गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

प्रकृति का बैलेंस

प्रकृति का बैलेंस

कहा जाता है कि जब अनेक राम पैदा हो जाते है तो रावण को भी जन्म लेना पडता है और अनेक रावण पैदा हो जाते है तो राम को भी जन्म लेना पडता है। जब खूब घास पैदा होने लगती है तो बहुत से हिरन पैदा हो जाते है और जब बहुत से हिरन पैदा हो जाते है तो शेर भी पैदा होने लगते है। इसी का नाम प्रकृति का बलैंस बनाना कहा जाता है,यह प्रकृति अपने बैलेंस को बनाकर चलती है,कोई कितनी ही मर्जी कर ले लेकिन यह अपना रास्ता नही छोडती है,जब जमीन पर भार बढ जाता है तो यह भूकंप पैदा करती है,जब जगह खाली हो जाती है तो जीवों को पैदा करती है,जो स्थान खाली होता है उसे भरती है और जो भरा है उसे खाली करती है। एक व्यक्ति जब धर्म की तरफ़ जाता है तो प्रकृति उसके अन्दर अहम को भी भरती है और जब अहम पैदा हो जाता है तो वह धार्मिकता को छोड कर आसुरी वृत्ति में जाने के लिये तैयार हो जाता है। जब वह धर्म से रहना चाहता है तो उसका ध्यान माया से जुडे लोगों में चला जाता है और जब वह माया में जाता है तो उसका ध्यान धर्म की तरफ़ चला जाता है,इस बदलने वाले प्रकृति के टेस्ट के कारण जीव अपनी अपनी करनी का फ़ल प्राप्त करता है। ग्रह नक्षत्र इस बात को अपनी अपनी प्रभाव देने वाली बात को बताते है और साधु सन्यासी लोग इसे ईश्वर की महिमा बताते है साधारण लोग इसे अपनी अपनी करनी का फ़ल बताते है,जो लोग कुछ नही जानते वे अपने को जैसे लोगों और प्रकृति के द्वारा चलाया जाता है उसी प्रकार से चलते जाते है और जो भी कार्य उनके लिये पहले से तय किया गया है उसे पूरा करते है और अपने रास्ते से निकल जाते है।

भिन्नता को देखने के लिये अपने शाकाहारी और मांसाहारी जीवों को ही नही देखना पडता है यह वृत्ति मनुष्य के अन्दर भी मिलती है,कितने लोग केवल घास पात खाकर अपने जीवन को चलाना जानते है और कितने लोग चिकन और मटन से ही अपने उदर को भरने में विश्वास करते है। कोई दूध पीकर पहलवानी और शरीर के बल को प्रदर्शित करता है तो कोई शराब पीकर दस मिनट में ही अपने आतंक को प्रदर्शित करने से नही चूकता है। कोई परायी बहिन बेटी को अपनी बहिन बेटी समझता है तो कोई सभी को कामुकता की नजर से ही देखता है,अगर सभी की समान द्रिष्टि हो जाती तो कोई न्याय करने की जरूरत नही पडती,सभी अपने अपने रास्ते से चले जा रहे होते और कोई युद्ध नही होता कोई मारकाट नही होती और कोई एक दूसरे से जलन नही रखता,लेकिन इस बात में भी प्रकृति को दिक्कत आने लगती,जब एक दूसरे को जलन नही होती तो वह आगे ही आगे बढते जाते,एक प्रकार की मानसिकता होती तो वे आसमान में सीढियां भी लगा चुके होते। या तो एक ही मानसिकता से सभी बढ चढकर खुश हो गये होते या एक ही मानसिकता से समाप्त भी हो गये होते। आखिर में इस प्रकृति को इतना क्यों करना पडता है,क्यों वह जीव को पैदा करती है और उसे पालती है उसकी रक्षा करती है और जरा सी देर में कोई न कोई कारण पैदा करने के बाद उसे समाप्त कर देती है,या तो वह पैदा ही नही करे,और पैदा करे तो मारे नही,परेशान नही करे,लेकिन इतनी बात को समझने के लिये प्रकृति के पास समय कहां है उसे तो कुछ करना है,जो करना है हमें भी पता नही है,जब हम जमीन के नीचे से कोयला और पेट्रोल आदि निकालते है तो वैज्ञानिक कहते है यह सब जीवांशो के द्वारा ही सम्भव है,अन्यथा जमीन के नीचे कोयला कैसे बन गया,जहां जहां कोयले की खाने है वहां वहां पूर्वकाल में बडी बडी बस्तियां रही होंगी,बडे बडे जंगल रहे होंगे,वे किसी न किसी कारण से समाप्त हो गये और उनके अवषेश कोयला या पेट्रोल के रूप में नीचे रह गये,वे ही मनुष्य निकाल निकाल कर जलाने और शक्ति के रूप में प्रयोग करने के लिये अपना रहा है। समुद्रों के नीचे भी पेट्रोल और कोयले की खाने है,मीलों गहरे पानी के नीचे भी पेट्रोल की खोज की गयी है और मनुष्य वहां से भी पेट्रोल और खनिज निकालने के लिये प्रयासरत है।ह जमीन की मिट्टी जो देखने में पत्थर लगती है बालू लगती है चिकनी मिट्टी लगती है,भुरभुरी लगती है दोमट लगती है लाल पीली काली हरी सभी तरह की मिट्टी दिखाई देती है यह कोई साधारण वस्तु नही है,यह अटल मिट्टी है इसके अन्दर से जो चाहो प्राप्त कर सकते हो,लेकिन प्राप्त करने की कला होनी चाहिये,जैसे इस मिट्टी से मीठा रस पीना है तो पहले इसके अन्दर गन्ना बोया जायेगा,और जब इस मिट्टी से चरपरा कुछ खाना है तो मिर्ची बोयी जायेगी और एक प्रकार की मिट्टी से ही मीठा और चरपरा दोनो प्रकार का स्वाद पैदा हो जायेगा,इसे अगर वैसे ही चाखो तो कैसी भी नही लगती है। इसी मिट्टी में गंधक है इसी में पारा है इसी में अगरस है इसी में मगरस है और जब इन्हे तपा दिया गया तो इसी मिट्टी में सोना भी बना है,मगरस हटा दिया तो लोहा ही रह गया,एक सौ उनसठ तत्व मिट्टी के सोना बना देते है तो एक सौ अट्ठावन तत्व लोहा ही रहने देते है। इस मिट्टी को गीला कर दो और सही तापमान में रखो पता नही कहां से आकर इसके अन्दर कोई न कोई जीव या वनस्पति अपने आप पैदा होने लगेगी,कोई इस मिट्टी को नही जाने लेकिन धरती के अन्दर रहने वाले जीव तो इसे जानते ही है। जो इस धरती के अन्दर जीव रहते है उन्हे ऊपर का सभी कुछ पता होता है,अगर समझना है तो कभी चीटी को देखो,जैसे ही पानी बरसने वाला होता है वह समझ जाती है कि उसके बिल में पानी आयेगा और वह अपने अंडे बच्चे लेकर सुरक्षित स्थान की ओर भागलेती है और वह जाती भी वहीं है जहां पानी किसी तरह से नही पहुंचेगा,आदमी के पास तो बैरोमीटर है लेकिन चीटी के पास कौन सा बैरोमीटर है ? आदमी के पास बुद्धि है लेकिन सेंस नही है,वह अपनी बुद्धि से बना तो बहुत कुछ सकता है लेकिन उसे यह सेंस नही है कि उस बने हुये का आगे प्रयोगात्मक पहलू सकारात्मक होगा या नकारात्मक.

मनुष्य की पसंद तो खुशबू होती है लेकिन वह उस खुशबू को बदलकर बदबू में परिवर्तित कर देता है,वह भोजन तो स्वादिष्ट खाता है,लेकिन पाखाना बदबू वाला ही करता है,आदमी का पाखाना किसी काम का नही है जबकिएक अदनी से जीव गाय का पाखाना कम से कम लीपने पोतने और जलाने के लिये छैने तो बनाने के काम आता है,मनुष्य का शरीर भी किसी काम का नही है,वह मन्दिरों में जाता है तो अपने को पवित्र बताता है,मस्जिद में जाता है तो अपने को पवित्र बताता है,और जब उसकी अन्तगति होती है तो उसे लोग छूने से डरते है,और कोई भूल से छू भी लेता है तो उसे नहाना पडता है और कई और भी क्रिया कर्म करने पडते है,किस काम का है यह मनुष्य ?

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

गुरु का राशि परिवर्तन (वृश्चिक)मे

ज्योतिष के नौ ग्रहों के द्वारा हम सभी का जीवन संचालित होता है। हम सभी के जीवन की छोटी-बड़ी सभी घटनाओं में बदलते हुए ग्रहों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है

 कि किसी एक समय के दो अच्छे मित्र ग्रह, गोचर और दशा बदलने पर शत्रु बन जाते हैं। वास्तव में देखा जाए तो सभी जीवमात्र उस सर्वशक्तिमान सत्ता के हाथों की कठपुतलियां हैं, जिनमें धागों का कार्य नवग्रह कर रहे हैं। इसलिए धागों की दिशा अर्थात ग्रहों का गोचर बदलने पर जीवन स्वतः बदल जाता है। कभी एक और कभी एक से अधिक ग्रह वैसे तो प्रत्येक माह अपनी राशि बदलते ही रहते हैं, परन्तु जब एक साथ कई ग्रह राशि परिवर्तन करते हैं, तो परिणाम विशेष प्रभावशाली हो जाते हैं।गुरु (बृहस्पति) ज्योतिष के नवग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माने जाते हैं। गुरु मुख्य रूप से आध्यात्मिकता को विकसित करने के कारक ग्रह हैं। ये तीर्थ स्थानों, मंदिरों, पवित्र नदियों तथा धार्मिक क्रिया-कलाप से जोड़ते हैं। साथ ही गुरु ग्रह अध्यापकों, ज्योतिषियों, दार्शनिकों, संतान, जीवन-साथी, धन-सम्पत्ति, शैक्षिक गुरु, बुद्धिमत्ता, शिक्षा, ज्योतिष, तर्क, शिल्पज्ञान, अच्छे गुण, श्रद्धा, त्याग, समृद्धि, धर्म, विश्वास, धार्मिक कार्यों, राजसिक और सम्मान के सूचक ग्रह भी हैंज्योतिष के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि गुरु की कृपा से कुंडली में कई दोषों का प्रभाव कम होता है। मनुष्य जीवन में इस ग्रह का बड़ा महत्व है गुरु गोचर में वृश्चिक राशि ( Scorpio Sign )मंगल की राशी जल तत्व में गुरु और मंगल दोनों मित्र ग्रह हैं।  11 अक्टूबर 2018 को प्रवेश कीया और इसी राशि में वे 5 नवम्बर 2019 तक भ्रमण करते रहेंगे। गुरु / बृहस्पति का वृश्चिक में गोचर का प्रभाव विभिन्न भावो/ घर / House पर अलग-अलग रूप में पड़ेगा। मित्रोंआपकी कुंडली के अनुसार ग्रहों की दशा क्या कहती है, क्योंकि आपकी कुंडली के अनुसार ही गोचर फल होग आपकी कुंडली में ग्रह कहां बैठा है कौन से घर में बैठा है किसके साथ में बैठा है कौन सी राशि में बैठा है कौन से नक्षत्र में बैठा है कितने अंश पर बैठा है इसके साथ जूती कर रहा है यह सब बातें देखकर ही गोचर फल बताया जाता है और मित्रों जब भी कोई ग्रह गोचर में परिवर्तन होता है तो उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह हमारे देश पर वातावरण पर  प्रदेश का हमारे शहर का संयुक्त रूप से क्या प्रभाव पड़ेगा मित्रों सबसे पहले हम वृश्चिक राशि की ही बात करेंगे क्योंकि गुरु वृश्चिक राशि में आया है वृश्चिक राशि यानी बिच्छू बिच्छू का स्वभाव उन्ही को समझ मे आता है जो बिच्छू से आमने सामने दो दो हाथ किये होते है। बिच्छू एक धरती का जीव है जो अपने विषैले डंक के साथ जमीन के नीचे निवास करता है,उसकी उपस्थिति गर्मियों के दिनो में ही देखने को मिलती है और दिन के समय अन्धेरे स्थानों में छुपे रहना तथा रात्रि के समय जहां कीट पतंगो और मच्छरों का जमाव होता है वहां से अपने आहार को प्राप्त करने की कोशिश में लगे रहना होता है। अपने पीछे पूंछ की आकार में सुई से भी महीन डंक को प्रयोग में लाता है जैसे इंजेक्सन से दवाई को शरीर में प्रवेश करवाया गया होता है उसी तरह से बिच्छू अपने जहर को खतरे के समय और अपनी रक्षा के लिये प्राणियॊं शरीर में प्रवेश करवाकर भाग लेता है,जिससे जिस प्राणी के अन्दर इसका जहर गया होता है वह तडपने लगता है और कमजोर होता है तो मर भी जाता है,बलवान होता है तो पूरे चौबीस घंटे के बाद इसके जहर से मुक्ति मिलती है। शमशानी जीव भी इसे कहा जाता है क्योंकि यह आबादी से बाहर बाले क्षेत्र में जंगलों में पर्वतों पर और चिकनी मिट्टी वाले क्षेत्रों में मिलता है। इसका रंग काला और पीला भी होता है,सबसे खतरनाक काला बिच्छू होता है। वृश्चिक राशि के जातक भी इसी स्वभाव के होते है,उनके द्वारा की जाने वाली बात ह्रदय के अन्दर अपना पूरा असर देती है,इस राशि वाले लोग जिससे भी एक बार अपने को मिलालेते है वे हमेशा उसे अपनी कोई न कोई पहिचान दे देते है,और उस पहिचान से लोग इस राशि वाले जातक को याद रखते है। कर्क और मीन राशि से अपनी शक्ति को इकट्ठी करने के कारण इनके पास मोक्ष देने के उपाय भी होते है और भावना से अपनी पहिचान बनाने और ह्रदय के अन्दर उतरने की हिम्मत भी रखते है। दवाइयों को कई रूप में प्रयोग किया जाता है,कई दवाइयां बहुत कडवी होती है और कई दवाइयां बहुत मीठी होती है,जहर चाहे मीठा हो या कडवा कहलाया जहर ही जायेगा। भावनाओं का दरिया जब इस राशि वाले बहाने के लिये तैयार होते है तो किसी को भी अपनी भावना का प्रभाव देकर उसे अपनी तरफ़ आकर्षित कर लेते है उस समय इनके मन में कतई बैर भाव वाली बात नही होती है,इनके भावनात्मक प्रभाव को प्रदान करने वाली बुद्धि बहुत ही अजीब मानी जाती है,कारण इनकी बुद्धि की मालिक ही मीन राशि होती है और जब भी अपने को प्रदर्शित करने की कोशिश करते है तो लगता है कि यह पूरी तरह से अपने में संतुष्ट है लेकिन इनके नवें भाव में जो इकट्ठा होता है वह कर्क राशि का प्रभाव होता है,इस प्रभाव को जब यह दूसरों पर उडेलते है तो लगता है इनके पास समुद्र इकट्ठा है,लेकिन कर्क राशि के पीछे इस राशि के अष्टम की राशि मिथुन होने से और मिथुन राशि के मृत प्रभाव को जब कर्क राशि में इकट्ठा किया जाता है उसी को यह अपने लिये बडे रूप में प्रदर्शित करते है। इनकी बातों में कभी कभी बहुत ही रूखापन भी मिलता है। यह अपने अन्दर शक्ति रखते है वह शक्ति मृत शरीर में भी जान डाल देने के लिये काफ़ी मानी जाती है भौतिकता में आने के बाद यह बडी से बडी मशीनरी को अपने प्रयास से ठीक करने की इन्जीनियरिंग वाली हैसियत भी रखते है तो अस्पताली कार्यों के अन्दर दक्षता लेकर यह मरने वाले को भी अपनी शक्ति से जिसे तकनीकी शक्ति भी कहा जा सकता है जिन्दा रखने की औकात रखते है। यह अपने प्रभाव को साधारण आदमी के अन्दर अगर किसी तरह से प्रवेश करवा देते है तो वह आदमी इनसे मिले बिना भी नही रह सकता है और इनके पास भी नही रह सकता है।गुरु इस राशि मे लग्न में है और पंचम और नवम दृष्टि से प्रभावी दे रहा है गुरु की दृष्टि अमृत के समान काम भी करती है पंचम में मीन राशियह मोक्ष की भी राशि कहलाती है जैसे कर्क राशि को जन्म स्थान के नाम से जाना जाता है तो वृश्चिक राशि को मौत के स्थान से भी माना जाता है मीन राशि को आसमानी निवास भी बताया जाता है। जिसे रूह का निवास स्थान भी कहाजाता है। इस राशि के लग्न में में इस राशि के आने से इस गुरु पिछले समय से चले आ रहे धन और परिवार के सुखों से पूर्ण करने के लिये अपना असर देना शुरु करेगा,इस राशि वालों के पास जो संतान की कमी थी उसके लिये यह गुरु अपने पूरे असर के साथ अपना असर देगा और नि:संतान लोगों को अपने अस्पताली कारणों से अपने प्रभाव देकर भूण प्रत्यारोपड आदि तरीके से संतान सुलभ करवाने की कोशिश करेगा,इसके अलावा जिन लोगों के बारहवें भाव का चन्द्रमा था वे भी इस राशि के प्रभाव से अपने को लाभान्वित कर सकते है। जो लोग जल्दी से धन कमाने के साधनों के बारे में नही समझते थे उनके लिये यह गुरु कैसे और किन साधनों से धन को जल्दी कमाया जा सकता है का कारण पैदा करेगा,जो लोग पिछले समय में अपनी कविता या भावना से अपने को संसार के सामने प्रस्तुत करते रहे है उनके सामने किसी बाहरी व्यक्ति की दखलंदाजी से प्यार मोहब्बत वाली बात भी पनपेगी और वे अपने को इस साल में प्यार की जीत का साल मानने से भी दूर नही रहेंगे,इस साल के वेलेंटाइन डे पर वृश्चिक राशि वालों के द्वारा ही सबसे अधिक सन्देश देखने को मिलेंगे। मंगल की नकारात्मक राशि होने के कारण और भूत प्रेत पिशाच की शक्ति को जानने के कारण तथा अपने पूर्वजों के अन्दर अधिक विश्वास करने के कारण इस राशि के रहन सहन में भी बदलाव देखने को मिलेगा,यह गुरु धनी लोगों की संगति भी दिलवायेगा,धन के प्रति साझेदारी के मौके भी आयेंगे,वृष राशि वाले इस राशि के इस प्रकार के प्रभाव में जल्दी आयेंगे। वृश्चिक राशि के गुरु का की दृष्टि पंचम प्रभाव नवे भाव में जाने से और कर्क राशि की उपस्थिति होने से इन्हे जनता से सम्बन्धित मकान जायदाद और अपनी भावनाओं की लडाई में वाहन वाले कारणों से पानी वाले कारणों से न्याय के लिये भी जाना पड सकता है,साथ ही इनके लिये घूमने और मौज मस्ती के लिये पानी के किनारे वाले स्थान भी रास आ सकते है,हवाई यात्रायें करवाने के लिये और घूमने के मामले में जो लोग अपनी सेवायें प्रदान करते है उनके लिये भी इस गुरु का प्रभाव बहुत ही प्रभावी रहेगा।जो मित्र कर्जा दुश्मनी बीमारी और शरीर की तकलीफ़ों से जूझ रहे है वे इस राशि की बुद्धि का सहारा लेकर अपने में राहत महसूस करेंगे, बारहवें भाव में तुला राशि के होने से जो भी फ़ैसला इनके द्वारा बाहरी सामजस्य बैठाने के लिये किया जायेगा उसके अन्दर केवल त्याग की भावना ही समझ में आयेगी इनके द्वारा जो भी फ़ैसला बाहरी आफ़तों के लिये दिया जायेगा वह केवल त्याग के प्रति ही माना जा सकता है। इन्हे बाहरी कार्यों से ब्रोकर वाला कार्य करने के बाद भी धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होने के कारण बनेंगे,जो लोग अपने व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को बाहरी क्षेत्रों में स्थापित करने के लिये अपने प्रयास कर रहे है उनके प्रयासों भी सफ़लतायें सामने आयेंगी। वृश्चिक राशि के बुद्धि वाले भाव में गुरु की Drishti दृष्टि होने के कारण जो विद्यार्थी पहले से अपने को किसी भी विषय में कमजोर मानते आये है उनके लिये यह गुरु सुनहरा अवसर प्रदान कर रहा है वे अगर अपनी बुद्धि को जरा सा भी समय देकर फ़ैलाने की कोशिश करते है और अपने अन्दर पैदा होने वाले विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षण में कमी कर लेते है तो उन्हे उच्च सफ़लता में जाने से कोई रोक नही सकता है। इस राशि के पंचम में गुरु गुरु की दृष्टि पढ़ने का एक प्रभाव और भी सामने आता है वह होता है उनके अन्दर जो पहले से भावनात्मक मित्र जुडे होते है उनसे परित्याग की भावना इस गुरु के द्वारा पैदा होती है,जो लोग पहले से किसी जनता से जुडी कमन्युटी से अपने को बांधे बैठे है वे अपने कार्यों की अधिकता से अब अधिक वक्त इस प्रकार की कमन्युटी के प्रति नही पायेंगे। मित्रों बाकी आपकी कुंडली के द्वारा फल  आचार्य राजेश

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

मंत्र विज्ञान और भौतिक विज्ञान

मंत्र होते है असीम शक्तियों के स्वामी अब विज्ञान भी है मानता“मन्त्र” से तात्पर्य  एक विशिष्ट प्रकार के संयोजित वर्णों के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि सेभौ है… और, वह ध्वनि ही हमारे शरीर के विभिन्न स्थानों में स्थिति अन्तश्चक्रों को ध्वनित कर…. जाग्रत एवं प्रखर ऊर्जावान बनाकर आत्मशक्ति एवं जीवनी शक्ति का विकास करती है.सारे मंत्र सारे संस्‍कृत के अक्षरों से बने है। और प्रत्‍येक अक्षर मूलत: ध्‍वनि है, और प्रत्‍येक ध्‍वनि एक तरंग है।

भोतिक विज्ञान मानती है कि आस्‍तित्‍व तरंगों से बना हुआ है। ध्‍वनि दो प्रकार की होती है। आहत और अनाहत। मन से जैसे ही विचार उठा, कल्‍पना उभरी, वैसे ही ध्‍वनि पैदा होती है: लेकिन यह ध्‍वनि सुनाई नहीं देती दूसरी ध्‍वनि है जो दो वस्‍तुओं के आघात से उत्‍पन्‍न होती है। यह ध्‍वनि आहत है, श्रवणीय है। सूक्ष्‍म तल पर ध्‍वनि आहत है, श्रवणीय है। सूक्ष्‍म तल पर ध्‍वनि प्रकाश बन जाती है। इसलिए उसे पश्‍यन्‍ती कहते है।तंत्र कहता है, प्रत्‍येक वस्‍तु गहरे में ध्‍वनि तरंग है। इस लिए पूरी साकार सृष्‍टि ध्‍वनियों के विभिन्‍न मिश्रणों का परिणाम है। ध्‍वनि के इस सिद्धांत से ही मंत्र शास्‍त्र पैदा हुआ है। मंत्र की शक्‍ति उसके शब्‍दों के अर्थ में नहीं है। उसकी तरंगों की सघनता में है। ध्‍वनि सूक्ष्‍म तल पन प्रकाशबन जाती है। और उसके रंग भी होते है। जो सामान्‍य चक्षु को नहीं दिखाई देते। तांत्रिक यंत्र ऊपर से देखने पर ज्‍यामिति की भिन्‍न-भिन्‍न आकृतियां दिखाई देती है। लेकिन यंत्र का रहस्‍य समझने के लिए ज्‍यामिति की रेखाओं के पार जाना पड़ेगा। यंत्र एक शक्‍ति का रेखांकन है। वह विशिष्‍ट वैशिवक शक्‍ति का एक प्रकटीकरण है।यंत्र की रेखाएं, कोण, बिंदु और इनका आपसी संबंध, इनका राग-रागिनियों से गहरा रिश्ता है। जैसे हर राम के सुनिश्‍चित सुर होते है, उनका परस्‍पर मेल होता है वैसे यंत्र की रेखाओं का आपसी स्‍वमेल होता है।ध्यान रखें कि मंत्रों की शक्ति असीम है क्योंकि, मंत्र एक वैज्ञानिक विचारधारा हैइस विज्ञान को ठीक से समझने के लिए…. आप किसी गाने का उदाहरण ले सकते हो जिस प्रकार हम किसी रोमांटिक गाने को सुनकर प्यार की दुखद गाने को सुनकर दुःख की और, देशभक्ति गाने को सुनकर ओज का अनुभव करते हैं उसी प्रकार विभिन्न मंत्रोच्चार का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होता हैअसल में आधुनिक भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार मन्त्रों को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं

(1) शब्दों की ध्वनि

(2) आंतरिक विद्युत धारा… इसे विज्ञान की पारिभाषित शब्दावली में “अल्फा तरंग” भी कहा जा सकता है।

गौर करने लायक बात यह है जब किसी मंत्र का उच्चारण किया जाता हैतो  उस से ध्वनि उत्पन्न होती हैऔर, उस ध्वनि के उत्पन्न होने पर अंत:करण में कंपन उत्पन्न होता है तथा, यह ध्वनि कंपन के कारण तरंगों में परिवर्तित होकर वातावरण में व्याप्त हो जाती है  एवं, इसके साथ ही आंतरिक विद्युत भी (तरंगों में) इसमें व्याप्त रहती है।इस तरह यह आंतरिक विद्युत जो शब्द उच्चारण से उत्पन्न तरंगों में निहित रहती है.शब्द की लहरों को व्यक्ति विशेष तथा दिशा विशेष की ओर भेजती है अथवा , इच्छित कार्य में सिद्धि दिलाने में सहायक होती है।यह बात वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा भी मान ली गई है कि  ध्यान, मनन, चिंतन आदि की अवस्था में जब रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप शरीर में विद्युत जैसी एक धारा प्रवाहित होती है (इसे हम शारीरिक विद्युत कह सकते हैं) तथा, मस्तिष्क से विशेष प्रकार का विकिरण उत्पन्न होता है . जिसका नाम “अल्फा तरंग” रखा गया है (इसे हम मानसिक विद्युत कह सकते हैं)यही अल्फा तरंग मंत्रों के उच्चारण करने पर निकलने वाली ध्वनि के साथ गमन कर दूसरे व्यक्ति को प्रभावित कर या इच्छित कार्य करने में सहायक होती हैऔर, वो मंत्र जिस उद्देश्य से जपा जा रहा है, उसमें सफलता दिलाने में यह सहायक सिद्ध होते हैं।g इसे हम वैज्ञानिक भाषा मेंमानसिक विद्युत” या “अल्फा तरंग” को “ज्ञानधारा” भी कह सकते हैं। मनोविज्ञान के विद्वानों ने प्रयोगों और परीक्षणों के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य के मस्तिष्क में बार-बार जिन विचारों अथवा शब्दों का उदय होता है उन शब्दों की एक स्थाई छाप मानस पटल पर अंकित हो जाती है और एक समय ऐसा भी आता है  जब वह स्वयं ही मंत्रमय हो जाता (मंत्र की लय में खो जाता) है और यदि यह विचार आनंददायक हों, मंत्र कल्याणकारी हो,तो इन्हीं के परिणाम मनुष्य को आनंदानुभूति करवाने वाले सिद्ध होते हैं fक्योंकि, कभी-कभी मनुष्य के जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं जब उसका मन खिन्न एवं दुखी होता है।तो , ऐसा उस मनुष्य के अपने ही पूर्व संचित कर्म के परिणामस्वरूप ही होता हैआपको यह जानकार काफी ख़ुशी होगी कि. अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार.सरयुक्त फेफड़ों, आंत, मस्तिष्क, स्तन, त्वचा और फाइब्रो ब्लास्ट की लाइनिंग्स पर जब सामवेद के मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ का प्रभाव परखा गया. तो , कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि में भारी गिरावट आई.जबकि, इसके विपरीत तेज गति वाले पाश्चात्य और तेज ध्वनि वाले रॉक संगीत से कैंसर की कोशिकाओं में तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई।सिर्फ इतना ही नहीं मंत्र चिकित्सा के लगभग पचास रोगों के पांच हजार मरीजों पर किए गए क्लीनिकल परीक्षणों के अनुसार. दमा एवं अस्थमा रोग में सत्तर प्रतिशत स्त्री रोगों में 65 प्रतिशत.त्वचा एवं चिंता संबंधी रोगों में साठ प्रतिशत.उच्च रक्तदाब यानी हाइपरटेंशन से पीड़ितों में पचपन प्रतिशत.आर्थराइटिस में इक्यावन प्रतिशत.डिस्क संबंधी समस्याओं मेंइकतालीसप्रतिशत,. आंखों के रोगों में इकतालीस प्रतिशत तथा एलर्जी की विविध अवस्थाओं में चालीस प्रतिशत का औसत लाभ हुआ.इस तरह हम गर्व से कह सकते हैं किनिश्चित ही हमारे हिन्दू सनातन धर्म के मंत्र चिकित्सा उन लोगों के लिए तो वरदान है . जो पुराने और जीर्ण क्रॉनिक रोगों से ग्रस्त हैंकहा गया है कि जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है.तो अनेक प्रकार नाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं...!यहाँ तककि जर्मन वैज्ञानिक भी कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता है तो , उसके बोलने में सिर्फ 175 प्रकार के आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है.जव, कोई कोयल पंचम स्वर में गाती है तो उसकी आवाज में 500 प्रकार का प्रकंपन होता है ......लेकिन जब दक्षिण भारत के विद्वानों से जब विधिपूर्वक गायत्री मंत्र का पाठ कराया गया......तो यंत्रों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि गायत्री मंत्र का पाठ करने से संपूर्ण स्पंदन के जो अनुभव हुए. वे 700 प्रकार के थे।इस शोध के बाद. जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है कि........ अगर कोई व्यक्ति पाठ नहीं भी करे... और, सिर्फ पाठ सुन भी ले तो भी उसके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है .क्योंकि इसके अंदर जो वाइब्रेशन है, वह अदभुत है.आप एक प्रयोग करे, किसी राह चलते आदमी को माँ बहन की गाली दे, ये भी एक तरह का भड़काऊ मंत्र है, आप उसका फल 2 मिनिट मे ही अपने गाल पर तमाचे के रूप मे देख लेगे॥हमेशा याद रखें हमारा हिन्दू सनातन धर्म .मानव प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना है.क्योंकि यही एक ऐसा धर्म है , जो बुद्धि-विवेक से .और, वैज्ञानिकता से युक्त युक्त है.एवं पुरे समाज के कल्याण हेतु है ! आचार्य राजेश

नवार्ण मंत्र ओर ज्योतिष

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही ज्योतिषीय महत्व रहा है। हमारी वैदिक भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ पर मनाये जाने वाले सभी त्यौहार व्यावहारिक और वैज्ञानिक तौर पर खरे उतरते है।“ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे”

नव अक्षरों वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र के हर अक्षर में देवी दुर्गा कि एक-एक शक्ति समायी हुई हैं, जिस का संबंध एक-एक ग्रहों से हैं।आप भी पङे ओर लाभ उठाऐ दुर्गा दुखों का नाश करने वाली देवी है। दुर्गा की इन नौ शक्तियों को जागृत करने के लिए दुर्गा के 'नवार्ण मंत्र' का जाप किया जाता है। इसलिए नवरात्रि में जब उनकी पूजा आस्था, श्रद्धा से की जाती है तो उनकी नौ शक्तियां जागृत होकर नौ ग्रहों को नियंत्रित कर देती हैं। फलस्वरूप प्राणियों का कोई अनिष्ट नहीं हो पाता। दुर्गा की इन नौ शक्तियों को जागृत करने के लिए दुर्गा के 'नवार्ण मंत्र' का जाप किया जाता है। नव का अर्थ 'नौ' तथा अर्ण का अर्थ 'अक्षर' होता है। अतः नवार्ण नौ अक्षरों वाला वह मंत्र है । नवार्ण मंत्र- 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै ।' नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ' ऐं ' है जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैलपुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवरात्रि' को की जाती है। दूसरा अक्षर ' ह्रीं ' है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है। तीसरा अक्षर ' क्लीं ' है, जो मंगल ग्रह को नियंत्रित करता है।इसका संबंध दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघंटा से है, जिसकी पूजा तीसरे नवरात्रि को होती है। चौथा अक्षर 'चा' है जो बुध को नियंत्रित करता है। इनकी देवी कुष्माण्डा है जिनकी पूजा चौथे नवरात्री को होती है। पांचवां अक्षर 'मुं' है जो गुरु ग्रह को नियंत्रित करता है। इनकी देवी स्कंदमाता है पांचवे नवरात्रि को इनकी पूजा की जाती है। छठा अक्षर 'डा' है जो शुक्र ग्रह को नियंत्रित करता है। छठे नवरात्री को माँ कात्यायिनी की पूजा की जाती है। सातवां अक्षर 'यै' है जो शनि ग्रह को नियंत्रित करता है। इस दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। आठवां अक्षर 'वि' है जो राहू को नियंत्रित करता है । नवरात्री के इस दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। नौवा अक्षर 'च्चै ' है। जो केतु ग्रह को नियंत्रित करता है। नवरात्री के इस दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

करीना कपूर की जन्मकुंडली

करीना कपूर का जन्म सन् 21 सितंबर 1980 चंद्र की महादशा के अंतरगत हुआ है इस दशा में चंद्रमा खराब कोने के कारण उनकी माँ को स्वास्थ ख़राब व मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा करीना कपूर 

की जन्म कुंडली के अनुसार उनकी माता को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा और अपनी पढ़ाई - लिखाई की भी परेसाहनीयो का सामना करना पड़ा। करीना कपूर को स्वम की जिन्दगी में खर्चों की अधिकता व घूमने फिरने का शौक रहा तथा उनके खर्चे भी अधिक रहे। यह थोड़ा इसलिए रहा क्योकि इनकी जन्म कुनल्दी में शुक्र - राहु के मेल 8 वे घर में इनको मौज मस्ती व शौक प्रदान किये। यह थोड़ा कभी कभी इंसान जीवन में गलत संगती भी पैदा करता है।बुध ग्रह ने दी आकर्षण शक्ति....करीना की कुंडली में सूर्य जिस भाव में बैठा है। उसके फल से करीना आर्थिक रूप से सुखी है। परंतु ग्रह के अनुसार स्वयं की दुर्बलता के कारण करीना को क्रोध आता है। गुरु ने भी करीना का भाग्योदय किया। लेकिन गुरु शारीरिक कष्ट दे सकता है कुंडली में शुक्र की स्थिति करीना को विलासी बनाती है साथ ही पारिवारिक सुख देती है। शुक्र घमंडी भी बनता है। शनि करीना को तीव्र बुद्धि ओर मृदु स्वभाव वाला बनाता है। राहु-केतु मध्यम फल देते हैं।करीना का जन्म चन्द्र की महादशा में हुआ है गुरु की महादशा चल रही हैकुंडली में चन्द्र की स्थिति ने करीना को शारीरिक सुन्दरता प्रदान की। मंगल ने फिल्मी दुनिया में उच्च स्थान प्राप्त कराया। कुंडली में बुध स्व-राशि पर विराजमान होने से भी करीना आर्थिक, भौतिक रूप से सुखी है एवं बुध के प्रभाव से करीना दर्शकों को आकर्षित करने का गुण रखती है।इनकी जन्म कुंडली में बैठे 10 वे घर में सूर्य, शनि व बुध के मेल में इनको काम काज व अपने पिता के सुखो में खराबी का सामना करवाया साथ ही स्वभाव में गुस्सा व चिड़चिड़ापन की स्थिति भी पैदा कराई। करीना कपूर के जिंदगी में मान सम्मान व पिता के सुखों में बढ़ोतरी तब हुई जब गुरु की महादशा उनके जीवन में लगी तथा संस्कारों में रहकर व अपने घर - परिवार से जुड़कर इन्होंने अपने कैरियर काम किया व सफल अभिनेत्री का मुकाम भी पाया साथ ही साथ बुध की उत्तरदशा में एक विवाह सम्पन हुआ परंतु आज की दशा के अनुसार इनकी शारारिक समस्याओं से ग्रस्त होना पड़ सकता है।  (जुलाई 2017 के बाद इनकेसितारे सही चल रहे है जीवन में प्रसिद्धि, यश और मान सम्मान प्राप्त   2019 में  माता तथा खुद को मानसिक व धन सम्बंधित परेशानियों का सामना करवा सकता है।फिलहाल करीना पर गुरु की महादशा चल रही है। करीना पर गुरु की महादशा 18-9-2026 तक रहेगी। वहीं राहु ग्रह के कारण करीना को पैरों में दर्द का सामना भी करना पड़ सकता है।करीना कपूर को माणिक, पुखराज व हीरे का संयुक्त लॉकेट धारण करना चाहिए। यह उनके लिए शुभ साबित हो सकता है।

नवरात्र का विज्ञान

'मित्रो नवरात्र' शब्द से नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियों) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नवरूपों की उपासना की जाती है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक हैहमारे ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को 'रात्रि' न कहकर 'दिन' ही कहा जाता लेकिन नवरात्र के दिन, 'नवदिन' नहीं कहे जाते।हमारे मनीषियों ने वर्ष में 2 बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से 9 दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मास बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के 1 दिन पूर्व तक। परंतु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।इन नवरात्रोंमे साघक अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि  कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। लेकिन आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं, पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। सामान्य भक्त ही नहीं, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और न ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। बहुत कम उपासक आलस्य को त्यागकर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।

मनीषियों ने नवरात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है, जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।वैज्ञानिक सिद्धांत यह भी है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं, उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है। मित्रों सही मायने में यह समय आत्म निरीक्षण और अपने स्रोत की ओर वापिस जाने का समय है। परिवर्तन के इस काल के दौरान प्रकृति भी पुराने को झाड़ कर नवीन हो जाती है; जानवर शीतनिद्रा में चले जाते हैं और बसंत के मौसम में जीवन वापिस नए सिरे से खिल उठता है।विज्ञान के अनुसार पदार्थ अपने मूल रूप में वापिस आकर फिर से अपनी रचना करता है। यह सृष्टि सीधी रेखा में नहीं चल रही है बल्कि यह चक्रीय है, प्रकृति के द्वारा हर वस्तु का नवीनीकरण हो रहा है- कायाकल्प की यह एक सतत प्रक्रिया है। नवरात्रि का त्यौहार अपने मन को वापिस अपने स्रोत की ओर ले जाने के लिए है।प्रार्थना, मौन, उपवास और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्रोत की ओर यात्रा करता है। रात को भी रात्रि कहते हैं क्योंकि वह भी नवीनता और ताज़गी लाती है। वह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों पर राहत देती है- स्थूल शरीर को, सूक्ष्म शरीर को, और कारण शरीर को। उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है, मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुद्धता आती है और बातूनी मन शांत होता है, और ध्यान के द्वारा अपने अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर हमें आत्मसाक्षात्कार मिलता है।यह आंतरिक यात्रा हमारे बुरे कर्मों को समाप्त करती है। नवरात्रि प्राणों का उत्सव है जिसके द्वारा ही महिषासुर (अर्थात जड़ता), शुम्भ-निशुम्भ (अहंकार और शर्म) और मधु-कैटभ (अत्यधिक राग-द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है। वे एक दूसरे से पूर्णत: विपरीत हैं, फिर भी एक दूसरे के पूरक हैं। जड़ता, गहरी नकारात्मकता और मनोग्रस्तियाँ (रक्तबीजासुर), बेमतलब का वितर्क (चंड-मुंड) और धुँधली दृष्टि (धूम्रलोचन्) को केवल प्राण ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है।नवरात्रि के नौ दिन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रह्मांड में आनन्दित रहने का भी एक अवसर है। यद्यपि हमारा जीवन इन तीन गुणों के द्वारा ही संचालित है, हम उन्हें कम ही पहचान पाते हैं या उनके बारे में विचार करते हैं। नवरात्रि के पहले तीन दिन तमोगुण के हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुण के और आखिरी तीन दिन सत्त्व के लिये हैं। हमारी चेतना इन तमोगुण और रजोगुण के बीच बहती हुई सत्वगुण के आखिरी तीन दिनों में खिल उठती है। जब भी जीवन में सत्व बढ़ता है नवरात्र का विज्ञान, तब हमें विजय मिलती है। इस ज्ञान का सारतत्व जश्न के रूप में दसवें दिन विजयदश्मी द्वारा मनाया जाता है।

यह तीन मौलिक गुण हमारे भव्य ब्रह्मांड की स्त्री शक्ति माने गये हैं। नवरात्रि के दौरान देवी माँ की पूजा करके हम त्रिगुणों में सामंजस्य लाते हैं और वातावरण में सत्व के स्तर को बढ़ाते हैं। हालाकि नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनायी जाती है, परंतु वास्तविकता में यह लड़ाई अच्छे और बुरे के बीच में नहीं है। वेदांत की दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है। जैसा अष्टावक्र ने कहा था - लहर अपनी पहचान को समुद्र से अलग रखने की लाख कोशिश करती है, लेकिन कोई लाभ नहीं होता।हालाकि इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है, लेकिन उनके बीच अलगाव की भावना ही द्वंद का कारण है। एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवंत है। जैसे बच्चों को सब कुछ जीवित ही जान पड़ता है, ठीक उसी प्रकार उसे भी सब में जीवन दिखता है। देवी माँ या शुद्ध चेतना ही हर नाम और रूप में व्याप्त हैं। हर नाम और हर रूप में एक ही देवत्व को जानना ही नवरात्रि का उत्सव है। आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के द्वारा जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है।काली माँ प्रकृति की सबसे भयानक अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है, फिर भी उसका एक भयानक रूप भी है। इस द्वैत यथार्थ को मानकर मन में एक स्वीकृति आ जाती है और मन को आराम मिलता है।देवी माँ को सिर्फ बुद्धि के रूप में ही नहीं जाना जाता, बल्कि भ्रांति के रूप में भी; वह न सिर्फ लक्ष्मी (समृद्धि) है, वह भूख (क्षुधा) भी हैं और प्यास (तृष्णा) भी है। सम्पूर्ण सृष्टि में देवी माँ के इस दोहरे पहलू को पहचान कर एक गहरी समाधि लग जाती है। यह पश्चिम में चले आ रहे सदियों के पुराने धार्मिक संघर्ष का भी एक उत्तर है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के द्वारा अद्वैत सिद्धि प्राप्त की जा सकती है अथवा इस अद्वैत चेतना में पूर्णता की स्थिति प्राप्त की जा सकती है।शेष अगले लेख में आचार्य राजेश

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

रत्न विज्ञान

मित्रो जय माता दी वोहोत  से मित्र मुझे inbox मे मेल करते है 

ओर पुछते है मेरा लगन का स्वामी 6 भाव मे है तो क्या रतन लगन के गृह स्वामी का पहन सकता हु वैसे तो मैने रतनो पर पहले ही वोहोत  सी पोस्ट ङाली है पर आज ऐक ओर सुत्र आपको वताता हु जो ना तो किसी किताव मे या कही ओर लीखा नही मिलेगा  मित्रो मेष लगन की उदाहरन लेते है मान लो मंगल यहा लग्न का स्वामी होकर 6 भाव मे है यहा मंगल सुर्य  चन्द्र  या मंगल के नछतरो  मे होगा मान लो मंगल सुर्य  के नछतरमेहै ओर सुर्य 8 भाव मे है तो मुंगा रतन लाभ नही होगा चाहै 9रती से लेकर 50 रती का पहन लो अव यही सुरज 11 भाव मे हो तो यहा मुगा वहुँत  लाभ देगा यहा  रुवी भी पहना जा सकता है सुर्य  किस नछतरो  मे है यहा यह अभी नही चर्चा  करुंगा  वात लम्वी हो जाऐगी वस जो मे समझाना चाहता हु उसे समझे हा कुछ  लोग समझते है कि रतन पहनने से रातो रात हमारी सारी परेशानी  दुर हो जाऐगी ऐसा नही है दोस्तो   आपकी कुंङली  मे गृह ओर उसमे वनने वाले योग पर निर्भर  होता है हो सकता लाभ 2 "4दिन मे ही मिलना शुरु हो किसी मित्र को 6या7 माह भी लग सकते है 10से 12माह भी कुंङली  ऐसे ले मेष लग्न हो ओर मंगल 6 भाव मे हो तो भी परिणाम  अलग अलग ही आऐगे वाकी चर्चा  फिर कभी जय माता दी आचार्य  राजेश  09414481324 07597718725

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

जीवन चलने का नाम

जिंदगी है तो संघर्ष हैं, तनाव है, ख़ुशी है, डर है।  लेकिन अच्छी बात यह है कि ये सभी अनित्य हैं। समयरूपी नदी के प्रवाह में सब प्रवाहमान हैं। 

इसलिए कोई भी परिस्थिति चाहे ख़ुशी की हो या ग़म की, कभी स्थाई नहीं होती,

 वह समय के अविरल प्रवाह में विलीन हो जाती है

ऐसा अधिकतर होता है कि जीवन की यात्रा के दौरान हम अपने आप को कई बार दुःख, तनाव, चिंता, डर, हताशा, निराशा,भय, रोग इत्यादि के मकडजाल में फंसा हुआ पाते हैं।

और  हम तत्कालिक परिस्थितियों के इतने वशीभूत हो जाते हैं कि दूर-दूर तक देखने पर भी हमें कोई प्रकाश की किरण मात्र भी दिखाई नहीं देती। दूर से चींटी की तरह महसूस होने वाली परेशानी हमारे नजदीक आते-आते हाथी के जैसा रूप धारण कर लेती है।  हम उसकी विशालता और भयावहता के आगे समर्पण कर परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी हो जाने देते हैं । यही परिस्थिति हमारे पूरे वजूद को हिला डालती है, हमें हताशा, निराशा के भंवर में उलझा जाती है। हमे एक-एक क्षण पहाड़ सा प्रतीत होता है  और हम में से ज्यादातर लोग आशा की कोई किरण ना देख पाने के कारण हताश होकर परिस्थिति के आगे अपने हथियार डाल देते हैं।

इसलिए मैं यही कहूँगा की अगर हम किसी भी अनजान, निर्जन रेगिस्तान मे फँस जाएँ तो उससे निकलने का एक ही उपाय है, बस हम चलते रहें। क्योंकि अगर हम नदी के बीच जाकर अपने हाथ पैर नहीं चलाएँगे तो निश्चित ही डूब जाएंगे।

इसलिये हमारे जीवन मे कभी ऐसे क्षण भी आते है, जब लगता है की बस अब कुछ भी बाकी नहीं है, तब हमें ऐसी परिस्थिति में अपने आत्मविश्वास और साहस से सिर्फ डटे रहना चाहिए क्योंकि हर चीज का हल होता हैं,आज नहीं तो कल आता हैं ।जय माता दी शुभरात्रि मित्रों

रविवार, 16 सितंबर 2018

रूचक योग

रूचक योग

रूचक योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित एक अति , शुभ तथा दुर्लभ योग हैमंगल अपनी उच्च राशि, मूल त्रिकोण अथवा स्वराशि में होने पर रूचक (Ruchak Yoga) योग का निर्माण करता है.ज्योतिषशास्त्र में पंच महापुरूष नामक योग के अन्तर्गत इस योग का उल्लेख किया गया है.

 आपकी कुण्डली में यह योग है और आपको इसका क्या फल मिल रहा है. तथा इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फल  यह कहा जा सकता है कि केवल मंगल की कुंडली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता तथा किसी कुंडली में रूचक योग के निर्माण के कुछ अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी भी अन्य शुभ योग के निर्माण के भांति ही रूचक योग के निर्माण के लिए भी यह अति आवश्यक है कि कुंडली में मंगल शुभ हों क्योंकि कुंडली में मंगल के अशुभ होने से मंगल के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी रूचक योग नहीं बनेगा अपितु इस स्थिति में मंगल कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं। कुंडली के जिन चार घरों में शुभ मंगल के किसी राशि विशेष में स्थित होने से रूचक योग बनता है, उनमें से तीन घरों 1, 4 तथा 7 में अशुभ मंगल के स्थित होने से मांगलिक दोष भी बन सकता है जो अपनी स्थिति के आधार पर जातक को विभिन्न प्रकार के अशुभ फल दे सकता है। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि मेंष, वृश्चिक अथवा मकर में स्थित होने से मंगल को अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इस स्थिति में इतने बलशाली मंगल के अशुभ होने के कारण बनने वाला मांगलिक दोष भी सामान्यतया बहुत बलशाली होता है जिसके कारण इस प्रकार के बलवान मांगलिक दोष के प्रभाव में आने वाले जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत हानि उठानी पड़ सकती है।

इस प्रकार किसी कुंडली में रूचक योग बनने अथवा मांगलिक दोष बनने के बीच का अंतर मुख्यतया कुंडली में मंगल का शुभ अथवा अशुभ होना ही होता है जिसके कारण रूचक योग बनाने के लिए मंगल का कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है क्योंकि अशुभ मंगल कुंडली में रूचक योग के स्थान पर मांगलिक दोष बना सकता है। कुंडली में मंगल के शुभ होने के पश्चात यह भी देखना चाहिए कि कुंडली में मंगल को कौन से शुभ अथवा अशुभ ग्रह प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि किसी कुंडली में शुभ मंगल पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव मंगल द्वारा बनाए जाने वाले रूचक योग के शुभ फलों को कम कर सकता है तथा किसी कुंडली में शुभ मंगल पर दो या दो से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रबल प्रभाव कुंडली में बनने वाले रूचक योग को प्रभावहीन भी बना सकता है। इसके विपरीत किसी कुंडली में शुभ मंगल पर शुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली में बनने वाले रूचक योग के शुभ फलों को और भी बढ़ा सकता है जिससे जातक को प्राप्त होने वाले शुभ फलों में बहुत वृद्धि हो जाएगी। 


इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ अशुभ योगों अथवा दोषों का भी भली भांति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बनने वाले पित्र दोष, मांगलिक दोष तथा काल सर्प दोष जैसे दोष रूचक योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ योग इस योग के प्रभाव को और अधिक बढ़ा सकते हैं। इसलिए किसी कुंडली में रूचक योग के निर्माण तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी नियमों का उचित रूप से अध्ययन कर लेना चाहिए।मोदी के जन्म के समय लग्न का स्वामी मंगल लग्न में ही था। यदि स्वराशि का मंगल केंद्र में हो तो पंचमहापुरुष योग में से एक रूचक योग बनता है। रूचक योग के बारे में कहा जाता है कि यह योग जिस जातक की पत्रिका में होता है, वह जातक साहसी, पराक्रमी, दृढ़ निश्चय वाला, प्रबल रूप से शत्रुहंता होता है। कुंडली के पहले घर में बनने वाला रूचक योग जातक को शारीरिक बल, स्वास्थय, पराक्रम, व्यवासायिक सफलता, सुखी वैवाहिक जीवन आदि जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है। कुंडली के चौथे घर में बनने वाला रूचक योग जातक को संपत्ति, वैवाहिक सुख, वाहन, घर तथा वयवसायिक सफलता जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है। सातवें घर का रूचक योग जातक को वैवाहिक सुख, व्यवसायिक सफलता तथा प्रतिष्ठा और प्रभुत्व वाला कोई पद प्रदान कर सकता है। दसवें घर का रूचक योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम दे सकता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक अपने समय के बहुत प्रसिद्ध सेनानायक, योद्धा, पुलिस अधिकारी तथा रक्षा विभाग से जुड़े अन्य अधिकारी हो सकते हैं।इस योग वाले व्यक्ति को कमजोर और गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए लेखक आचार्य राजेश

Malavya yog) मालव्य योग

मालव्य योग को यदि लक्ष्मी योगों का शिरोमणी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं। मालव्य योग की प्रशंसा सभी ज्योतिष ग्रन्थों में की गई है। यह योग शुक्र से बनता है तथा शुक्र को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। अतः लक्ष्मी योग के रूप मेें इसकी महता और भी बढ़ जाती है।

मालव्य योग (Malavya yog) मालव्य योग का निर्माण शुक्र करते हैं जब शुक्र वृषभ और तुला जो कि स्वराशि हैं या फिर मीन जो कि इनकी उच्च राशि है में होकर प्रथम, चतुर्थ, सप्तम या फिर दसवें भाव में विराजमान हों तो यह योग मालव्य महापुरुष योग कहलाता है। मित्रों कोई भी योग तब बलवान होता है जब वह ग्रह जिससे योग बन रहा हो बलि हो लग्न से शुभ हो शुभ भाव शुभ राशि और वह ग्रह पीड़ित ना हो  पूर्ण बली हों तो ही उत्‍कृष्‍ट फल मिलते हैं। दूसरे ग्रहों का प्रभाव आने पर फल में उच्‍चता अथवा न्‍यूनता देखी जाती है। ऐसे में पंचमहापुरुष योगों में अधिकतम फल तब गिनना चाहिए जब बताया गया योग पूरी तरह दोषमुक्‍त हो। इन पांचों योगों में अगर मंगल आदि के साथ सूर्य एवं चंद्रमा भी हो तो जातक राजा नहीं होता, केवल उन ग्रहों की दशा में उसे उत्‍तम फल मिलते हैं। इन पांच योगों में से यदि किसी की कुण्‍डली में एक योग हो तो वह भाग्‍यशाली दो हो तो राजा तुल्‍य, तीन हो तो राजा, चार हो तो राजाओं में प्रधान राजा और यदि पांचों हो तो चक्रवर्ती राजा होता है। इस कथन में यह स्‍पष्‍ट नहीं होता कि ये पांचों योग किस प्रकार मिल सकते हैं। क्योंकि शुक्र ग्रह से बनता है इसलिए उस जातक में शुक्र ग्रह के शुभ गुण आएंगे ऐसे  योग में जन्‍म लेने वाला जातक सुंदर, कोमल एवं कांतियुक्‍त आकृति का होता है। उसके शरीर के अंग सुडौल, भृकुटी सुंदर, काले केश, ग्रीवा शंख के समान, रक्‍त श्‍यामवर्ण, कमर पतली।मालव्य योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति भाग्यशाली, धैर्यवान, आकर्षित एवं ऐश्वर्य दायक जीवन जीने वाले, बहुत जिंदादिल, अच्छे से अच्छी गाड़ी, मकान व सभी सांसारिक सुखों को भोगने वाले सुगन्धित द्रव्यों के शौकिन, घूमने के शौकिन, कम प्रयासों के ही जीवन में सारे भोग इन्हें प्राप्त होते है। इस योग वाले लक्ष्मीवान से भी ज्यादा वैभवान होते है। इनके चेहरे पर विलक्षण, सौम्य आभा रहती है। सिनेपटल के राजकपूर की कुण्डली में भी तुला राशि में सुख, वैभव के भाव में विराजित शुक्र मालव्य योग घटित कर विराजित है। अद्वितीय प्रतिभा के धनी राजकपूर ने हिन्दी सिनेमा को नए आयाम दिए। उनके आकर्षक व चुम्बकीय व्यक्तित्व पर मालव्य योग का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। इसके अलावा भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, स्मिता पाटील, तब्बू आदि अनेक प्रसिद्ध हस्तियों की कुण्डली में यह योग घटित हो रहा है।मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा का यदि ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लगभग हर 12वीं कुंडली में मालव्य योग का निर्माण होता है। कुंडली में 12 घर तथा 12 राशियां होती हैं तथा इनमें से किसी भी एक घर में शुक्र के स्थित होने की संभावना 12 में से 1 रहेगी तथा इसी प्रकार 12 राशियों में से भी किसी एक राशि में शुक्र के स्थित होने की संभावना 12 में से एक ही रहेगी। इस प्रकार 12 राशियों तथा बारह घरों के संयोग से किसी कुंडली में शुक्र के किसी एक विशेष राशि में ही किसी एक विशेष घर में स्थित होने का संयोग 144 में से एक कुंडलियों में बनता है जैसे कि लगभग प्रत्येक 144वीं कुंडली में शुक्र पहले घर में मीन राशि में स्थित होते हैं। मालव्य योग के निर्माण पर ध्यान दें तो यह देख सकते हैं कि कुंडली के पहले घर में शुक्र तीन राशियों वृष, तुला तथा मीन में स्थित होने पर मालव्य योग बनाते हैं। इसी प्रकार शुक्र के किसी कुंडली के चौथे, सातवें अथवा दसवें घर में भी मालव्य योग का निर्माण करने की संभावना 144 में से 3 ही रहेगी तथा इन सभी संभावनाओं का योग 12 आता है जो कुल संभावनाओं अर्थात 144 का 12वां भाग है जिसका अर्थ यह हुआ कि मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग हर 12वीं कुंडली में इस योग का निर्माण होता है ज्योतिष मे

 वर्णित एक अति शुभ तथा दुर्लभ योग है तथा इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फल प्रत्येक 12वें व्यक्ति में देखने को नहीं मिलते जिसके कारण यह कहा जा सकता है कि केवल शुक्र की कुंडली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता तथा किसी कुंडली में मालव्य योग के निर्माण के कुछ अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी भी अन्य शुभ योग के निर्माण के भांति ही मालव्य योग के निर्माण के लिए भी यह अति आवश्यक है कि कुंडली में शुक्र शुभ हों क्योंकि कुंडली में शुक्र के अशुभ होने से शुक्र के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी मालव्य योग नहीं बनेगा अपितु इस स्थिति में शुक्र कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में अशुभ शुक्र यदि वृष, तुला अथवा मीन राशि में कुंडली के पहले घर में स्थित हो तो ऐसी कुंडली में माल्वय योग नहीं बनेगा अपितु इस कुंडली में अशुभ शुक्र दोष बना सकता है जिसके कारण जातक के चरित्र, व्यक्तित्व तथा व्यवसाय आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिसके चलते इस दोष के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक सुखों की चरम लालसा रखने वाले होते हैं तथा अपनी इन लालसाओं की पूर्ति के लिए ऐसे जातक किसी अवैध अथवा अनैतिक कार्य में सलंग्न हो सकते हैं जिसके कारण इन्हें समय समय पर मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है तथा समाज में अपयश भी मिल सकता है। इसी प्रकार कुंडली के उपर बताए गए अन्य घरों में स्थित अशुभ शुक्र भी मालव्य योग न बना कर कोई दोष बना सकता है जो अपनी स्थिति और बल के अनुसार जातक को अशुभ फल दे सकता है। इसलिए किसी कुंडली में मालव्य योग बनाने के लिए शुक्र का उस कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है।शुक्र की कुंडली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता तथा किसी कुंडली में मालव्य योग के निर्माण के कुछ अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी भी अन्य शुभ योग के निर्माण के भांति ही मालव्य योग के निर्माण के लिए भी यह अति आवश्यक है कि कुंडली में शुक्र शुभ होंऐसे पुरुष जातक स्त्रियों को तथा स्त्री जातक पुरुषों को बहुत पसंद आते हैं। माल्वय योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपनी सुंदरता तथा कलात्मकता के चलते सिनेमा जगत, माडलिंग आदि क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करते हैं। माल्वय योग के प्रबल तथा विशेष प्रभाव में आने वालीं स्त्रियां बहुत सुंदर तथा आकर्षक होतीं है क्योंकि कुंडली में शुक्र के अशुभ होने से शुक्र के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी मालव्य योग नहीं बनेगा अपितु इस स्थिति में शुक्र कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में अशुभ शुक्र यदि वृष, तुला अथवा मीन राशि में कुंडली के पहले घर में स्थित हो तो ऐसी कुंडली में माल्वय योग नहीं बनेगा अपितु इस कुंडली में अशुभ शुक्र दोष बना सकता है जिसके कारण जातक के चरित्र, व्यक्तित्व तथा व्यवसाय आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिसके चलते इस दोष के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक सुखों की चरम लालसा रखने वाले होते हैं तथा अपनी इन लालसाओं की पूर्ति के लिए ऐसे जातक किसी अवैध अथवा अनैतिक कार्य में सलंग्न हो सकते हैं जिसके कारण इन्हें समय समय पर मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है तथा समाज में अपयश भी मिल सकता है। इसी प्रकार कुंडली के उपर बताए गए अन्य घरों में स्थित अशुभ शुक्र भी मालव्य योग न बना कर कोई दोष बना सकता है जो अपनी स्थिति और बल के अनुसार जातक को अशुभ फल दे सकता है। इसलिए किसी कुंडली में मालव्य योग बनाने के लिए शुक्र का उस कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है।यह योग जातक को राजयोग कारक ग्रहो की तरह फल देता है।मालव्य योग बनाये हुए शुक्र की महादशा, किसी अनुकूल ग्रह की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा सुख, उन्नति, अच्छे सांसारिक उपभोग कराती है।जातक समाज में उच्च स्तर का जीवन जीता है।मालव्य योग के साथ अन्य शुभ योग और ग्रह अनुकूल हो तब इस योग के शुभ फल देने की ताकत ओर ज्यादा बढ़ जाती है।शुक्र खुद केंद्र या त्रिकोण का स्वामी होकर केंद्र या त्रिकोण त्रिकोण में बैठ जाये तब इस योग के फल कई ज्यादा अच्छी तरह से मिलते है।इस योग में शुक्र अस्त, बहुत ज्यादा पाप ग्रहो से पीड़ित नही होना चाहिए, न ही यह राशि अंशो में बहुत कम या आखरी अंशो पर होना चाहिए।नवमांश कुंडली में भी शुक्र नीच या पीड़ित नही होना चाहिए वरना लग्न कुंडली में मालव्य योग बनने पर भी शुक्र ठीक तरह से मालव्य योग के फल नही दे पायेगा।शुक्र मालव्य योग बनाकर वर्गोत्तम हो जाय तब इसके फल सोने पर सुहागा की तरह मिलते है। लेखक आचार्य राजेश

हंस योग

पंचमहापुरुष योग में से एक हंस योग होता है। पंच मतलब पांच, महा मतलब महान और पुरुष मतलब सक्षम व्यक्ति। कुंडली में पंच महापुरुष मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि होते हैं। इन पांच ग्रहों में से कोई भी मूल त्रिकोण या केंद्र में बैठे हैं तो श्रेष्ठ हैं। केंद्र को विष्णु का स्थान कहा गया है। महापुरुष योग तब सार्थक होते हैं जबकि ग्रह केंद्र में हों।विष्णु भगवान के पांच गुण होते हैं। भगवान राम चंद्र और श्रीकृष्ण की कुंडली के केंद्र में यही पंच महापुरुष विराजमान थे।

 उपरोक्त पांच ग्रहों से संबंधित पांच महायोग के नाम इस तरह हैं:- 1.मंगल का रूचक योग, 2.बुध का भद्र योग, 3.गुरु का हंस योग, 4.शुक्र का माल्वय योग और 5.शनि का शश योग आज वात करेंगे हंस योग कियह योग गुरु अर्थात बृहस्पति से संबंधित है। कर्क में 5 डिग्री तक ऊंच मुल त्रिकोण धनु राशि 10 डिग्री तक और स्वयं का घर धनु और मीन होता है। पहले भाव में कर्क, धनु और मीन, 7वें भाव में मकर, मिथुन और कन्या, 10वें भाव में तुला, मीन और मिथुन एवं चौथे भाव में मेष, कन्या और धनु में होना चाहिए तो हंस योग बनेगा। जब जब बृहस्पति ऊंच का  या मूल त्रिकोना में, खुद के घर में या केंद्र में कहीं स्थित है तो भी विशेष परिस्थिति में यह योग बनेगा।बृहस्पति यदि किसी कुंडली में लग्न अथवा चन्द्रमा से 1, 4, 7 अथवा 10वें घर में कर्क, धनु अथवा मीन राशि में स्थित हों तो ऐसी कुंडली में हंस योग बनता है जिसका शुभ प्रभाव जातक को सुख, समृद्धि, संपत्ति, आध्यात्मिक विकास तथा कोई आध्यात्मिक शक्ति भी प्रदान कर सकता है

लगभग हर 12वीं कुंडली में हंस योग का निर्माण होता है। कुंडली में 12 घर तथा 12 राशियां होती हैं तथा इनमें से किसी भी एक घर में गुरु के स्थित होने की संभावना 12 में से 1 रहेगी तथा इसी प्रकार 12 राशियों में से भी किसी एक राशि में गुरु के स्थित होने की संभावना 12 में से एक ही रहेगी।इस प्रकार 12 राशियों तथा बारह घरों के संयोग से किसी कुंडली में गुरु के किसी एक विशेष राशि में ही किसी एक विशेष घर में स्थित होने का संयोग 144 में से एक कुंडलियों में बनता है जैसे कि लगभग प्रत्येक 144वीं कुंडली में गुरु पहले घर में मीन राशि में स्थित होते हैं।हंस योग के निर्माण पर ध्यान दें तो यह देख सकते हैं कि कुंडली के पहले घर में गुरु तीन राशियों कर्क, धनु तथा मीन में स्थित होने पर हंस योग बनाते हैं। इसी प्रकार गुरु के किसी कुंडली के चौथे, सातवें अथवा दसवें घर में भी हंस योग का निर्माण करने की संभावना 144 में से 3 ही रहेगी तथा इन सभी संभावनाओं का योग 12 आता है जो कुल संभावनाओं अर्थात 144 का 12वां भाग है जिसका अर्थ यह हुआ कि हंस योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग हर 12वीं कुंडली में इस योग का निर्माण होता है मित्रों यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि गुरु के पास शुभ हो आपको लग्न के हिसाब से वह शुभ हो तब ही हंस योग पुरन शुभ फल देगा किसी तरह गुरु पीड़ित ना हो यह बातें ध्यान देने योग्य होती है यह कुंडली देखते समय

हंस योग का जातक सुंदर व्यक्तित्व का धनी होगा और उसका रंग साफ एवं चेहरे पर तेज होगा। उसका माथा चौड़ा और लंबी नाक होगी। छाती भी चौड़ी और अच्छी होगी। आंखें चमकदार होगी। त्वचा चमकदार स्वर्ण की तरह होगी। दूसरों के लिए अच्छी बातें करने और बोलने वाला व्यक्ति होगा एवं उसके मित्रों संख्या अधिक होगी। वह हमेशा सकारात्मक भाव और विचारों से भरा होगा।

हंस योग के कुछ जातक किसी धार्मिक अथवा आध्यात्मिक संस्था में उच्च पद पर आसीन होते हैं, जबकि कुछ अन्य जातक व्यवसाय, उत्तराधिकार, वसीयत, सराहकार अथवा किसी अन्य माध्यम से बहुत धन संपत्ति प्राप्त कर सकते हैं। वह ज्योतिष, पंडित या दार्शनिक भी हो सकता है। उच्चशिक्षित न भी हो तो भी वह ज्ञानी होता हैसुख, समृद्धि और ऐश्वर्य होताहै तथा साथ ही साथ ऐसे जातक समाज की भलाई तथा जन कल्याण के लिए भी निरंतर कार्यरत रहते हैं तथा इन जातको में भी प्रबल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक अथवा दोनों ही रुचियां देखीं जातीं हैं। अपने उत्तम गुणों तथा विशेष चरित्र के चलते हंस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक समाज में सम्मान तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।हंस का अध्ययन करते समय गुरु ग्रह के अंश पर भी ध्यान देना चाहिए। गुरु का अंश कम हो तो हंस योग के शुभ फल में कमी आती है। यदि गुरु के साथ चंद्र भी हो तो गजकेसरी योग बनता है। इस योग से गुरु के शुभ फल काफी अधिक बढ़ जाते हैं।

श्रीराम की कुंडली में है हंस योग और गजकेसरी योगभगवान श्रीराम की कुंडली की कर्क राशि में चंद्रमा और गुरु दोनों स्थित हैं। इससे हंस योग और गजकेसरी योग बनता है। राजा  विक्रमादित्य की कुंडली में भी ऐसी ही युति थी।

ऐसे होते हैं हंस योग से प्रभावित व्यक्ति

जिन लोगों की कुंडली में हंस योग रहता है, वे बहुत बुद्धिमान होते हैं। जिस प्रकार हंस दूध और पानी को अलग कर देता है, , ठीक उसी प्रकार ये लोग भी हर बात को बहुत जल्दी समझ लेते हैं। इन्हें धर्म की काफी जानकारी रहती है। ये न्यायप्रिय होते हैं।आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य के नि:श्वास में ‘हं’ और श्वास में ‘स’ ध्वनि सुनाई पड़ती है। मनुष्य का जीवन क्रम ही ‘हंस’ है, क्योंकि उसमें ज्ञान का अर्जन संभव है। अत: हंस ‘ज्ञान’ विवेक, कला की देवी सरस्वती का वाहन है।पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है, जहां देव आत्माएं आश्रय लेती हैं। यह उन आत्माओं का ठिकाना है जिन्होंने अपने ‍जीवन में पुण्य-कर्म किए हैं और जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंस योनि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुन: मनुष्य योनि में लौट आती है या फिर वह देवलोक चली जाती है।इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ अशुभ योगों अथवा दोषों का भी भली भांति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बनने वाले पित्र दोष, मांगलिक दोष तथा काल सर्प दोष जैसे दोष हंस योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ योग इस योग के प्रभाव को और अधिक बढ़ा सकते हैं। इसलिए किसी कुंडली में हंस योग के निर्माण तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी नियमों का उचित रूप से अध्ययन कर लेना चाहिए। कुंडली के पहले घर में बनने वाला हंस योग जातक को उसके व्यवसाय, धन, संपत्ति, प्रतिष्ठा तथा आध्यात्म से संबंधित शुभ फल प्रदान कर सकता है। कुंडली के चौथे घर में बनने वाला हंस योग जातक को किसी धार्मिक अथवा आध्यात्मिक संस्था में किसी प्रतिष्ठा तथा प्रभुत्व वाले पद की प्राप्ति करवा सकता है तथा ऐसे जातक आध्यात्मिक रूप से भी बहुत विकसित हो सकते हैं। सातवें घर का हंस योग जातक को एक धार्मिक तथा निष्ठावान पत्नि प्रदान कर सकता है तथा ऐसा जातक अपनी धार्मिक अथवा आध्यात्मिक उपलब्धियों के चलते राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकता है। दसवें घर का हंस योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम दे सकता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसायिक क्षेत्रों में नई उंचाईयों को छूते हैं और नए कीर्तिमान स्थापित करते हैं।     लेखक आचार्य राजेश

शनिवार, 15 सितंबर 2018

भद्र योग

भद्र योग (Bhadra yog) बुद्धि के कारक बुध इस योग का निर्माण उस समय करते हैं जब वे स्वराशि जो कि मिथुन एवं कन्या हैं के होकर केंद्र भाव यानि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम अथवा दशम स्थान में बैठे हों तो भद्र महापुरुष योग का निर्माण करते हैं।यह योग जातक को बुद्धिमान तो बनाता ही

 साथ ही इनकी संप्रेषण कला भी कमाल की होती है। रचनात्मक कार्यों में इनकी रूचि अधिक होते हैं ये अच्छे वक्ता, लेखक आदि हो सकते हैं। इनके व्यवहार में ही भद्रता झलकती है जिससे सबको अपना मुरीद बनाने का मादा रखते हैं। बातों में उनके सामने कोई भी नहीं ठहर सकता। ऐसे जातक आंकडो से सम्बधित कार्य, बैंक, चार्टेड अकाउंट, क्‍लर्क, अध्ययन कार्यों से सम्बंधित तथा विदेश सम्बंधी कार्य करते हैं। भद्र योग वाला व्यक्ति बहुत व्यवहार कुशल होता है और किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित करने में माहिर होते है। आज के समय में ऐसे लोग बड़े मित्र वर्ग वाले और सबसे सतत संपर्क में रहने वाले होते है। आधुनिक युग में देखें तो इन्‍हें दूर संचार के संसाधनों का बहुत शौक होता है।Bill Gates के horoscope में ये योग है जिसने उन्हें IT के क्षेत्र का दिग्गज बनाया, इसके अलावा Lalbahadur Shastri और Dr Rajendra Prasad भी इसी योग के जन्मे महापुरुष है लाल बहादुरभद्र योग (Bhadra yog) बुद्धि के कारक बुध इस योग का निर्माण उस समय करते हैं जब वे स्वराशि जो कि मिथुन एवं कन्या हैं के होकर केंद्र भाव यानि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम अथवा दशम स्थान में बैठे हों तो भद्र महापुरुष योग का निर्माण करते हैं।यह योग जातक को बुद्धिमान तो बनाता ही साथ ही इनकी संप्रेषण कला भी कमाल की होती है। रचनात्मक कार्यों में इनकी रूचि अधिक होते हैं ये अच्छे वक्ता, लेखक आदि हो सकते हैं। इनके व्यवहार में ही भद्रता झलकती है जिससे सबको अपना मुरीद बनाने का मादा रखते हैं। बातों में उनके सामने कोई भी नहीं ठहर सकता। ऐसे जातक आंकडो से सम्बधित कार्य, बैंक, चार्टेड अकाउंट, क्‍लर्क, अध्ययन कार्यों से सम्बंधित तथा विदेश सम्बंधी कार्य करते हैं। भद्र योग वाला व्यक्ति बहुत व्यवहार कुशल होता है और किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित करने में माहिर होते है। आज के समय में ऐसे लोग बड़े मित्र वर्ग वाले और सबसे सतत संपर्क में रहने वाले होते है। आधुनिक युग में देखें तो इन्‍हें दूर संचार के संसाधनों का बहुत शौक होता है।Bill Gates के horoscope में ये योग है जिसने उन्हें IT के क्षेत्र का दिग्गज बनाया, इसके अलावा Lalbahadur Shastri और Dr Rajendra Prasad भी इसी योग के जन्मे महापुरुष है।भद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपनी आयु की तुलना में युवा दिखाई देते हैं । इस योग का प्रबल प्रभाव जातक को लंबी आयु भी प्रदान करता है । भद्र योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक सफल राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ तथा खिलाड़ी भी बनते हैं मित्रों, भद्र योग का यदि ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि लगभग हर 16वीं कुंडली में भद्र योग का निर्माण होता ही है  भद्र योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित एक अति शुभ तथा दुर्लभ योग है इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फल प्रत्येक 16वें व्यक्ति में देखने को नहीं मिलते । जिसके कारण यह कहा जा सकता है, कि केवल बुध की कुण्डली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता है अपितु मेरे विचार से किसी भी अन्य शुभ योगों कि तरह ही भद्र योग के निर्माण के लिए भी यह आवश्यक है, कि कुडली में बुध शुभ हों । क्योंकि कुण्डली में बुध के अशुभ होने से बुध के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी भद्र योग का शुभ फल लगभग नहीं मिलेगा अपितु इस स्थिति में बुध कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं । उदाहरण के लिए किसी कुंडली के सातवें घर में मिथुन राशि में स्थित अशुभ बुध भद्र योग नहीं बनाएंगे बल्कि ऐसी कुंडली में अशुभ बुध की स्थिति के कारण कई दोष बन सकता है । जिसके कारण जातक के वैवाहिक जीवन तथा व्यवसायिक क्षेत्र में समस्याएं उत्पन्न हो सकतीं हैं इस लिए किसी कुंडली में भद्र योग के लिए बुध का कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है । कुंडली में बुध के शुभ होने के पश्चात यह भी देखना चाहिए कि कुंडली में बुध को कौन से शुभ अथवा अशुभ ग्रह प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि किसी कुंडली में शुभ बुध पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव बुध द्वारा बनाए जाने वाले भद्र योग के शुभ फलों को कम कर सकता है । किसी कुंडली में शुभ बुध पर दो या दो से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रबल प्रभाव कुंडली में बनने वाले भद्र योग को प्रभावहीन भी बना सकता है इसके विपरीत किसी कुण्डली में शुभ बुध पर शुभ ग्रहों का प्रभाव कुण्डली में बनने वाले भद्र योग के शुभ फलों को और भी बढ़ाता है । परिणामतः जातक को प्राप्त होने वाले शुभ फलों में बहुत वृद्धि हो जाती है इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ-अशुभ योगों अथवा दोषों का भी भली भांति अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि कुंडली में बनने वाले पित्र दोष, मांगलिक दोष तथा काल सर्प दोष जैसे दोष भद्र योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ योग इस योग के प्रभाव को और अधिक बढ़ा सकते हैं । इसलिए किसी कुंडली में भद्र योग के निर्माण तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी नियमों का उचित रूप से अध्ययन कर लेना चाहिए कुंडली के लग्न में बनने वाला भद्र योग जातक को स्वास्थय, व्यवासायिक सफलता, ऐश्वर्य तथा ख्याति आदि जैसे शुभ फल प्रदान करता है ।।

कुंडली के चौथे घर में बनने वाला भद्र योग जातक को संपत्ति, वैवाहिक सुख, वाहन, घर, विदेश भ्रमण तथा वयवसायिक सफलता जैसे शुभ फल प्रदान करता है ।।कुण्डली के सातवें घर का भद्र योग जातक को वैवाहिकसुख,व्यवसायिक सफलता तथा प्रतिष्ठा और प्रभुत्व वाला कोई पद प्रदान करता है ।।दसवें घर का भद्र योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम देता है । इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक किसी सरकारी अथवा निजी संस्था में लाभ, प्रभुत्व तथा प्रतिष्ठा वाला पद प्राप्त कर सकते हैं भद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपनी आयु की तुलना में युवा दिखाई देते हैं । इस योग का प्रबल प्रभाव जातक को लंबी आयु भी प्रदान करता है । भद्र योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक सफल राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ तथा खिलाड़ी भी बनते हैं मित्रों, भद्र योग का यदि ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि लगभग हर 16वीं कुंडली में भद्र योग का निर्माण होता ही है  भद्र योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित एक अति शुभ तथा दुर्लभ योग है इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फल प्रत्येक 16वें व्यक्ति में देखने को नहीं मिलते । जिसके कारण यह कहा जा सकता है, कि केवल बुध की कुण्डली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता है अपितु मेरे विचार से किसी भी अन्य शुभ योगों कि तरह ही भद्र योग के निर्माण के लिए भी यह आवश्यक है, कि कुडली में बुध शुभ हों । क्योंकि कुण्डली में बुध के अशुभ होने से बुध के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी भद्र योग का शुभ फल लगभग नहीं मिलेगा अपितु इस स्थिति में बुध कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं । उदाहरण के लिए किसी कुंडली के सातवें घर में मिथुन राशि में स्थित अशुभ बुध भद्र योग नहीं बनाएंगे बल्कि ऐसी कुंडली में अशुभ बुध की स्थिति के कारण कई दोष बन सकता है । जिसके कारण जातक के वैवाहिक जीवन तथा व्यवसायिक क्षेत्र में समस्याएं उत्पन्न हो सकतीं हैं इस लिए किसी कुंडली में भद्र योग के लिए बुध का कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है । कुंडली में बुध के शुभ होने के पश्चात यह भी देखना चाहिए कि कुंडली में बुध को कौन से शुभ अथवा अशुभ ग्रह प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि किसी कुंडली में शुभ बुध पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव बुध द्वारा बनाए जाने वाले भद्र योग के शुभ फलों को कम कर सकता है । किसी कुंडली में शुभ बुध पर दो या दो से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रबल प्रभाव कुंडली में बनने वाले भद्र योग को प्रभावहीन भी बना सकता है इसके विपरीत किसी कुण्डली में शुभ बुध पर शुभ ग्रहों का प्रभाव कुण्डली में बनने वाले भद्र योग के शुभ फलों को और भी बढ़ाता है । परिणामतः जातक को प्राप्त होने वाले शुभ फलों में बहुत वृद्धि हो जाती है इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ-अशुभ योगों अथवा दोषों का भी भली भांति अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि कुंडली में बनने वाले पित्र दोष, मांगलिक दोष तथा काल सर्प दोष जैसे दोष भद्र योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ योग इस योग के प्रभाव को और अधिक बढ़ा सकते हैं । इसलिए किसी कुंडली में भद्र योग के निर्माण तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी नियमों का उचित रूप से अध्ययन कर लेना चाहिए कुंडली के लग्न में बनने वाला भद्र योग जातक को स्वास्थय, व्यवासायिक सफलता, ऐश्वर्य तथा ख्याति आदि जैसे शुभ फल प्रदान करता है 

कुंडली के चौथे घर में बनने वाला भद्र योग जातक को संपत्ति, वैवाहिक सुख, वाहन, घर, विदेश भ्रमण तथा वयवसायिक सफलता जैसे शुभ फल प्रदान करता है ।।कुण्डली के सातवें घर का भद्र योग जातक को वैवाहिक सुख,व्यवसायिक सफलता तथा प्रतिष्ठा और प्रभुत्व वाला कोई पद प्रदान करता है दसवें घर का भद्र योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम देता है । इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक किसी सरकारी अथवा निजी संस्था में लाभ, प्रभुत्व तथा प्रतिष्ठा वाला पद प्राप्त कर सकते हैं आचार्य राजेश

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