लोग इन ज्योतोषियों की सलाह पर अपने नाम की हिज्जे बदलने लगे हैं.अंक ज्योतिष के यह अंतविरोध, इसके पूरे विज्ञान को तथाकथित की श्रेणी में ले आते हैं। एक सवाल यह भी रह जाता है कि क्या पूरी मानव सभ्यता को मात्र 9 प्रकार के व्यक्तियों में बांट कर इस प्रकार का सरलीकृत भविष्य बाँचा जा सकता है? ऐसे में इस नितांत अवैज्ञानिक सिद्धांत को, ज्योतिष के नाम पर चलाने के इस करतब को क्या कहेंगे आप? भारतीय अंक ज्योतिष अपने आप में एक विज्ञान है और हमारी वर्णमाला मैं बहुत से रहस्य छुपे है हमारी तिथियां अपने आप में संपूर्ण है उपरोक्त विचार मात्र अंक-ज्योतिष के विषय में हैं। ज्योतिष शास्त्र के विषय में नहीं क्योंकि उसके सिद्धांत और पद्धतियाँ, खगोल शास्त्र पर आधारित हैं और कई अर्थो में वैज्ञानिकता लिये हैं। ज्योतिष शास्त्र में अभी और गहन शोध होने बाकी हैं और आगे भी इस पर बात जारी रहेगी दोस्तों हो सकते मेरी बातों से कुछ खास  को नाराजगी पैदा हो पर मुझे इस पर कोई फर्क नहीं  आचार्य राजेश

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

वक्री मंगल ग्रह



आम तौर पर वक्री मंगल अपने सामान्य स्वभाव की तरह ही आचरण करते हैं।बृहज्जातक के ग्रह भक्तियोगाध्याय के ष्लोक 31 एवं 32 में कहा गया है कि मंगल के वक्र गमन से दूषित नक्षत्र पीड़ित होकर अपने वर्ग का नाष करता है मंगल अपने उदित नक्षत्र से सातवें आठवें अथवा नौवें नक्षत्र में वक्री होता है तो उसे उष्ण संज्ञक वक्री कहते है यदि 10वें 11वें अथवा 12वें नक्षत्र में वक्री हो तो उसे अश्रुमुख वक्री कहते है इस वक्री स्थिति से राष्ट्र में विपत्ति आती है तथा अकाल पड़ता है। रसों में दोष उत्पन्न होता है तथा रोगों में वृद्धि होती है। यदि अस्त नक्षत्र से 13 वें अथवा 14 वें नक्षत्र में मंगल वक्री हो तो उसे व्याल क्री वक्र कहा जाता है। इसमें खेती का उत्पादन उत्तम होता है साथ ही विष भय होता है। यदि अस्तकालिक नक्षत्र से 15वें या 16 वें नक्षत्र में मंगल वक्री होता है तो उसे रुधिरानन वक्री कहते हैं। इसका परिणाम सुभिक्ष होता है, परंतु प्रजा को भय तथा मुख के रोगों से पीड़ा होती है। यदि अस्त नक्षत्र से 17वें अथवा 18वें नक्षत्र में मंगल वक्री होता है तो उसे अतिमूसल वक्री कहते हैं। उसकी इस वक्री अवस्था में चोरों तथा ड़ाकुओं के कारण धन की हानि, अनावृष्टि तथा शस्त्र भय होता है। यदि मंगल पूर्वा फाल्गुनी अथवा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उदित होकर उत्तराषाढ़ में वक्री हो तथा बाद में रोहिणी में अस्त हो जाए तो तीनों लोकों को पीड़ित करता है। यदि मंगल श्रवण नक्षत्र में उदित होकर पुष्य नक्षत्र में वक्री हो जाए तो शासकों, राष्ट्राध्यक्षों के लिए हानिकारक होता है। यदि मंगल मघा नक्षत्र के मध्य में उदित होकर मघा नक्षत्र में ही वक्री हो जाए तो पृथ्वी पर वर्षा का अभाव होता है तथा शस्त्र भय होता है। कई बार आपने बहुत छोटी आयु में बालक बालिकाओं को चरित्र से से भटकते हुए देखा होगा.विपरीत लिंगी की ओर उनका आकर्षण एक निश्चित आयु से पहले ही होने लगता है.कभी कारण सोचा है आपने इस बात का ?विपरीत लिंग की और आकर्षण एक सामान्य प्रक्रिया है,शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन के बाद एक निश्चित आयु के बाद यह आकर्षण होने लगना सामान्य सी कुदरती अवस्था है.शरीर में मंगल व शुक्र रक्त,हारमोंस,सेक्स ,व आकर्षण को नियंत्रित करने वाले कहे गए हैं.इन दोनों में से किसी भी ग्रह का वक्री होना इस प्रभाव को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है. यही प्रभाव जाने अनजाने उन्हें उम्र से पहले वो शारीरिक बदलाव महसूस करने को मजबूर कर देता है जो सामान्य रूप से उन्हें काफी देर बाद करना चाहिए था.मंगल का वक्री होना व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, यौन सुख पर सबसे अधिक असर डालता है। चूंकि मंगल पुरुषत्व का प्रतिनिधि ग्रह है इसलिए यह व्यक्ति के ताकत, शक्ति, उत्साह, स्त्रियों के प्रति आकर्षण, झुकाव, संभोग की शक्ति एवं विवाह के प्रति रूझान के बारे में कथन देता है। जब मंगल वक्री होता है तब पुरुष सगाई, विवाह या अपने जीवनसाथी के प्रति गलत निर्णय ले बैठते हैं बाद में जीवनभर पछताते रहते हैं। यदि किसी स्त्री की कुंडली में मंगल वक्री है तथा गोचर में भी वह वक्री हो तो उस स्त्री की विवाह के प्रति, यौन संबंधों के प्रति इच्छाएं पूरी तरह खत्म हो जाती है। वह इन सब चीजों को बकवास मानने लगती है। यहां तक देखा गया है कि वक्री मंगल की स्थिति में महिलाएं विवाह की पूर्व रात्रि में ही भाग जाती हैं। वक्री मंगल के प्रभाव से व्यक्ति झूठे मुकदमों, पारिवारिक कलह में उलझ जाता है। इसी प्रकार वक्री ग्रह कुंडली में आपने भाव व अपने नैसर्गिक स्वभाव के अनुसार अलग अलग परिणाम देते हैं.अततः कुंडली की विवेचना करते समय ग्रहों की वक्रता का ध्यान देना अति आवश्यक है.अन्यथा जिस ग्रह को अनुकूल मान कर आप समस्या में नजरंदाज कर रहे हो होते हैं ,वही समस्या का वास्तविक कारण होता है,व आप उपाय दूसरे ग्रह का कर रहे होते हैं.परिणामस्वरूप समस्या का सही समाधान नहीं हो पाता. लेख के अंत में फिर बता दूं की वक्री होने से ग्रह के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता,बस उसकी शक्ति बढ़ जाती है.अब कुंडली के किस भाव को ग्रह की कितनी शक्ति की आवश्यकता थी व वास्तव में वह कितनी तीव्रता से उस भाव को प्रभावित कर रहा है,इस से परिणामो में अंतर आ जाता है व कुंडली का रूप व दिशा ही बदल जाती है.


न मुहब्बत न दोस्ती के लिए वक्त रुकता नहीं किसी के लिए। दिल को अपने सज़ा न दे यूँ ही इस ज़माने की बेरुखी के लिए। कल जवानी का हश्र क्या होगा सोच ले आज दो घड़ी के लिए। हर कोई प्यार ढूंढता है यहाँ अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए। वक्त के साथ साथ चलता रहे यही बेहतर है आदमी के लिए

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

,वाघक ग्रहअच्छा या वुरा

वेदो के अनुसार आत्मा को अजर-अमर कहा गया है। गीता में भी कहा गया है कि, जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण कर लेता है। ठीक उसी प्रकार यह जीवात्मा पुराने जीर्ण शरीर को त्यागकर नई देह को धारण कर लेती है। हमारे यहां पुनर्जन्म का सिद्धांत है।
हर जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार निश्चित मां-बाप के यहां जन्म लेती है और जन्म लेते समय आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की जो स्थिति होती है उस आकाशीय नक्शे के अनुसार व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है। जिसे ज्योतिष शास्त्र जन्मांग या कुंडली का नाम देता है।
एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं आज वाचक ग्रह की वात कर रहा हु ैंवैदिक ज्योतिष में बाधक ग्रह का जिक्र किया गया है  लेकिन इन बातों का अध्ययन बिना सोचे समझे नहीं करना चाहिए. कुंडली की सभी बातों का बारीकी से अध्ययन करने के बात ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए.जन्म कुंडली मे बाधक ग्रहो और बाधक स्थानो के लिये कई प्रकार की डरावनी बाते कही जाती है। यह भाव बाधक यह ग्रह बाधक है और कार्य मे बाधा देगा आदि बाते बताकर लोग अपनी अपनी कथनी का विवेचन करते है।अभी बात करते है, बाधक ग्रह, इसे भी कॉमन सेन्सस से समझे,ज्योतिष के अन्तर्गत अनगिनत योगों का उल्लेख मिलता है. बहुत से योग अच्छे हैं तो बहुत से योग खराब भी हैं. जन्म कुंडली में अरिष्ट की व्याख्या भावों के आधार पर भी की जाती है. रुकावट होना और रुकावट के कारण कष्ट होना यह बात ग्रहों के भावो के अनुसार कथन किया जाता है। जन्म के बाद शरीर का पनपना और शरीर के पनपने के समय मे मिलने वाली कठिनाई बात करने मे अक्षरों का उच्चारण चलने मे पैरों का सही स्थान पर नही रखा जाना काम करते वक्त हाथ का सही काम नही कर पाना आदि कितने ही कारण शरीर की पनपाहट मे बाधक होते है और इस प्रकार की बाधकता को पार नही किया जाय तो वही अंग या अवयव नाकाम रह जायेगा जो लोग बाधकता से नही डरते है और अपने को लगातार प्रयास मे लगाये रहते है वह अन्य लोगो से अधिक लचीला और मजबूत अंग बनाने मे सफ़ल हो जाते है। कुंडली मे तीसरा स्थान सबसे पहले बाधक का काम करता है। तीसरा स्थान खुद के पहिचान बनाने के कारणो का भी होता है छोटे भाई बहिनो का भी होता है छोटी यात्रा करने के लिये भी माना जाता है मकान के बाहर रहने का कारण भी होता है पति या पत्नी के धर्म रिवाज समाज व्यवहार के लिये भी जाना जाता है जीवन साथी की ऊंची शिक्षा कानूनी प्रभाव विदेश आदि का रहना और विदेशी नीतियों को अपने परिवार आदि मे समायोजित करना भी होता है। अपनी पहिचान बोली भाषा आदि के लिये भी यही स्थान माना जाता है। शरीर मे बायें हिस्से का कारक भी माना जाता है। इस प्रकार से छोटे भाई बहिन को सम्भालना जीवन की बाधकता मे माना जाये तो यह कहना यथार्थ होगा कि व्यक्ति सामाजिकता से परे जा रहा है। रामायण मे भगवान श्रीराम की कथा में लक्षमण जी का आजीवन साथ रहना उनके तीसरे भाव का पराक्रम से जोडा गया रूप है माता सीता जी का आजीवन साथ रहना उनके सप्तम का सही रूप से विवेचित रूप है उनके बडे भाई होने का अहसास तथा उनके बडे भाई के कर्तव्यों का निर्वहन किया जाना उनके ग्यारहवे भाव के कारक को फ़लीभूत करने का साहस माना जाता है। जब बाधक ग्रह के प्रति लगातार चिंतन किया जाये और उसके ऊपर सफ़लता को प्राप्त कर लिया जाये तो वही विजय का रूप कहलाता है। कोर्ट केश दुश्मनी आदि बाते सप्तम भाव से देखी जाती है तथा जीवन साथी का भाव भी सप्तम स्थान के रूप मे ही समझा जाता है अगर कोर्ट केश को करने वाले व्यक्ति को बाधक के रूप मे लिया जाये तो यह कहना भी गलत नही होगा कि तीसरा भाव जब कमजोर है अपनी पहिचान और हिम्मत दिखाना नही आता है तो अपने आप ही सातवा भाव कमजोर हो जायेगा और सातवे के कमजोर होने से ग्यारहवा भाव अपने आप ही बजाय लाभ के हानि देना शुरु कर देगा।तीसरा सप्तम और ग्यारहवा भाव और इनके स्वामी काम नाम के पुरुषार्थ से जुडे होते है। किसी भी पौधे के बढने और पनपने के लिये दूसरा भाव और जैसे ही पौधे की पहिचान होती है तीसरा भाव सामने आता है। पौधे से मिलने वाले लाभ और हानि तथा पौधे का जलवायु के अनुसार पनपाहट चौथे भाव से देखी जाती है पौधे का अन्य पौधो के साथ पनपना और मजबूत होना पंचम से देखा जाता है पौधे मे लगने वाले रोग और जडो की गहराई का विवेचन छठे भाव से किया जाता है उसी प्रकार से पौधे मे जब पनपाहट के बाद फ़ूल खिलता है तो वह सप्तम की पहिचान तीसरे के अनुसार ही मिलती है और फ़ूल के अन्दर जब पराग कण का निषेचन होता है तो वह अष्टम का कारण बन जाता है। फ़ूल का बनना बन्द होना और फ़ल का रूप शुरु होना नवे भाव से जोडा जाता है कच्चे फ़ल का रूप दसवे भाव से और फ़ल के पकने और उसके द्वारा मिलने वाले लाभ हानि का कारण ग्यारहवे भाव से देखा जाता है फ़ल की समाप्ति और फ़ल के असर का रूप समाप्त होने का भाव बारहवा है। इस प्रकार से तीसरा सातवा और ग्यारहवां ही पौधे की पहिचान पौधे की सुन्दरता और पौधे से मिलने वाले फ़ल का रूप है बिना बाधक भाव के और बाधक ग्रह के जीवन मे पहिचान नही बन पाती है जीवन मे जीने के लिये कारण नही मिल पाता है और जीवन जब जिया जाता है तो जीवन लेने का उद्देश्य भी नही मिल पाता है यानी जैसे व्यक्ति पैदा हुआ था और उसी प्रकार से बिना कुछ किये चला जाये तो यह समझना चाहिये कि जातक के जीवन मे बाधक ग्रहों का असर बाधक भावो का प्रभाव नही था। मित्रों अगर आप अपनी कुंडली दिखाना या बनवाना चाहते हैं या कोई लैब टेस्ट रतन लेना चाहते हैं अपनी समस्या का कोई हल चाहते हैं तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं 7597718725/9414481324


सोमवार, 29 जनवरी 2018

मित्रो आप मे से वहुँत से मित्रमुझे फोन पर ज्योतिष की कितावो के वारे मे पुछते है तो सोचा आज आप को कुछ अच्छी books की जानकारीदेदु जो आप के काम आऐ ऐसी books के बारे में जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूं, जो किसी भी प्रशिक्षु ज्‍योतिषी एवं ज्योतिष में रूचि रखने वाले किसी भी प्राणी को अवश्‍य पढ़नी चाहिए। इन सभी पुस्‍तकों को मैंने बार बार पढ़ा है और आज भी पढ़ता रहता हूं। हर बार किसी नए कोण से कोई नई बात उभरकर सामने आती है। ऐसे में आप भी इन पुस्‍तकों को पढ़ें, तो इस क्षेत्र में अच्‍छा ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। बहुत बार नए ज्‍योतिषियों के सामने यह समस्‍या होती है कि कौनसी पुस्‍तक पढ़ें और कौनसी छोड़ें। आज ज्‍योतिष के क्षेत्र में पुस्‍तकों के सैकड़ों टाइटल मिल जाएंगे, लेकिन सटीक रूप से कौनसी पुस्‍तक आपको जानकारी दे सकती है, इस जानकारी का अभाव है। ऐसे में मेरी लाइब्रेरी का यह विवरण आपके जरूर काम आ सकता है। फण्‍डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी – इस किताब का हिन्‍दी अनुवाद भी बाजार में आ चुका है। काटवे की देव विचार माला – इसमें सत्रह छोटी पॉकेट साइज पुस्‍तकें शामिल हैं। पहले यह आउट ऑफ प्रिंट हो गई थी अब इसका रीप्रिंट वर्जन बाजार में आ चुका है। लाल किताब (Lal Kitab)- लेखक पंडित रामचंद्र शास्‍त्री, कालका वाले। भवन भास्‍कर (Bhawan Bhaskar)- यह किताब आउट ऑफ प्रिंट हो चुकी है, किसी एक व्‍यक्ति के पास उपलब्‍ध हो तो वह अन्‍य पाठकों को फोटो प्रति करके उपलब्‍ध करा सकता है, पहले यह गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होती थी। कुछ स्‍टॉलों पर अब भी मिल सकती है। (इस किताब का नया प्रिंट फिर से बाजार में आ चुका है। गीताप्रेस ने ही पुन: प्रकाशित किया है।) ज्‍योतिष रत्‍नाकर– देवीनन्‍दन सिंह की लिखी यह पुस्‍तक ज्‍योतिष आठ धाराओं में बांटकर सिखाती है। यह अपने आप में पूर्ण पुस्‍तक है लघु पाराशरी टीकाकार मेजर एसजी खोत – यह पुस्‍तक हर कहीं उपलब्‍ध नहीं है, लेकिन मिल सकती है, लघु पाराशरी सिद्धांतों को समझने के लिए यह अल्‍टीमेट पुस्‍तक है। फलित ज्‍योतिष रेडीरेकनर- शौकिया और प्रमाणिक ज्‍योतिष के पाठकों के लिए यह पुस्‍तक महल की बहुत अच्‍छी किताब है। इसे पढ़कर आप अपनी कुण्‍डली का फौरी तौर पर विश्‍लेषण कर सकते हैं। अच्‍छी बात यह है कि इस पुस्‍तक में नेगेटिव प्‍वाइंट बहुत कम हैं। एस्‍ट्रो सीक्रेट्स यह पुस्‍तक केवल अंग्रेजी में ही उपलब्‍ध है। अगर इसका कोई हिन्‍दी संस्‍करण आया भी है तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है। मेरी सलाह है कि इसे अंग्रेजी में ही पढ़ा जाए तो बेहतर है। प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति के शिष्‍य के. शबुंगम की लिखी यह पुस्‍तक केपी एस्‍ट्रोलॉजी को समझने की एक नई दिशा देती है। तीन सौ महत्‍वपूर्ण योग- योगायोगों के बारे में बीवी रमन ने अपनी खुद की सोच रखी और प्राचीन योगों में से भी तीन सौ ऐसे योग निकालकर उनका संग्रह पेश किया कि बहुत से जातकों की कुण्‍डली में ये योग मिल जाते हैं। इन योगों के फलादेश भी बहुत कुछ सटीक पड़ते हैं। इसे जरूर पढ़ना चाहिए। ज्योतिष की कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकें (Astrology books की ऐक लिस्ट भारतीय ज्‍योतिष : नेमीचंद शास्‍त्री ज्‍योतिष रत्‍नाकर : देवकीनन्‍दन सिंह प्रिडिक्टिव स्‍टेलर एस्‍ट्रोलॉजी : केएस कृष्‍णामूर्ति काटवे सीरीज : देव विचार माला की सभी 17 किताबें अध्‍यात्‍म ज्‍योतिष : हेमवंता नेमासा काटवे योग विचार : हेमवंता नेमासा काटवे 300 महत्‍वपूर्ण योग : बीवी रमन भद्रबाहु संहिता : नेमीचंद्र शास्‍त्री मंत्र विद्या : करणीदान सेठिया लाल किताब : रामेश्‍वरचंद्र शास्‍त्री कालका वाले समरांगण सूत्रधार : भवन निवेश हॉरेरी एस्‍ट्रोलॉजी : केएस कृष्‍णामूर्ति कास्टिंग द होरोस्‍कोप : केएस कृष्‍णामूर्ति फलित ज्‍योतिष रेडीरेकनर : तिलक राज तिलक नवमांशा इन एस्‍ट्रोलॉजी : चंदूलाल एस पटेल उपचारीय ज्‍योतिष : के के पाठक सचित्र ज्‍योतिष शिक्षा : बाबूलाल ठाकुर भाग दो, चार, छह, आठ ज्‍योतिष कौमुदी बॉडी लैंग्‍वेज : एलन पीज द प्रोगेस्‍ड होरोस्‍कोप : एलन लियो जातक निर्णय : बीवी रमन नक्षत्र फल : के टी शुभाकरन दोनों भाग लघुपाराशरी : टीकाकार मेजर एसजी खोत न्‍यू टैक्‍नीक्‍स ऑफ प्रिंडिक्‍शन : एचआर शेषाद्री अय्यर भवन भास्‍कर : गीताप्रेस गोरखपुर भुवन दीपक : डॉ शुकदेव चतुर्वेदी गोचर विचार : जगन्‍नाथ भसीन वास्‍तुमुक्‍तावली : मास्‍टर खेलाड़ीलाल ज्‍योतिष बोध : पंडित धरणीधर शास्‍त्री प्रश्‍न चंद्रप्रकाश : चंद्रदत्‍त पंत हस्‍तरेखा विश्‍वकोष : हरिदत्‍त शर्मा मण्‍डेन एस्‍ट्रोलॉजी : मानिकचंद जैन राहू केतू : मानिकचंद जैन सत्‍य सिद्धांत ज्‍योतिष : प्रभुलाल शर्मा व्‍यापार रत्‍न : पंडित हरदेव शर्मा त्रिवेदी अर्घ मार्तण्‍ड : पंडित मुकुल वल्‍लभ मिश्र लघुपाराशरी एवं मध्‍य पाराशरी : पंडित केदारदत्‍त जोशी सर्वार्थ चिंतामणि : खेमराज श्रीकृष्‍णदास आकृति से रोग की पहचान : लुई कुने रमल नवरत्‍न : खेमराज श्रीकृष्‍णदास सुगम वैदिक ज्‍योतिष बुक ऑफ नक्षत्राज : प्राश त्रिवेदी सुनहरी किताब इसके साथ ही ज्‍योतिषियों को मोटीवेशनल मैनेजमेंट, साइकोलॉजी और स्‍वास्‍थ्‍य से संबंधित पुस्‍तकों का भी अध्‍ययन करना चाहिए।आचार्य राजेश

रविवार, 28 जनवरी 2018

राहु ओर रोग मे वाघा भाग _2

राहु एवं रोग निदान मेंवाघा भाग 2

देने वाला छायाग्रह है I अत: यदि रोगी क्री राहु की महादशा अंतर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा  चल रही हो, तो उसके शरीार में विद्यमान राहु की adrishya Paraवैगनी किरणे  उनकें उपच्चार में बाधायें उत्पनकरती हैं, आरोग्य मे वाघा  कर घोर निराशा  उत्पन्न करती हैं, व  साघय रोग  को असघ्य कर देती हैं। Prakriti ke Niyam ke anusar कोइ  भी वस्तु जिस रंग की होती हैं वह उस रंग की इसलिए दिखाई पड़ती है क्योंकि वह  सवकिरणो कोअपने में सोख कर केवल उसी रंग को परावर्तित कर देती हे, जिस -रंग की वह दिखाई दे रही होती है t लाल रंग का गुलाब पुष्प हमे लाल रंग का इसलिये दिखाई देता है, क्योंकि वह अन्य सभी रंगों क्रो अवशोषित कर केवल लाल रंग क्रो बिकर्थित कर देता है । यह प्रकृति न्यूटन के नियम, ‘Similar poles repel each other.’ अर्थात् "समान घुव एक दूसरे को विकर्षिव्र करते है' पर आधारित है । अत: जब रोगी व्यक्ति का एक्स-रे किया जाता है, तो इस सिद्घान्त के आधार पर शरीर में पहले से ही मौजूद पराबैंगनी किरणे एक्स किरणों को विकर्षित कर देती हैं, और एक्स-रे की 'रिपोर्ट' साभान्य आती है, तथा रोगी की आंतरिक खराबी या तकलीफ का पता नही चलता, जबकि रोगी उस पीड़ा को भोग रहा होता है । इस्री प्रकार शरीर मे मोजूद पराबैगनी किरणे 'पेथोलॉंजिकल' जांचों को भी शरीर की आंतरिक गडबड्रियों क्रो उजागर नही करने देती, अत: ऐसी जांचों का परिणाम हमेशा 'नॉर्मल' अर्थात् सामान्य आता है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास तथा एक डायब्वनोस्टिक्र लेब से दूसरी डायज्जनौस्टिक लेब मे जाता रहता है, पर न तो उसके रोग का ही सही निदान हो पाता है, और न किसी प्रकार की औषधियों या उपचार पद्धतियों से उसके रोग का समापन ही हो पाता है  जब व्यक्ति चिकित्सा बिज्ञान क्रो आजमाकर निराश हो जाता है, तो वह मंत्र-तंत्र अथवा ज्योतिष जैसे विज्ञानों की मदद लेता है । मंत्र-तंत्र विशेषज्ञ द्धारा मंत्र के निरन्तर जप से उत्पन्न मंत्रशक्तिमय किरणे और ब्रह्माण्ड से प्राप्त पराबैगनी किरणे, दोनो चूंकि एक ही तरंगन्देर्ध्व पर काम करती हैं, अत: पराबैगनी किरणे मंत्ररश्मियो क्रो भी रोक देती है, और मंत्र-तंत्र चिकित्सा से भी कोई बिशेष लाभ नहीं होता । मंत्ररस्मियां शरीर में
उपस्थित पराबैगनी किरणों से टकराती हैं, और समाप्त हो जाती है । ऐसे समय मे पीडित व्यक्ति ज्योतिषी देवज्ञ से परामर्श करता है जीवन मेंराहु की अन्तर्दशा पहले आती है, उसके बाद ही वृहस्पति (गुरु) की दशा का आगमन होता हे I राहु के समय के दौरान व्यक्ति धोखेबाजी और जालसाजी के ही संपर्क में आ पाता है, चाहे वे मंत्र-तंत्र. चिकित्सा, ज्योतिष किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो । और इस प्रकार व्यक्ति का समय व धन बर्बाद ही होता है
यद्यपि वह निराश हो चुका होता है, लेकिन समाधान की प्रबल आवश्यकता उसे एक के बाद दूसरा दरवाजा खटखटाने को बाध्य कर देती है I जब तक राहु का समय चल रहा होता है, तब तक वह लगातार यहां से वहां और इधर से उधर भटकता रहता है I इस समय के दौरान यदि यह किसी अच्छे ज्योतिषीके संपर्क में आ  भी जाता है, जो पराबैगनी किरणों का अवरोधक प्रभाव उपाय के द्वारा उसकी जन्मकुषडली का भलीभांति विश्लेषण करने  के वाद उसकी समस्या का समाधान कर सकता हो परन्तु राहु उसे सही ज्योतिषी से परामर्श लेने नहीं देता और वह गलत ज्योतिषीय निदान कर बैठता हे I ऐसे समय में  उदाहरण के लिये यदि  ईराक-अमेरिका युद्ध को देखें, तो हमे ज्ञात होगा कि जब 'स्कड' (Skud) नामक 'मिसाइल‘ या आग्नेयास्त्र चलाया जात्ता था, तो उसे 'पैट्रियांट' (Patriot) नामक आग्नेयास्त्र मारकर गिरा देता था । इसी प्रकार का विवरण रामायण, महाभारत व हमारे अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी है, जिसमे जब एक ओर से एक विनाशकारी वाण चलाया जाता था, तो उसे दूसरी ओर से एक विध्वंसक विपरीत वाण संधान द्वारा नष्ट कर दिया जाता था । एक प्रकार से देखा जाये, तो वर्तमान युग की मिसाइलें हमारी प्राचीन मिसाइलों (बाणों) का ही आधुनिक संस्करण है I
यदि मंत्ररश्मियों क्रो 'स्कड' मिसाइल मान ले, तो राहु रश्मियां ‘पैट्रियॉट' का काम करती हे I यही कारण है, कि राहु की अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में मंत्र-तंत्र का लाभ प्रतीत नहीं होता । वास्तव पे मंत्र तो अपना ज्योतिष विद्या उपायों फे बिना उसी प्रकार है, जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर । महर्षि पराशर ने उपायों पर बहुत अधिक बल दिया है । उन्होंने जो उपाय सुझाये, उनमें जरूरत्तमन्दो व याचकों को भोजन कराना, रत्न पहनना, यंत्र धारण करना, ग्रह विशेष के तांत्रोक्त मंत्र का जप करना व औषधीय ज़ड्रीडबूटियों से स्नान करना इत्यादि उपाय शामिल हैं I इन सभी का विस्तृत विवेचन किया है लाल किताब के अनुसार भी उपाय भी प्रभाव शाली है दान के पीछे तर्क यह है, कि इससे रोग क्रो आरोग्य न होने के लिये जिम्मेदार किरणों को विकर्षित किया जा सकता है तथा पीडित व्यक्ति को लाभ पहुंचाया जा सकता है ।हमारे महर्षिगण, जो उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे, उन्होंने विभिन्न तरंगदेथ्यों के प्रभाव का अध्ययन किया, और उसी आधार पर विभिन्न वस्तुओं की तरंगदेर्ध्व के निर्धारण मेँ समर्थ हुए तथा उन्होंने ऐप्ती विशिष्ट वस्तुओ का ही वितरण जरूरत्तमन्दो में करने का परामर्श दिया a दान की इस प्नब्रिज्या का दोहरा लाभ होता है
अर्थात् व्यक्ति पेट की क्षुधा को शांत करने के लिये कौन सा पाप नहीं कर सकता? अत: एक और भूखे व जरूरतमंद लोगों को भोजन कराकर, जहां व्यक्ति उन्हें चोरी, डकैती, हिंसा, छोना-झपटी, लूटमार व अन्य आपराधिक कृत्यों को करने से बचा सकता है, वही दूसरी ओर दान प्राप्त करने वाले की आत्मा का अवचेतन भाग, निश्चित रूप से दानी व्यक्ति को आशीर्वाद देता है, और उसकी तक्लीफ या पीडा कम होने जातीहै
अपने पास से पैसा निकालकर दूसरों पर खर्च करना बहुत मुश्किल है, परन्तु ऐसा करने वाला सदैव सुखी जीवन भोगता है लोक ओर परलोक के सुख पाता है
इस तथ्य पर पिछले लेखों  में पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है कि राहु की किरणे अदृश्य होतो हैं I वे मानवजाति को गुप्त रूप से प्रभावित करती हैं । अत: जब व्यक्ति की राहु की दशा या अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा चल रही होती  है, तब परावैगनी किरणे शरीर में विद्यमान होतो हैं I यदि व्यक्ति इस समय दोरान किसी रोग से पीडित होता है, तो शरीर में पहले से विद्यमान राहु की किरणे  में न तो दवाई क्रो काम करने देती हैं, और न ही रोगी को ऊन्य किसी "उपचार से ठीक होने देती हैं I शनि से संबंधित चर्चा के अन्तर्गत यह जा चुका है, किं रुनि विलम्ब का ग्रह है, रुकावट का ग्रह है,  और राहु के लिये "शनिवत राहु  राहु 'सूत्र का प्रयोग किया गया है , कि राहु शनि की भांति कार्य करता है । परन्तु राहु किरनें (परावैगनी किरणे) शनि की किरणों से ना केवल ज्यादा ताकतवर हें,ओर  अदुश्व भी हें, अत: यदि शनि विलम्ब का कारक हैं, तो उससे भी अदिक विलम्ब का कारक है जो अपनी अद्श्य प्रकृतिक्श  विलम्व के कारण रोग  का कारण भी पता  चलने नही देता  यदि शनि रुकावट का कारक है, तो राहु उ्स्से भी अघिक शक्तिशाली तथा अदृश्य वाघा का  जनक है यद्यपि शनि निराशा का ग्रह है, तो राहु घोर निराशा को  चरमशिखर घर पहुंचा

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...