मंगलवार, 24 मार्च 2020

शक्ति की उपासना


जगत में शक्ति के बिना कोई काम सफल नहीं होता है। चाहे आपका सिद्धांत कितना भी अच्छा हो, आपके विचार कितने ही सुंदर हों लेकिन अगर आप शक्तिहीन हैं तो आपके विचारों का कोई मूल्य नहीं होगा। विचार अच्छा है, सिद्धांत अच्छा है, इसीलिए सर्वमान्य हो जाता है ऐसा नहीं है। शक्ति ही जीवन है और जीवन ही शक्ति है
शक्ति उपासना व साधना के विविध प्रयोग अनादिकाल से साधको ने किये है,जिसके अनेक विधि-विधायें मिलती है शक्ति उपासना से लोकजीवन में सहज अभिष्ट सिद्धि प्राप्त होती रही है ।इस लिए इसके प्रति गहरा आकर्षण भी रहा है,इस मार्ग के अनुयायी बडे बडे साधु महात्मा हो गये है। परन्तु वर्तमान काल मे इस उपासना के रूप और स्वरूप मे प्राय: ऐसा परिवर्तन देखने मे आता है जिससे विदित होता है किस इस मार्ग के साधारण उपासक अधिकांश मे इस उपासना के वास्तविक रूप और स्वरूप से अपरिचित है। शक्ति का अर्थ सभी को पता है और उपासना का अर्थ पास मे होना अपने समीप समझना माना जाता है। शक्ति साधना का मतलब होता है कि उस साधन के समीप बैठा जाये या उस साधन को प्रयोग किया जाये जिससे शक्ति की प्राप्ति हो। शक्ति कोई भौतिक रूप मे देखने को भी मिलती है और आध्यात्मिक तरीके से भी महसूस की जाती है। मनुष्य के अन्दर जब ज्ञान के नेत्र खुल जाते है वह जड पदार्थो की सहायता से भौतिक शक्ति का निर्माण कर देता है जैसे सिलीकोन जो एक मिट्टी की तरह की राख ही है,इस राख के अन्दर वह तरह तरह के प्रयोग करने के बाद कम्पयूटर जैसी याद दास्त को संजोकर रखने वाली चीजों का निर्माण कर सकने मे समर्थ हो सकता है। शक्ति का बीज सबसे पहले मनुष्य के शरीर मे ही उपस्थिति होता है। इसी शक्ति की सहायता से माया को अपने आधीन किया जाता है। माया के आधीन होने पर जीव निर्बन्ध होकर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। इस नजर से शक्ति उपासना को मुक्ति का साधन भी माना गया है। शक्ति के रूप और स्वरूप को बिना बताये या समझे उपासना का मतलब भी समझ मे नही आ सकता है। इसलिये शक्ति के रूप और स्वरूप को समझना बेहद जरूरी है।
मनुष्य शरीर एक लघु ब्रह्माण्ड है। ब्रह्माण्ड मे रहने वाले सभी पदार्थ लघु रूप मे मनुष्य शरीर मे विद्यमान है। इस प्रकार से जो भी उपासक कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न करता है वह अपने साधनों से अपने अन्दर की शक्ति को इकट्ठा करने के बाद ही प्राप्त करता है। जो भी पदार्थों के रूप मे शरीर मे विद्यमान तत्व है उन्हे इकट्ठा करने के बाद ही वह उन्हे वश मे करता है। और उन पदार्थो को अपने वश मे लाकर प्रयोग मे लाता है। इस प्रकार से इस माया को जीतने की शक्ति प्राप्त करने का इच्छुक है वह शक्ति उपासना से अपने भीतर रहने वाले उस शक्ति तत्व को बल देकर उसे काम मे लाता है। जिससे माया उसके आधीन हो जाती है। इसके बाद जो महत्वपूर्ण बात है कि वे साधन कौन कौन से हैं जिनके द्वारा माया को अपने आधीन रखने की शक्ति को प्राप्त किया जाये ? उन्ही साधनो को जानना उन साधनो के रूप और स्वरूप को समझना ही शक्ति उपासना के रूप और स्वरूप को समझना माना गया है।
प्राचीन ऋषियों महात्माओं ने अपनी खोज के द्वारा दो प्रकार के शक्ति उपासना के रूप और स्वरूप पहिचाने है। जिसमे पहला होता है योग साधन और दूसरा होता है मंत्र जाप। योग के अन्दर अष्टांग योग लय योग सुरत शब्द योग राजयोग हंस योग आदि की अनगिनत शाखायें है। दूसरा साधन मंत्र जाप को माना है। आजकल की भागम-भाग जिन्दगी मे योग साधन को अपनाना बहुत ही कठिन है साथ ही आहार विहार का समय स्थान आदि भी नही मिलता है,कंकरीट के जंगल मे पेडों की हरियाली खोजने मे ही इतना समय लग जायेगा कि योग तो धरा रह जायेगा और रोजाना की जिन्दगी की जरूरते भी पूरी नही हो पायेंगी इसलिये मंत्र जाप का करना हर व्यक्ति की पहुँच मे है।मंत्रो के भी दो भाग बताये गये है एक तो वेदोक्त होता है और दूसरा साबर मंत्रो के रूप मे जाना जाता है। वैदिक मंत्रो का प्रयोग साबर मंत्रो से बहुत ऊँचा माना जाता है क्योंकि उनकी शुद्धता वेदों से परख कर ही प्रकट की जाती है जबकि साबर मंत्र स्थानीय लोगों द्वारा पता नही किस देवता आदि के लिये प्रयोग किये जाते है उनके बोलने की कला और भाव प्रकट करना वश की बात नही होती है। लेकिन वैदिक मंत्र को कहीं से भी खोजा भी जा सकता है और उसके भाव को भी तरह तरह के स्थान और कारणो से समझा भी जा सकता है। वैदिक मंत्र के जप से फ़ल भी शीघ्रता से मिलता है,परन्तु मन्त्र जाप की सफ़लता के लिये भी दो नियम जरूरी है। पहला तो मंत्र का उच्चारण शुद्ध होना चाहिये,उच्चारण मे जरा सी गल्ती से मिलने वाले लाभ की जगह पर हानि होने की अधिक सम्भावना भी रहती है। दूसरा नियम मंत्र जाप विधिपूर्वक होना चाहिये,बिना विधि के जाप करने से भी फ़ायदा की जगह पर नुकसान होने का कारण बन जाता है।
आजकल वैदिक मंत्रो का जाप प्राय: लुप्त सा हो गया है,साबर मंत्रो का प्रचलन है और उनकी विधि को सही रूप से नही समझने या समझाने वाले नही मिलने के कारण भी अगर कोई साधक मंत्रो का प्रयोग जाप मे लेता है तो वह अपनी मेहनत के द्वारा जाप भी करता है भाव भी बनाता है,लेकिन विधि आदि नही मिलने से वह जाप निष्फ़ल हो जाता है। लोग इसी कारण से मंत्र जाप को बेकार समझने लगते है और ढोंग आदि करने के नाम से पुकारने लगते है। इसके अलावा भी लोगो के द्वारा सुना जा सकता है कि जाप करना केवल अपने समय को खराब करना होता है। केवल मूर्ख लोग ही इनपर विश्वास करते है आदि बातें कहने के अलावा एक बात और कह दी जाती है कि भगवान शंकर ने इन मंत्रों को कील दिया है जिससे यह अपने प्रभाव को नही दे पाते। परन्तु यह सब कपोल कल्पित ही माना जाता है। यह सब बाते मूल सिद्धांतो को नही जानने के कारण ही कहीं जाती है। मंत्रो के जाप के प्रति सूक्ष्म विचार करना बहुत जरूरी है।यह बात सभी को पता है कि जो शब्द कहा जाता है उसका उच्चारण करते ही उसका प्रकम्पन वायु मंडल मे फ़ैल जाता है। जब मुँह से कोई उच्चारण किया जाता है तो बाहर के वायु मंडल मे और ह्रदय मे उच्चारण करने से शरीर के अन्दर के वायु मंडल मे प्रकम्पन पैदा होता है। इसलिये जो शब्द मुँह से उच्चारित किये जाते है वे कम असरकारक होते है,ह्रदय से उच्चारण किये गये शब्द काफ़ी समय तक शरीर के वायु मंडल मे फ़ैले रहते है। इस प्रकम्पन से जो चिन्ह वायुमंडल मे बनते है वे तब तक वायु मंडल मे घूमते रहते है जब तक कोई पदार्थ उनको अपने भीतर सोख नही लेता या वे फ़ैलते फ़ैलते इतने कमजोर नही हो जाते कि उनका भाव भी नकारात्मक के समान हो जाता है। किसी मंत्र की विधि पूर्वक की गयी शुरुआत का कारण अक्सर श्रद्धालुओं को समझने मे जब आने लगता है जब अक्समात मंत्र को शुरु करते ही बडी बडी जमुहाइयां आने लगती है आंखो से आंसू बहने लगते है। शब्दों से उत्पन्न होने वाला प्रकम्पन उच्चारण भेद के अनुसार भिन्न भिन्न प्रकार के चिन्ह इसी प्रकार से बनाने लगता है जैसे जमुहाई आना आंसू निकलना किसी अंग विशेष का फ़डकने लग जाना,तन्द्रा का आने लगना आदि। इस बात को और अधिक गहराई से समझने के लिये आजकल प्रयोग मे लाये जाने वाले इलेक्ट्रोनिक साधनों को ही देख लीजिये। जैसे वायुमंडल मे चिन्ह बनते है उसी प्रकार से इलेक्ट्रोनिक डिवाइस मे चिन्ह बनाकर इसी प्रयोग को काम मे लाया जाता है। सीडी पेन ड्राइव कम्पयूटर की डिवाइस आदि मे जब भौतिक रूप से चिन्ह बन सकते है तो मानना ही पडेगा कि वायु मंडल मे उपस्थित ईथर मे भी चिन्ह बनते है।
किसी मंत्र के जाप से क्या फ़ल मिलता है यह बात उसका उपयोग किये बिना नही पता लग सकती है। यह बात जरूरी है कि जो वेदो मे लिखा गया है वह अगर विधि पूर्वक से जाप मे लाया जायेगा तो फ़ल सदा ही एकसा ही निकलेगा। कारण ऋषि मुनि साधक योगी महायोगी जो भी कहते आये है वह कभी गलत नही हो सकता है। अगर मंत्र जाप के बाद कोई फ़ल नही मिल रहा है तो अवश्य समझ लेना चाहिये कि उस मंत्र के साधन या विधि मे कोई गलती हो गयी है।
संसार की किसी भी भाषा मे जो शब्द बनते है उनके उच्चारण के पांच स्थान ही हैं। होंठ जीभ दांत तालू और कण्ठ। इन स्थानो मे पंच तत्व विद्यमान होते है। जैसे होंठ पृथ्वी तत्व है,जीभ जल तत्व है,दांत अग्नि तत्व है,तालू वायु तत्व है और कंठ आकाश तत्व का स्थान है। जब मंत्रो के ऐसे अक्षर या शब्द जिनका उच्चारण होंठों से होता है तो वे पृथ्वी तत्व को सबल बनाने मे सहायक होते है,लेकिन पृथ्वी तत्व को प्राप्त करने का भी समय होता है। अगर पृथ्वी तत्व के समय में पृथ्वी तत्व की प्राप्ति के मंत्रो का जाप किया जाता है तो पृथ्वी तत्व की प्राप्ति हो जायेगी और अगर पृथ्वी तत्व को जल तत्व के समय मे जाप किया जाता है तो पृथ्वी तत्व के अन्दर जल तत्व का समावेश हो जाने से बजाय पृथ्वी तत्व के दलदल की प्राप्ति हो जायेगी,जो हानिकारक भी हो सकती है,अथवा पृथ्वी तत्व के समय अग्नि तत्व के समय मे या मिश्रण कर दिया गया तो वह गर्म आग की तरह से गर्म रेत का प्रभाव देने लगेगा। जैसे मानसिक परेशानियों के समय में ज्योतिष से चन्द्रमा मे बढोत्तरी हो जाती है,उस समय मे अगर चन्द्रमा जो जल तत्व का कारक है,उसे कम करने के लिये केवल पृथ्वी तत्व का प्रयोग करना पडेगा,और बुध ग्रह के मंत्र जैसे ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सह बुद्धाय नम: का जाप करने से जल तत्व की कमी होने लगेगी।शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के अन्दर तीन ब्रह्माण्ड बताये गये है। शरीर मे ऊपर का भाग पराब्रह्माण्ड कहा गया है,बीच का भाग स्वब्रह्माण्ड कहा गया है और नीचे का भाग अपराब्रह्माण्ड बताया गया है। स्वब्रह्माण्ड का सम्बन्ध विराट तत्व से पराब्रह्माण्ड का सम्बन्ध विद्युत तत्व से और अपराब्रह्माण्ड का सम्बन्ध शून्य तत्व से बना हुआ है। स्व के अन्दर कारण शक्तियां उपस्थित होती है और परा मे सूक्ष्म शक्तियां उपस्थित है,अपरा मे स्थूल शक्तियां उपस्थित होती है। मंत्र के जिन अक्षरो या शब्दो का प्रकम्पन होता है उनसे विराट तत्व सम्बन्धित कारण शक्तियों का विकास होता है,जिनसे परा मे प्रकम्पन होता है उनसे विद्युत सम्बन्धित सूक्ष्म शक्तियों का प्रकम्पन होता है। और जिनसे अपरा मे प्रकम्पन होता है उनसे शून्य तत्व सम्बन्धित स्थूल शक्तियों का विकास होता है। उदाहरण के लिये "राम" शब्द के उच्चारण से पराब्रह्माण्ड में प्रकम्पन होता है। इस शब्द मे र अक्षर के कारण को सबसे पहले तालू को जीभ स्पर्श करती है,तालू को वायु तत्व से जोड कर माना गया है,साथ ही जीभ जो जल तत्व की कारक है उससे वायु तत्व का मिश्रण होना जल तत्व को वायु तत्व के द्वारा सूक्ष्म तरीके से उठाने की क्षमता है,जैसे समुद्र के जल मे लहरे आने पर वायु के द्वारा समुद्र के पानी को अवशोषित कर लिया जाता है और हवा मे बादलो के रूप मे वही पानी सिमटा हुआ दिखाई देने लगता है। अक्षर र मे बडे आ की मात्रा लगाते ही कंठ से मिलने वाले आकाश तत्व का प्रवेश हो जाता है और जब म को कहा जाता है तो पृथ्वी तत्व के मालिक होंठ काम करने लगते है। होंठ को बन्द करने के बाद जो ध्वनि निकलती है वह नासिका से निकलती है जो पराब्रह्माण्ड के रूप मे एक सूक्ष्म विद्युत तरंग के रूप मे प्रसारित होती है। इस प्रकार से ह्रदय से लगातार राम शब्द को निकालते रहने से दैहिक दैविक और भौतिक तीनो शक्तियों का कारण शरीर मे पैदा हो जाता है और शरीर राममय हो जाता है। इसी प्रकार से अल्लाह शब्द मे कंठ तालू और जीभ का प्रयोग किया जाता है,जो आकाश तत्व जल तत्व को लेकर वायु तत्व के द्वारा आकाश तत्व मे ही समा जाता है। ईशा शब्द में भी आकाश तत्व को कंट्रोल करने के बाद जल तत्व को वायु तत्व से कन्ट्रोल करने के बाद आकाश तत्व मे सम्मिलित किया गया है। इन शब्दो के उच्चारण से सूक्ष्म शक्तियां जागृत होती है। ह्रीं शब्द के उच्चारण से स्वब्रह्माण्ड में प्रकम्पन होता है,अत: इस शब्द के उच्चारण से कारण शक्तियां जागृत हो जाती है,ध्री शब्द के उच्चारण से अपराब्रह्माण्ड मे प्रकम्पन होता है जिससे स्थूल शक्तियां जागृत हो जाती है। इस प्रकार की शक्तिया जब पूर्ण रूप से जागृत हो जाती है तब यह साधक के भाव के अनुसार एक विशेष रूप धारण करने के बाद उसके सामने प्रकट होने लगती है। साधक शक्ति के उस रूप से जो भी चाहत रखता है वह चाहत उस शक्ति के द्वारा उसे प्रदान की जाती है और साधक का जाप सफ़ल होने लगता है,परन्तु एकाग्र होकर और इन्द्रियों को जीतने के बाद ही यह शक्तियां जागृत होती है।
साबर मंत्रो के भी दो भेद होते है एक पैशाचिक और एक दैविक। पैशाचिक शक्ति के लिये इतना ही कहा जाता है कि वह कोई भी रूप लेकर प्रकट नही होती है। साधक के अन्दर उन शक्तियों का समावेश हो जाता है और वह मनचाहे तरीके से अपने कार्यों को करवाने लगता है। पैशाचिक शक्तियों मे जो भी कार्य करना होता है वह कार्य के बदले मे कुछ प्राप्त करने की चाहत रखती है अगर किये गये कार्यों की एवज मे कुछ दिया नही गया तो साधक के शरीर से भी वह शक्तियां चाहे गये तत्व को प्राप्त कर लेती है,इसलिये ही पैशाचिक शक्ति को प्रयोग करने वाले साधक अक्सर बुरी मौत से मरते हुये देखे जाते है। लेकिन दैविक शक्तिया कुछ बदले मे नहीं मांगती है वे केवल भला करने के लिये ही अपने रूप को प्रकट करती है और भला करने के बाद अपना रूप छुपा लेती है। इसके साथ यह भी माना जाता है कि अगर एक साधक दूसरे साधक की सिद्धि को नष्ट करने की कोशिश करता है तो उसकी स्वयं की सिद्धि नष्ट हो जाती है। लेकिन योग और ज्ञान मार्ग के उपासकों की सिद्धि कभी नष्ट नही होती है यह गीता मे भी बताया गया है। हमेशा मंत्र जाप को विधिविधान से ही करना चाहिये और इच्छित परा स्व और अपरा ब्रह्माण्ड के अनुसार ही मंत्रों का चुनाव करना चाहिये,तभी साधना सफ़ल हो सकती है।www.acharyarajesh.in

गुरुवार, 19 मार्च 2020

#(Coronavirus)#क्या कारण है ज्योतिष ग्रह योग क्‍यों फैला कोरोना और कब मिलेगी राहत?

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कोरोना वायरस को लेकर पूरी दुनिया खौफजदा है। कोरोना चीन के वुहान शहर से सामने आया कोरोना वायरस आज पूरे विश्वभर में चर्चा के चरम पर है और एक महामारी का रूप ले चुका है। लाखों लोग इस वायरस से प्रभावित हो चुके हैं। कोरोना वायरस के रूप में शुरू हुई महामारी लगातार बढ़ती जा रही है। भारत में भी इसके बहुत से मामले सामने आने लगे हैं, लेकिन लोगों के मन में एक ही सवाल है कि इस वायरस से कब राहत मुक्‍ति मिलेगी।ज्योतिष विज्ञान की दृष्‍टि से देखें तो इस समय में कोरोना वायरस का सामने आना एवं महामारी का रूप लेना ये मात्र कोई संयोग नहीं है बल्कि इसके पीछे बहुत विशेष ज्योतिषीय कारण और वर्तमान ग्रह स्थितियां हैं। इसी वजह से कोरोना वायरस विश्वस्तर पर एक महामारी के रूप में फैलता जा रहा है।

ये ग्रह हैं संक्रामक बीमारियों के जिम्‍मेदारज्योतिष में राहु और केतु दोनों को संक्रमण (बैक्टीरिया, वायरस) इंफेक्शन से होने वाली सभी बीमारियों और छिपी हुई बीमारियों का ग्रह माना गया है। बृहस्पति जीव और जीवन का कारक ग्रह है जो हम सभी व्यक्तियों का प्रतिनिनधित्व करता है इसलिए जब भी बृहस्पति और राहु या बृहस्पति और केतु का योग होता है तब ऐसे समय में संक्रामक रोग और ऐसी बीमारिया फैलती हैं जिन्हें चिहि्नत करना अथवा समाधान कर पाना बहुत मुश्किल होता है पर इसमें भी खास बात ये है कि राहु के द्वारा होने वाली बीमारियों का समाधान तो फिर भी मिल जाता है, लेकिन केतु को एक गूढ़ और रहस्यवादी ग्रह माना गया है इसलिए जब भी बृहस्पति और केतु का विस्फोटक योग होता है तो ऐसे में इस तरह के रहस्मयी संक्रामक रोग सामने आते हैं जिनका समाधान आसानी से नहीं मिल पाता और ऐसा ही हो रहा है इस समय कोरोना वायरस के केससामने आ रहे है समझिए कोरोना वायरस के कारण

 दरअसश मित्रों कोरोना वायरस ज्योतिष के अनुसार जो भी वायरस महामारी फैलता हैं वो राहु केतु और शनि से प्रभावित होता है, जो ऑक्सीजन को दूषित करके हवा को विषैला बनाते है


राहु का संबंध धुएं और आसमान दोनों से भी है। ऐसे ही कोई वायरस हवा में कहीं भी पहुंच जाता है। राहु आसमां ओर विस्तार का कारक है वहीं ऑक्सीजन हवा का  कारक ग्रह बृहस्पति है। नाक के जरिए सांस लिया जाता है और ऑक्सीजन शरीर तक पहुंच कर जीवन प्रदान करती है।
  शनि हवा में पैदा हुए कण हैं, जो इसको फैलाने में मदद करते हैं। अभी राहु अपनी उच्च राशि मिथुन में गोचर कर रहे हैं है। शनि अपनी मकर राशि में हैं और ये हमारी ऑक्सीजन को प्रभावित करते हैं। जिसका कारक ग्रह बृहस्पति है। नाक के जरिए सांस लिया जाता है और ऑक्सीजन शरीर तक पहुंच कर जीवन प्रदान करती है।
कोरोना वायरस का हमला श्वास के जरिए मानव शरीर में पहुंच कर नुकसान पहुंचा रहा है। पूरे ब्रह्मांड की ऑक्सीजन पर बृहस्पति का स्वामित्व स्थापित है। ऑक्सीजन बारिश के कारण पैदा होती है, जिससे पेड़-पौधे फलते-फूलते हैं और स्वच्छ वायु देते हैं। जिसका कारक ग्रह चंद्र है। वर्तमान समय में भारत पर कोरोना वायरस का असर शुरू हो चुका है।चंद्र और बृहस्पति दोनों ग्रह उत्तर दिशा को केंद्रित करते हैं। भारत में इसका असर उत्तरी भारत में ज्यादा होगा जैसे कि दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर। होली के बाद इसका असर बढ़ा। अमावस्या से यानि कि 24 मार्च से इस कोरोना वायरस को और अधिक बढ़ावा मिलेगा।प्रवेश करेंगे, जहां शनि देव पहले से ही बैठे हैं।और मकर राशि में ही22 मार्च  को मंगलदेव का आगमन हो रहा हैमिथुन राशि से गले के रोग देखे जाते हैं तथा कर्क राशि फेफड़े और जल संबंधित बीमारियों को दर्शाती है।
वर्तमान समय में राहु का गोचर मिथुन राशि में ही चल रहा है तथा मंगल भी बृहस्पति और केतु के साथ धनु राशि में बैठकर पूर्ण रूप से मिथुन और कर्क राशि को देख रहा है,  मित्रों जैसा कि आपको पता ही है
मार्च 2019 से ही केतु धनु राशि में चल रहा है लेकिन चार नवम्बर 2019 को बृहस्पति का प्रवेश भी धनु राशि में हो गया था जिससे बृहस्पति और केतु का योग बन गया था जो के रहस्मयी संक्रामक रोगों को उत्पन्न करता है। चार  नवम्बर को बृहस्पति और केतु का योग शुरू होने के बाद कोरोना वायरस का पहला केस चीन में नवम्बर के महीने में ही सामने आया था। यानि के नवम्बर में बृहस्पति-केतु का योग बनने के बाद ही कोरोना वायरस एक्टिव हुआ। इसके बाद एक और नकारात्मक ग्रहस्थिति बनी जो था 26 दिसंबर को होने वाला सूर्य-ग्रहण जिसने कोरोना वायरस को एक महामारी के रूप में बदल दिया। 26 दिसंबर को हुआ सूर्य ग्रहण समान्य नहीं था क्योंकि इस सूर्य ग्रहण के दिन छःग्रहों के (सूर्य, चन्द्रमा, शनि बुध बृहस्पति, केतु) एकसाथ होने से ष्ठग्रही योग बन रहा था जिससे ग्रहण का नकारात्मक प्रभाव बहुत तीव्र हो गया था। भारत में इसका प्रभाव सीएए और एनआरसी के विरोध-प्रदर्शनों में की गयी हिंसा के रूप में दिखा। साथ ही कोरोना वायरस के मामले भी बढ़ते गए। कुल मिलाकर नवम्बर में केतु-बृहस्पति का  विस्फोटक  योग बनने पर कोरोना वायरस सामने आया और 26 दिसंबर को सूर्य ग्रहण के बाद इसने एक बड़ी में।महामारी का रूप धारण कर लिया।
इससे पहले भी ऐसे ग्रह योग ने मचाई थी तबाही
यह सन 1918 में स्पैनिश फ्लू नाम से एक महामारी फैली थी जिसकी शुरुआत स्पेन से हुई थी। इस महामारी से दुनिया में करोड़ों लोग संक्रमित हुए थे। उस समय भी बृहस्पति-केतु का योग बना हुआ था। सन 1991 में ऑस्ट्रेलिया में माइकल एंगल नाम का बड़ा कम्प्यूटर वायरस सामने आया था जिसने इंटरनेट और कम्यूटर फील्ड में वैश्‍विक स्‍तर पर बड़े नुकसान किये थे और उस समय भी गोचर में बृहस्पति-केतु का योग बना हुआ। सन 2005 में एच-5 एन-1 नाम से एक बर्डफ्लू फैला था और उस समय में भी गोचर में बृहस्पति-केतु का योग बना हुआ था। ऐसे में जब भी बृहस्पति-केतु का योग बनता है उस समय में बड़े संक्रामक रोग और महामारियां सामने आती हैं। 2005 में जब बृहस्पति-केतु योग के दौरान बर्डफ्लू सामने आया था तब बृहस्पति-केतु का योग पृथ्वी तत्व राशि में होने से यह एक सीमित एरिया में ही फैला था जबकि चार नवम्बर को बृहस्पति-केतु का योग अग्नि तत्व राशि (धनु) में बना है जिस कारण कोरोना वायरस आग की गति से पूरे विश्वभर में फैलता जा रहा है।नवम्बर में शुरू हुए बृहस्पति-केतु के योग और दिसंबर में हुए सूर्य ग्रहण के कारण पिछले चार महीनो से कोरोना वायरस तेजी फ़ैल रहा है और वैज्ञानिकों और चिकित्‍सकों को भी इसका कोई ठोस समाधान नजर नहीं आ रहा है। ज्योतिष के जनारिये से देखें तो आने वाले 29 मार्च को बृहस्पति मकर राशि में प्रवेश होगा जिससे पिछले चार महीनो से चल रहा बृहस्पति-केतु का योग खत्‍म हो जाएगा। ऐसे में 29 मार्च के बाद से कोरोना वायरस के अटैक से राहत मिलना शुरू हो जाएगी और इसके संक्रमण का प्रभाव कम होना शुरू हो जाएगा। 14 अप्रैल को सूर्य का मेष राशि में प्रवेश होगा जिसके बाद वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस का कोई ना कोई एंटीडोट मिलेगा। इस स्‍थिति में कुल मिलाकर 29 मार्च के बाद एक से डेढ़ महीने के अंदर इस महामारी का प्रभाव भी कम होने की उम्‍मीद है।14 मई 2020 को जब वक्री देवगुरु बृहस्पति का आगमन मकर राशि में होगा, तक यह बीमारी पूर्ण रूप से समाप्त होगी। उस दिन मकर राशि में नीच भंग के कारण यह बीमारी प्रभावहीन हो जाएगी। इससे पूर्व 11 मई 2020 को शनिदेव का वक्री होना इसमें सहायक होगा। मित्रों यार जहां भी आपको बता दूं जिन लोगों के लग्न में केतु है और लग्न मिथुन है या राहु है उन लोगों को खास एहतियात बरतने की जरूरत है ऐसे लोगों को अपने बचाव के लिए पूरे उपाय करने चाहिए आचार्य राजेश

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

#क्या राशिफल सही होता है ?क्या है सच#

https://youtu.be/sXMcp0IapGE
मित्रोंआमतौर पर हम अपनी सुविधा के लिए रोज सुबह टीवी पर ही अपना राशिफल देखते हैं कई अखबार का भी इस्तेमाल करते हैं बहुत सारे लोग अपने मोबाइल मेंyoutube या किसी अन्य सोशल साइट्स पर भी  राशिफल देखते हैं ।
क्या वो टीवी या कही और देखा हुवा राशीफल सभी के लिए एकसमान होता हैं ?
इसमें प्रश्न उठना स्वाभाविक है ऐसा क्यों? मान लीजिए किसी व्यक्ति का मेष राशि है मेष राशि वाले सिर्फ आप ही होंगे! मेष राशि लाखों-करोड़ों लोगों का हो सकता  हैं
कोई गरीब हो सकता है कोई अमीर हो सकता है कोई सामान्य वर्ग का हो सकता है अब इसमें जो भविष्यवाणियां बताई जाती है क्या वह सभी के लिए सही होती है?
नहीं हो सकती क्योंकि जन्म कुंडली में ग्रहों की भिन्न-भिन्न स्थितियां होती हैं सब का विचार  बहुत जरूरी है आपके ऊपर किस ग्रह की महादशा चल रही है हो सकता हैहो सकता है किसी की शनि की चल रही हो किसी की गुरु की किसी की राहु की
 वैसे भी 12 राशियां हैं और 600 करोड़ लोग हैं। ऐसे में एक राशि में आए 50 करोड़ लोग। तो भला इतने लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है। हमारे भारत देश की जनसंख्या है 130 करोड़ से ज्यादा है तो एक राशि के अंदर कितने लोग हो गए सब के अलग-अलग कर्म है उन कर्मों के आधार पर ही आपकी जन्मकुंडली का निर्माण होता है और जन्म कुंडली से ही आपका सही भूत भविष्य और वर्तमान का फल कथन किया जा सकता हैसबसे पहले आइए आप समझे कि दैनिक राशिफल और सप्ताह का राशिफल कैसे निकाला जाता है? राशिफल का फलादेश मुख्यत: चंद्रमा के भ्रमण पर निर्भर रहता है। चंद्रमा सप्ताह भर में लग्न या राशि से जिस भाव में भ्रमण करता है, उस तरह से दैनिक/साप्ताहिक राशिफल निर्धारित किया जाता है। ठीक अब यह तो आप समझ गए जैसे कि आपको यह भी बता दूं कि 27 नछतर होते हैं  12 राशियां और जिस तरह सूर्य मेष से लेकर मीन तक भ्रमण करता है, उसी तरह चन्द्रमा अश्‍विनी से लेकर रेवती तक के नक्षत्र में विचरण करता है तथा वह काल नक्षत्र मास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है इसीलिए 27 दिनों का एक नक्षत्र मास कहलाता हैप्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में बांटा गया है | एक नक्षत्र13डीग्री20| का होता है अतः नक्षत्र के एक चरण की दूरी 13/20|/4 = 30/20| होती है | सवा दो नक्षत्र अर्थात ९ चरण (30/0 ) की एक राशि होती है | चंद्रमा सवा दो दिन में एक राशि पार कर लेता है अर्थात 30/0 आगे बढ़ जाता है यानी सवा दो दिन तक चंद्रमा एक ही राशि में रहता है | 27 दिन में सभी १२ राशियाँ और नक्षत्र पार कर लेता है | इन चरणों के लिए कुछ अक्षर निश्चित किये गए हैं, जिसके हिसाब से किसी जातक का नामकरण किया जाता है |
क्रमांक नक्षत्र नक्षत्र चरण चरणाक्षर राशि
1 अश्विनी 1,2,3,4 चू, चे, चो, ला मेष मेष राशि में तीन नछतर होते हैं और 9चरणआप ज्योतिष की थोड़ी समझ रखते हैं तो सोचिए विचार करिए इस तरह अन्य राशियां आजकल अधिकांश व्यक्ति प्रात:काल समाचार पत्र में सर्वप्रथम दैनिक राशिफल वाले स्तंभ में अपनी राशि का फलित देखकर अपने दिन का पूर्वानुमान लगाने में उत्सुक रहते हैं और सांझ ढलते ही महसूस करते हैं कि उनकी राशि का जो फलित दैनिक राशिफल में बताया गया था, वह तो असत्य निकला। इसके बाद वे ज्योतिष शास्त्र को कोसने लगते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। तो मैं उन ज्योतिषीयों को   दोषी मानता हूं  जो अपने नाम के आगे आचार्य  या Dr लगाते हैं और जनता को ऐसा लगता कि यह बहुत ही विद्वान और पढ़े लिखे ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता होंगे लेकिन जो लोग दैनिक राशिफल का काम करते हैं ऐसे लोगों को ज्योतिष आता ही नहीं है मित्रों यह आपको समझना होगा आजकल जिस प्रकार दैनिक राशिफल बताया जाता है, वह पूर्णत: भ्रामक व अप्रामाणिक होता है। उसका कोई शास्त्रोक्त व ज्योतिषीय आधार नहीं होता।
 ज्योतिष शास्त्र में फलित के लिए ग्रह स्थिति मुख्यरूपेण उत्तरदायी होती है, चाहे वह जन्म पत्रिका की ग्रह स्थिति हो या गोचर की। ज्योतिष शास्त्र में किसी जातक के फलित के लिए उसकी जन्म पत्रिका की लग्न कुंडली को सर्वाधिक महत्ता प्रदान की गई है तत्पश्चात नवमांश कुंडली, उसके बाद वर्ग कुंडली, फिर विंशोत्तरी दशाएं, उसके बाद योगिनी दशाएं और सबसे अंत में गोचर को मान्यता दी गई है। जब गोचर को ही फलित करते समय सबसे अंतिम पायदान पर रखा जाता है तो केवल चंद्र के गोचर व नक्षत्र से दैनिक राशिफल निकालना कहां तक उचित व प्रामाणिक है?
अब उपर्युक्त आधार पर क्या यह मान लिया जाए कि ज्योतिष शास्त्र में दैनिक राशिफल होता ही नहीं है? 
नहीं, ऐसा कदापि नहीं है। दैनिक राशिफल भी ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत ही आता है किंतु वह प्रत्येक जातक का निजी होता है और उसका आधार प्रश्न कुंडली व नष्टजातकम् पद्धति होता है।
 उस दैनिक राशिफल के लिए व्यक्ति को ज्योतिषी से प्रश्न करना होता है कि 'मेरा आज का दिन कैसा रहेगा?
' तब ज्योतिषी प्रश्न कुंडली के आधार पर अथवा उस व्यक्ति से कोई अंक पूछकर उसके दिन के बारे गणना कर उस दिन का भविष्य संकेत उसे देता है।
इस प्रकार का दैनिक राशिफल व्यक्तिगत होता है, न कि सार्वजनिक। अत: हमारे मतानुसार समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों में प्रसारित-प्रकाशित होने वाले दैनिक राशिफल के फलित को गंभीरता से न लेते हुए अपनी जन्म पत्रिका की ग्रह स्थितियों, दशाओं व अपनी राशि गोचर पर ही विश्वास करना चाहिए। आचार्य राजेश

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

gemlogy# रत्न कैसे काम करते हैं?

कुछ मित्रों ने रत्नों को लेकर कुछ सवाल पूछे हैं कि क्या रत्न काम करते हैं ज्ञान के धारण करने से लाभ मिलता है मित्रोंयह शरीर पंच भूतों से बना है और इन्ही के अधिकार मे सम्पूर्ण जीवन का विस्तार होता है। इन पंचभूतो मे किसी भी भूत की कमी या अधिकता जीवन के विस्तार मे अपने अपने प्रकार से दिक्कत देने के लिये अपना प्रभाव देने लगते है
 और हमारा शरीर जिन पांच तत्वों से बना है, क्रमानुसार वे हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पृथ्वी तत्व से हमारा भौतिक शरीर बनता है। जिन तत्वों, धातुओं और अधातुओं से पृथ्वी (धरती) बनी उन्हीं से हमारे भौतिक शरीर की भी रचना हुई है।तत्व से मतलब तरलता से है।ग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। हमारे शरीर में जितनी गर्माहट है, सब अग्नि तत्व से है।नमें प्राण है, उन सबमें वायु तत्व है। हम सांस के रूप में हवा (ऑक्सीजन) लेते हैं, जिससे हमारा जीवन है।काश तत्व अभौतिक रूप में मन है। जैसे आकाश अनंत है वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। जैसे आकाश अनंत ऊर्जाओं से भरा है, वैसे ही मन की शक्ति की कोई सीमा नहीं हैमिट्टी: पृथ्वी या मिट्टी, हमारे शरीर के उन अंगों के निर्माण से जुड़ी है, जो कठोर और भारी हैं। जैसे हड्डियां, दांत, मांस, त्वचा, बाल, मूंछें, नाक आदि। 
अग्नि: अग्नि उन अंगों के निर्माण के लिए आवश्यक है, जो गर्म और तीव्र प्रकृति के हैं। दृष्टि, नजर, शरीर की ऊष्मा, तापमान, रंग, चमक, क्रोध, साहस आदिज्योतिष विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि व्यक्ति के जीवन तथा चरित्र को मूलतत्व किस प्रकार प्रभावित करते हैं। जहाँ ज्योतिष के अनुसार तत्व एक ब्रह्मांडीय कंपन के लक्षण बताते हैं
 ।इन सभी तत्वों को समझ कर हम तत्वों को कुछ प्रयोग के द्वारा संतुलन में कर सकते हैं जिससे हमारे आगे की यात्रा बढ़ सके। जैसे-जैसे हम क्रिया करेंगे उसका अनुभव हमें प्रत्यक्ष मिलेगा। हमारी हाथ की उंगलियों में तत्व संदेश देंगे कि कौन सा तत्व आपके भीतर कम है और कौन सा अधिक है। हम जानते हैं कि हाथ की पांच उंगलियां इन्हीं पांच तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। अंगूठा अग्नि का, तर्जनी वायु का, मध्यमा आकाश का, अनामिका पृथ्वी का और कनिष्का जल का प्रधिनिधित्व करती हैं। इन उंगलियों में विद्युत धारा प्रवाहित होती रहती है।
मानव शरीर प्रकृति द्वारा तैयार की गई एक मशीन है जिसके सूक्ष्म संसाधनों व तंत्रों और तत्वों के प्रयोग की सटीक सहज क्रिया के जरिए हम अपनी ऊर्जा को निरंतर गति दे सकते हैं।
.इन पाँच तत्वों के साथ शरीर चलता है .किसी में ज्यादा ,किसी में कम यह देखने को मिलता है  और इनपाँच तत्वों के से ही ब्रह्मांड बना है और उसी पर ज्योतिष शास्त्र आधारित हैसभी बारह राशियों को तत्वों के आधार पर  चार भागों में बाँटा गया है.और उसी प्रकार ग्रहो की यौगिक विज्ञान के अनुसार हमारा शरीर और यह सारा अस्तित्व पांच तत्वों से मिलकर बना है। ऐसे में खुद को रूपांतरित करने का मतलब होगा - बस इन पांच तत्वों को अपने लिए फायदेमंद बना लेना। हमारे ऋषि-मुनियों में इस पर काफी शोध की रिसर्च की उन्होंने ने अपनी दूरदर्शिता और अनुभूति के आधार पर तथा जन्मकुंडली में ग्रह-राशियों के विन्यास से यह आकलन करने का प्रयास किया कि किस रत्न के प्रयोग से मनुष्य की दैहिक और मानसिक विसंगतियां दूर होती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अतिरिक्त आयुर्वेद शास्त्र में भी रत्न प्रयोग से दैहिक रोग मुक्ति का विधान है। रत्न सिद्धांत: आकाश, अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी नामक पंचमहाभूतों से प्राणी देह का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति का निर्माण हुआ है। समन्वित पंचमहाभूतों के स्थापन से हमारी देह स्वस्थ रहती है, मगर इनमें समन्वय के अभाव से देह अनेक व्याधियों से प्रकुपित होने लगती है। ग्रहों की किसी विशेष अवस्था और उनसे उत्सर्जित ऊर्जा की किसी विशेष मात्रा से दैहिक और मानसिक पुष्टता होती है, जो उत्साह, उमंग, वीरता, विवेकशीलता और पराक्रम की द्योतक है तथा ग्रहों की किसी विपरीत अवस्था में दैहिक और मानसिक दुर्बलता होती है, जो, निराशा, हताशा और असफलता की द्योतक है। ऐसी दुर्बलता की अवस्था जिन ग्रह और नक्षत्रों के कारण होती है, उससे संबंधित रत्न धारण करने से मुक्ति मिलती है। इस प्रकार रत्न संबंधित ग्रह की रश्मियों को एकत्र करके हमारी देह में समावेश करा कर उस ग्रह को अनुकूल करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इसके लिए रत्न जड़ित मुद्रिका इस प्रकार बनाई जाती है कि रत्न दैहिक त्वचा को स्पर्श करता रहे। विभिन्न रत्नों को विभिन्न उंगलियों में धारण किया जाता है, क्योंकि प्रत्येक उंगली से निकलने वाली संदेश संवाहिक तंत्रिका मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों में जाती है। इसलिए रत्न विशेष का प्रभाव उंगली विशेष के माध्यम से मस्तिष्क की विशेष कोशिकाओं को संवेदित करती है। ज्योतिष के अनुसार जब जन्म कुंडली, गोचर कुंडली योगकारक कोई ग्रह निर्बल होता है और उसकी निर्बलता से शरीर में रोग उत्पन्न होता है, तब उस ग्रह से संबंधित रत्न धारण करके या उस रत्न की भस्म का सेवन करके उस ग्रह को बलवान किया जाता है। यह रत्न चिकित्सा का मूलभूत आधार है। यह विज्ञान सम्मत है कि रत्न एक लेंस और प्रिज्म की भांति कार्य करते हैं, जो आकाशीय प्रकाश किरणों को संग्रह करके अपवर्तित करते हैं, जिनसे हमारे कोशिकीय तंतुओं का पोषण होता है। हमारे शरीर में जिस तत्व की कमी हो जाती है या  कहें कि जिस ग्रह के बल की कमी हो जाती है  तो आपकी कुंडली के आधार पर उस ग्रह को बल देने के लिए रतन धारण करवाए जाते हैं यहां मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि रत्न कभी भी राशि के आधार पर नहीं पहने जाते और ना ही दशा महादशा के आधार पर रत्न हमेशा आप अपनी जन्म कुंडली हस्तरेखा के आधार पर ही पहनें  आचार्य राजेश

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

#महाशिवरात्रि#2020 पर विशेष

भगवान शिव के विवाह का दिन फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को माना जाता है। शिवपुराण में इस चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। इस शिवरात्रि में महा इसलिए लगा है क्योंकि शिवरात्रि तो हर महीने में एक बार आती है लेकिन फाल्गुन मास की शिवरात्रि साल में केवल एक बार आती है। महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए हैमहाशिवरात्रि भारत के सबसे बड़े और पवित्र रात्रि उत्सवों से एक है। महाशिवरात्रि साल की सबसे अँधेरी रात होती है, और इस रात शिव की कृपा का उत्सव मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि शिव आदिगुरू या पहले गुरु हैं, क्योंति यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है। इस रात में आध्यात्मिक शक्तियां अधिक जागृत होती हैं इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि इस रात का उपयोग ध्यान, योग, तप और साधना में करना चाहिए।इस रात ग्रहों की विशेष स्थिति होने के कारण, मानव शरीर में ऊर्जा खुद ब खुद ऊपर की ओर चढ़ती है, और पूरी रात रीढ़ को सीढ़ी खड़ी रखकर जागना और जागरूक रहना शारीरिक और आध्यात्मिक खुशहाली के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि 21फरवरी को है। इस अवसर पर कई दुर्लभ संयोग बने हैं ऐसे में इसदिन का महत्व और बढ़ गया है।शिवरात्रि पर्व इस बार 21 फरवरी को मनाया जायेगा। हिंदू धर्म में इस दिन को बेहद ही खास माना जाता है।यहमहाशिवरात्रि कई मायनों में खास रहने वाली है। क्योंकि इस दिन 59 साल बाद विशेष संयोग बन रहा है इस दिन विशेष संयोग बन रहा है जो पर्व को और भी खास बनाएगा। इसमें विष योग, बुधादित्य और सर्प योग, अंगारक योग भी रहेगा। साथ ही पंचमहापुरुष योग में से एक मालव्य योग व गुरु कुलदीपक योग बनाएंगे। माल्वय व कुलदीपक योग 21फरवरी की रात्रि 2.15 बजे से भोर में 4.19 बजे तक रहेगा।

ये सभी योग महाशिवरात्रि पर्व को और भी खास बना रहे हैं। इस विशेष योग में जन्म लेने वाले जातक पर भगवान शिव की विशेष कृपा बरसेगी। महाशिवरात्रि 21 तारीख फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ेगी।

इस दिन शाम 5.20 बजे से शुरू होकर अगले दिन 22 फरवरी दिन शनिवार को शाम सात बजकर दो मिनट तक रहेगी। रात्रि प्रहर की पूजा शाम को 6.41 बजे से रात 12.52 बजे तक होगी। अगले दिन सुबह मंदिरों में भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाएगी।

ऐसे में भगवान चंद्रमौलीश्वर का पूजन अवश्य करना चाहिए। शश योग। इस दिन चंद्र शनि की मकर राशि में युति हो रही है।चंद्रमा मन का कारक है। वहीं शनि दुख कर कारक है। ऐसे में चंद्र-शनि की युक्ति को विष योग कहते हैं। इसका एक पक्ष यह भी है कि मन जब भी अवसाद में आता है तो विरक्त होने लगता है।इस साल शनि ने 23 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश किया है। शिवरात्रि यानि इस साल से पहले करीब 28 साल पहले शिवरात्रि पर विष योग 2 मार्च 1992 को बना था। इस योग में शनि और चंद्र के लिए विशेष पूजा करनी चाहिए। शिवरात्रि पर ये योग बनने से इस दिन शिव पूजा का महत्व और अधिक बढ़ गया है। कुंडली में शनि और चंद्र के दोष दूर करने के लिए शिव पूजा करने की सलाह दी जाती है।

साथ ही ये योग ज्ञान की खोज भी कराता है। भगवान शिव का दुग्ध, दही, मधुरस, घृत, गन्ना रस, शक्कर समेत विभिन्न प्रकार से अभिषेक करना चाहिए। इससे भगवान शिव की कृपा मिलेगी। इसलिए इस योग के बनने से साधना सिद्धि के लिए ये दिन खास रहेगामहाशिवरात्रि पर बनने वाले विष योग में दूध और तिल मिलाकर अभिषेक करने से शनि देव का आशीष मिलेगा। इस संवत्सर के राजा शनि अपनी स्वराशि है। साथ चंद्रदेव व सूर्यदेव भी शनि की राशि में है। शनिदेव और चंद्रदेव के आराध्य भगवान शिव हैं।

इससे शिवरात्रि पर बनने वाले इस विशेष योग में भगवान शिव के साथ ही शनिदेव और चंद्रदेव का भी आशीष मिलेगा। पूजन से शनि और चंद्रदेव की कृपा भी मिलेगी। दूसरी खास बात ये है कि महाशिवरात्रि के पावन दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। जिसमें शुभ कार्य संपन्न करने से लाभ मिलता है। इसी के साथ 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग भी महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है। इस शिवरात्रि शनि अपनी राशि मकर में मौजूद रहेंगे और शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेगे रबुधादित्य और सर्प योग भी रहेंगे शिवरात्रि पर
21 फरवरी को बुध और सूर्य कुंभ राशि में एक साथ रहेंगे, इस वजह से बुध-आदित्य योग बनेगा।शिवरात्रि पर बुध अपने मित्र और सूर्य अपने पुत्र के घर में एक साथ रहेंगे, इस वजह से बुध-आदित्य योग बनेगा। इसके अलावा इस दिन सभी ग्रह राहु- केतु के मध्य रहेंगे, इस वजह से सर्प योग भी बन रहा है।

केतु व मंगल एक ही भाव में युति बना रहे हैं, इसे मंगल केतु अंगारक योग कहते हैं। मंगल अग्नि तत्व से संबद्ध है, जबकि केतु काम वासना व लालसा का वाचक है। यह स्पर्शनीय शक्ति उत्पन्न् करते हैं, जो नकारात्मक नतीजे प्रदान करती हैं। शिव पूजन से ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव से भी मुक्ति मिलेगी। इसके अलावा इस दिन  शिवरात्रि पर राहु मिथुन राशि में और केतु धनु राशि में रहेगा। शेष सभी ग्रह राहु-केतु के बीच रहेंगे। सूर्य और बुध कुंभ राशि में, शनि और चंद्र मकर राशि में, मंगल और गुरु धनु राशि में, शुक्र मीन राशि में रहेगा। सभी ग्रह राहु-केतु के बीच होने से सर्प योग बनेगा।इस साल शिवरात्रि पर शनि अपनी स्वयं की राशि मकर में और शुक्र ग्रह अपनी उच्च राशि मीन में रहेगा।  ये एक दुर्लभ योग है, जब ये दोनों बड़े ग्रह शिवरात्रि पर इस स्थिति में रहेंगे। 2020 से पहले 25 फरवरी 1903 को ठीक ऐसा ही योग बना था और शिवरात्रि मनाई गई थी। इस साल गुरु भी अपनी स्वराशि धनु राशि में स्थित है। इस योग में शिव पूजा करने पर शनि, गुरु, शुक्र के दोषों से भी मुक्ति मिल सकती है। 21 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। पूजन के लिए और नए कार्यों की शुरुआत करने के लिए ये योग बहुत ही शुभ माना गया है।जिन लोगो को केरियर से संबंधित परेशानी आ रही है करियर में सफलता और असफलता के लिए कुडंली में बुध ग्रह को जिम्मेदार माना गया है। नौकरी, बिजनेस और पढ़ाई में आने वाली बाधा को दूर करने के लिए इस महाशिवरात्रि पर  शिवलिंग पर पारद भस्म का लेपन करें व दूर्वा घास चढ़ाएं।। ऐसे में भगवान शिव का सरल विधि से किया गया पूजन आपके दुख दूर कर सकता है। भोलेनाथ को दही एवं मिश्री अर्पित करें। बुध का दोष दूर हो  इस उपाय से करियर संबंधी बाधा दूर हो जाती है।
मानसिक परेशानी को दुर करने के लिए
कुंडली में ग्रह दोष होने से व्यक्ति की मानसिक परेशानी बढ़ जाती है। ज्योतिष में मानसिक परेशानी का संबंध चंद्रमा से संबंधित ग्रह दोष के कारण होता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर दूध ओर चावल मिलाकर अभिषेक करें व चांदी भस्म का लेपन करें भोले नाथ को खीर का भोगअर्पित करना चाहिए। मान-सम्मान में आई गिरावट को दूर करने के उपाय
अगर किसी की कुंडली में सूर्य ग्रह से संबंधित कोई दोष हो तो व्यक्ति के मान-सम्मान में गिरावट होने लगती है और अपयश का सामना करना पड़ता है। मान-सम्मान को बढ़ाने के लिए महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं और शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।हत संबंधी परेशानियों से छुटकारा पाने के उपाय
कुंडली में राहु-केतु के अशुभ घर में बैठने पर स्वस्थ्य संबंधी परेशानियां आने लगती है। सेहत को ठीक करने के लिए महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को धतूरा चढ़ाएं।विल्व पत्र चढाऐ
विवाह संबंधी दोष को दूर करने के उपाय
कुंडली में बृहस्पति ग्रह के कमजोर और दोष होने से विवाह होने में तमाम तरह की परेशानियां आने लगती है। साथ ही पति-पत्नी में मनमुटाव भी बढ़ने लगता है। कुंडली में इस दोष को दूर करने के लिए इस पवित्र महाशिवरात्रि पर शिवलिंग  दुघ में ग़ज़ल मिलाकर अभिषेक करें तथा पीले फूल और केले अर्पित करें   
संतान प्राप्ति में विलंब हो रहा है अथवा संतान पर संकट आ रहे हैं, वैवाहिक रिश्तों में कड़वाहट घुल रही है तो यह शुक्र का दोष हो सकता है। इसके लिए पंचामृत से भोलेनाथ का अभिषेक कीजिए। शिवकृपा से सब मंगल होगा
 शनिदेव का दोष जातक को अनेक कष्ट देता है। हालांकि हनुमानजी के पूजन एवं शनि को तेल चढ़ाने से भी कोप शांत होता है लेकिन शिवरात्रि पर भगवान शिव का गन्ने के रस से किया गया अभिषेक भी श संगनि को शांत कर सकता है। इससे आपके बिगड़े काम बनने लगेंगे। और शिवलिंग पर बदाम चढ़ाएं  ्महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर एक लोटा जल चढ़ाने से ही भगवान शिव अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। भगवान शिव अपने भक्तों पर जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं उतनी ही जल्दी उनसे रुष्ट भी हो सकते हैं। ऐसे में आइए जानते वो वाते  जिसे भूलकर भी भगवान शिव की पूजा के दौरान नहीं करना चाहिए। 
शंख जल- भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है जो भगवान विष्णु का भक्त था। इसलिए विष्णु भगवान की पूजा शंख से होती है शिव की नहीं।
 पुष्प- भगवान शिव जी की पूजा में केसर, दुपहरिका, मालती, चम्पा, चमेली, कुन्द, जूही आदि के पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिए।
करताल- भगवान शिव के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
तुलसी पत्ता- जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा के अंश से तुलसी का जन्म हुआ था जिसे भगवान विष्णु ने पत्नी रूप में स्वीकार किया है। इसलिए तुलसी से शिव जी की पूजा नहीं होती।
तिल- यह भगवान विष्णु के मैल से उत्पन्न हुआ मान जाता है इसलिए इसे भगवान शिव को नहीं अर्पित किया जाना चाहिए।
टूटे हुए चावल- भगवान शिव को अक्षत यानी साबूत चावल अर्पित किए जाने के बारे में शास्त्रों में लिखा है। टूटा हुआ चावल अपूर्ण और अशुद्ध होता है इसलिए यह शिव जी को नही चढ़ता।
कुमकुम- यह सौभाग्य का प्रतीक है जबकि भगवान शिव वैरागी हैं इसलिए शिव जी को कुमकुम नहीं चढ़ता।

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

शनि देते हैं आपके किए गए कार्मो का फल?


शनिदेव को सूर्य पुत्र एवं कर्मफल दाता माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है।सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ उचित न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही कोउनके कर्मो के अनुसार दण्डिंत (प्रताडित) करते हैं। अनुराधा नक्षत्र के स्वामी शनि हैं।नि के दो घर माने जाते है एक करने वाला और एक सोचने वाला। जो लोग काम को करने के बाद सोचते है वे मकर की श्रेणी मे आते है और जो सोच कर करते है वे कुम्भ की श्रेणी में आते है। कार्य को करने के बाद सोचने की क्रिया को करके सीखने का होता है और सीख कर करने की क्रिया को शिक्षा को पूर्ण करने के बाद कर्म की क्रिया को कहा जाता है। कार्य को करने के बाद जो सीखता है वह कार्य के बारे में गूढ रूप से जानता है कारण उसके द्वारा प्रेक्टिकल में कार्य किया जाता है। लेकिन सीख कर कार्य को जो करता है वह कार्य में अनुभव के बिना कहीं न कहीं अटक जाता है। , मित्रों शनि कर्म का कारक है,कर्म करने के लिये शनि अपनी पूरी ताकत देता है,कितना ही आलसी व्यक्ति हो शनि अपने अनुसार वक्त पर कर्म करने के लिये अपनी ताकत को दे ही देता है। व्यक्ति को शनि जमीनी ताकत का बोध करवाता है,कैसे जमीन से उगा जाता है और उगने के बाद समय के थपेडे किस प्रकार से खाये जाते है,तब जाकर किस प्रकार से कर्म की कसौटी पर उसे खरा उतरना पडता है। शनि के तीन रूप माने जाते है और तीनो रूपों को जन्म कुंडली के अनुसार परखा जाता है। शनि मार्गी होता है तो सम्बन्धित भाव के कार्य वह पूरे जीवन करवाता रहता है,चाहे वह अच्छा हो या बुरा कर्म तो मनुष्य को करने ही पडेंगे,वह गोचर से भी जिस भाव में प्रवेश करेगा,जन्म कुंडली के भाव के अनुसार ही अपनी शिफ़्त को प्रदान करेगा। मार्गी शनि शारीरिक मेहनत करवाता है और वक्री शनि दिमागी काम करवाता है,दिमागी कार्य करने के लिये वह अपने फ़ल भावानुसार ही देता है। व्यक्ति को अगर कहीं शारीरिक मेहनत करने के अवसर आते है और वह अपने द्वारा शारीरिक मेहनत करने के लिये उद्दत होता है तो वह शारीरिक मेहनत के अन्दर असफ़लता देता है,लेकिन दिमागी मेहनत के अन्दर अपने बल को प्रदान करता रहता है। उसी प्रकार से अगर शनि कुंडली में मार्गी है,और व्यक्ति अगर दिमागी मेहनत करने के कारण कही भी प्रस्तुत करता है तो उसे सफ़लता नही मिलती है। लेकिन वह अपने अनुसार शारीरिक मेहनत को करने के बाद सफ़ल होता जाता है। शनि अस्त का प्रभाव अपने में बहुत महत्व रखता है,जन्म स्थान का शनि अगर अस्त है तो वह गोचर से जिस भी भाव में प्रवेश करेगा,उस भाव के जन्म के भाव से सम्बन्धित कार्यों को बन्द कर देगा,चलते हुये कार्य बन्द होने के कारण मनुष्य को बैचेनी हो जाती है,वह सोचने लगता है कि उसके द्वारा कोई भूल हुयी है और उसी भूल से उसका कार्य बन्द हुआ है,लेकिन जैसे ही शनि अपने समय के अनुसार आगे बढेगा वह बन्द किये गये कार्य को शुरु कर देगा और आगे के कार्य बन्द कर देगा,इस तरह से व्यक्ति के जीवन में शनि का जो योगदान मिलता है वह समझकर ही अगर किया जाता है तो व्यक्ति की सफ़लता मिलनी निश्चित होती है। उदाहरण के तौर पर अगर शनि बारहवे भाव में जाकर वक्री हो गया है,बारहवां भाव जेल जाने का कारण भी बनाता है,अगर शनि मार्गी होता है तो जेल में जाकर जेल के कार्य करना और जेल सम्बन्धी दुख भोगना जरूरी होता है,लेकिन शनि अगर बारहवें भाव में वक्री है तो वह दूसरों को जेल जाने के कारणॊं से बचाता है,उसके अन्दर दिमागी ताकत आजाती है और वह कानून या अन्य कारणों से दूसरों को अपने द्वारा जेल जाने की नौबत से दूर रखने में अपनी सहायता करता है। बारहवा भाव मोक्ष का भाव भी कहा जाता है,जातक की कुन्डली में वह जहां भी गोचर करेगा मोक्ष के भावों को प्रस्तुत करता चला जायेगा। शनि के साथ,शनि से पंचम नवम भाव में जो भी ग्रह होंगे वे शनि को सहायता देने वाले ग्रह होंगे,अगर वह अच्छे ग्रह है तो अच्छी सहायता करेंगे और खराब ग्रह है तो खराब सहायता करेंगे। जैसे शनि अगर बारहवां है और शनि से नवें भाव यानी अष्टम भाव में सूर्य है तो शनि को सरकारी और पिता सम्बन्धी सहायता मिलेगी,वह सरकारी कारणों में जो कि कानूनी भी हो सकते है,साथ ही शनि अगर बारहवें भाव में वृष राशि का है तो वह धन सम्बन्धी कारणों से लोगों को जेल जाने और पारिवारिक कारणॊं से जेल जाने और बडी मुशीबत से फ़ंसने में सहायता करेगा। इसी शनि के अगर नवें भाव में सूर्य है तो कार्यों के मामले में पिता और बडे सरकार से सम्बन्धित बडे अधिकारियों और राजनीतिक लोगों से लाभ देने के मामले में भी जाना जायेगा,पिता के द्वारा धन सम्बन्धी कारणों को सुलझाने के दिमागी कारणों को जातक ने अपने जन्म से ही सीखा होगा और वह पिता की छत्रछाया में ही बडे बडे अफ़सरों से मिलता रहा होगा तथा समय पर अपने लिये उन्ही लोगों और पिता से सम्बन्धित ज्ञान को समय समय पर प्रकट करने के बाद अपने कार्यों को करने में अपनी योग्यता को प्रकट करेगा। इसके साथ ही अगर इस शनि को अगर गुरु का प्रभाव भी शनि से नवें भाव से मिला होगा तो वह कानूनी रूप से अपने कार्यों को करने वाला होगा,वैसे साधारण ज्योतिष के अनुसार वृष राशि के नवें भाव में मकर राशि का स्थान है और यहां पर कई लोग गुरु को नीच का मान लेते है लेकिन गुरु अगर अष्टम में है तो वह नीचता को त्याग देगा,कारण बारहवें भाव में वृष राशि होने का मतलब होता है कि लगन मिथुन लगन की है और मिथुन लगन से अष्टम में गुरु का स्थान मकर राशि में होने से वह अपनी नीच प्रकृति को त्याग कर विपरीत राजयोग की श्रेणी को प्रस्तुत करेगा। इसके लिये कई विद्वानों ने अपने अपने भाव प्रदान किये है लेकिन नीच के गुरु की मान्यता तभी तक मान्य थी जब तक वर्ण व्यवस्था कायम थी और लोग अपने अपने वर्ण के अनुसार ही कार्य किया करते थे, आज किसी भी वर्ण का व्यक्ति कोई भी कार्य करने के लिये स्वतंत्र है,ब्राह्मण हरिजन के भी कार्य कर रहा है और हरिजन ब्राह्मण के भी कार्य कर रहा है,पानी भरने के लिये पहले भिस्ती का काम हुआ करता था आज कोई भी पानी भरने के लिये अपने कर्म को प्रदान कर सकता है,पहले राजपूतों का कार्य केवल रक्षा करना होता था तो आज राजपूत आराम से कृषि वाले कार्य भी कर रहे है और पूजा पाठ के कार्यों में भी लगे है। इस प्रकार से गुरु की नीचता का प्रभाव अब उस तरीके से नही माना जाता है। चूंकि मकर राशि का प्रभाव अष्टम में जाने से धन सम्बन्धी कार्यों की विवेचना करने से भी माना जाता है जो धन अनैतिक रूप से लोग अपने पास अण्डर ग्राउंड बेस में रखते है लेकिन किसी प्रकार के मंगल के दखल के कारण उस धन को सही रूप में साबित करने और धन के मामले में उचित सलाह देने तथा राजकीय अधिकारियों से जान पहिचान होने से और कानूनी बातों का पता होने से इस स्थान के गुरु और बारहवें भाव के बक्री शनि की ताकत से वह अपने दिमागी बल से अफ़सरों से जान पहिचान करने के बाद जो भी जेल जाने या बरबाद होने की स्थिति में आता है उसे जातक के द्वारा बचा लिया जाना माना जाता है। इसी प्रकार से अगर गुरु को बल देने के लिये अन्य ग्रह भी जैसे सूर्य भी है गुरु भी है और शुक्र भी है तो जातक की महिमा अपने समय के अनुसार आगे से आगे बढ जाती है। केवल सूर्य गुरु के कारण यह शनि कानूनी मान्यता को ही अपने जाल से निकालने में सहायता करता है लेकिन शुक्र के साथ हो जाने से सम्पत्ति से भी दूर करने में सहायता करता है जो भी सम्पत्ति है उसे जातक के प्रयास से दूसरी रास्ताओं के द्वारा सूचित किया जाता है और इस प्रयास से जातक खुद के अलावा राजकीय अधिकारियों और जिसकी गल्ती पकडी गयी उसे भी फ़ायदा देने के लिये उत्तम माना जाता है। वक्री शनि का दूसरा प्रयास होता है दिमागी रूप से लगातार आगे बढना,कारण लगन को बल देने के लिये यह शनि बहुत अच्छे प्रयास करता है,शनि बालों का और चमडी का कारक भी है,अगर बारहवां शनि मार्गी है तो जातक की खोपडी में घने बाल होंगे और शनि बारहवें भाव में वक्री है तो जातक की खोपडी गंजी होती है। इस शनि का प्रभाव जातक की कुंडली में दूसरे भाव में भी होता है,दूसरा भाव जातक के लिये धन और अपने ही परिवार के लिये माना जाता है,इसके अलावा भी यह देखा जाता है कि जब भी जातक को किसी प्रकार से धन की जरूरत महसूस होती है तो जातक को गुप्त रूप से सूर्य और गुरु के साथ शुक्र की सहायता मिल जाती है,कारण इस शनि से नवें भाव में विराजमान ग्रह उसे वक्त पर सहायता देने के लिये हमेशा आगे रहते है।
शनि के कर्म भाव में यानी शनि से दसवें भाव में जो भी भाव होता है वह कानूनी और विदेश से सम्बन्धित होता है जातक के लिये वह भाव भाग्य वाली बातों के लिये भी जाना जाता है,जैसे शनि के दसवें भाव में अगर कुम्भ राशि है,तो जातक के लिये लाभ और मित्रों की सहायता कानूनी रूप से मिलनी जरूरी है,अगर उस भाव में चन्द्रमा है तो जातक जनता से जनता वाली मुशीबतों का कार्य करने के बाद अपने क्षेत्र में नाम करने के लिये माना जायेगा,इसके अलावा अगर मंगल है तो वह कानूनी रूप से लडी जाने वाली लडाइया और बडे रक्षा वाले पदों के लिये अपनी मान्यता को दिमागी रूप से रखेगा और अगर बुध है तो जातक के लिये कानून वाले काम तथा कमन्यूकेशन वाले काम और धर्म से सम्बन्धित लोगों को दान देने वाले काम हमेशा आगे बढाते रहने के लिये अपना योगदान करते रहेंगे,गुरु के होने से जातक के लिये जन्म स्थान से दूर जाकर बडे बडे कार्य करने का अवसर मिलता है,यात्राओं वाले कार्यों के लिये और रहने आदि के लिये स्थान प्रदान करवाने के लिये जातक की समय पर सहायता मिलती रहती है शुक्र के होने से जातक के पास पारिवारिक सम्पत्ति होती तो बहुत है लेकिन उसे प्रयोग करने के लिये उसे अपने पारिवारिक जनों से दिक्कत मिलती है,इस तरह से शनि को कर्म के रूप में मान्यता दी गयी है। आ ज इतना ही आचार्य राजेश

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

सप्ताह के साथ दिनों का क्या है रहस्य? (2)

पहली पोस्ट का link http://acharyarajesh.in/2019/12/27/%E0%A4%B8%E0%A4

मित्रों मैंने हाल ही में एक पोस्ट डाली थी 7 सप्ताह के साथ दिनों पर पर कुछ एक मित्रों ने उस पर कुछ टीका टिप्पणी की बेसिर पैर की बातें की बिना कोई तथ्य दिए-मित्र बहुत ही मेहनत करने के बाद पत्थर आदि को काट छांट कर बहुत ही सुन्दर तरीके से घर सप्ताह के साथ दिनों का क्या है रहस्य? (2)को बनाया जाता है,उसे सजा कर संवार कर रखा जाता है,लेकिन चीटी का स्वभाव सभी को पता है वह अपनी आदत के अनुसार उस घर के अन्दर हमेशा भाग भाग कर छेद को खोजा करती है। उसे लगने वाली मेहनत और भावना का पता नही होता है वह केवल छेद की भावना को लेकर ही अपने पूरे जीवन को व्यतीत कर देती है। यह भावना अक्सर उन्ही लोगों के अन्दर भी पायी जाती है खैर छोड़िए हम अपनी बात पर आते है जैसे मैंने पहले ही कहा हैआपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है।विवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार यह साथ दिन बनाये गये है,इन दिनों को बनाने का उद्देश्य केवल सप्ताह के समय को विभाजित करना ही था,साथ ही कल और आज तथा आज और कल के भेद को समझना भी था। इन दोनो के पीछे जो थ्योरी छिपी थी वह शायद हर किसी को पता नही है,बहुत बडा गूढ विषय है,इस विषय पर प्रकाश डालने की कोशिश तो की है,किसी प्रकार की त्रुटि अगर हो जाये तो क्षमा भी करना आपका ही काम है।
सूर्य को पिता के रूप में चन्द्र को माता के रूप में मंगल को पराक्रम के रूप में बुध को बुद्धि के रूप में गुरु को जीव के रूप में ज्ञान के रूप में सम्बन्ध के रूप में शुक्र को धन सम्पत्ति और पत्नी के रूप में शनि को कार्यों के रूप में अधिकतर माना जाता
है। पिता ने माता की सहायता से जीव के पराक्रम को प्रकट किया,हिम्मत दी और संसार में बुद्धि प्राप्त करने के लिये उतार दिया,बुद्धि का कारक बुध है और बुध से इस जीव की उत्पत्ति को मानते है,बुध का रूप गोल है मतलब तीन सौ साठ डिग्री का है पूरा बुध,दुनिया भी गोल है,यानी पूरी तीन सौ साठ डिग्री की। इस संसार में तीन सौ साठ प्रकार की बुद्धि पायी जाती है,आगे कभी इन सभी बुद्धियों का विवेचन करूंगा। अक्सर इन्ही तीन सौ साठ प्रकार की बुद्धियों के मामले में कहावत कही जाती है कि- "तुम्हारे जैसे तीन सौ साठ लोग बेवकूफ़ बनाने वाले मिलते हैं",अक्सर यह बात लोगों के मुँह से कहावत के रूप में सुनी जाती है। बुध को मुख्य माना जाता है इसी के आसपास सभी ग्रह घूमते है। अगर पराक्रम और हिम्मत माता पिता ने सही दी है तो बुद्धि सही काम करेगी,और माता पिता के द्वारा ही पराक्रम और हिम्मत को गलत दिया गया है तो बुद्धि अपने आप कुत्सित होकर गलत काम करेगी। बुध से आगे गुरु आता है और बुध के पीछे मंगल,मंगल पराक्रम और हिम्मत का मालिक है बुध बुद्धि का और गुरु सम्बन्ध का,अगर हिम्मत और पराक्रम सही है तो बुद्धि अच्छी तरह से काम करेगी और सम्बन्ध भी अच्छे बनेंगे,इसके विपरीत सम्बन्ध खराब हो जायेंगे। सूर्य अनाज का कारक है चन्द्र पानी का,अगर अनाज और पानी सही लिया है तो शरीर में खून अच्छा बनेगा और वह बुद्धि को भी सही पैदा करेगा,साथ ही बुद्धि के सही होने पर ज्ञान की मात्रा भी अधिक से अधिक प्राप्त की जायेगी। लेकिन सूर्य के पीछे भी शनि लगा है,अगर सही कर्म करने के बाद अनाज को पैदा किया गया है तो अनाज भी आगे सही परिणाम देगा,शनि के पीछे भी शुक्र विराजमान है,अगर शुक्र से अपनी सही रीति नीति शनि को दी है तो शनि भी सही कार्य करेगा,और पीछे से शुक्र भी खराब है तो शनि अपने आप खराब हो जायेगा। शुक्र के पीछे भी गुरु लगा है,अगर ज्ञान की मात्रा समुचित है और वह शुक्र के लिये प्रयोग किये जाने योग्य है तो शुक्र सही काम करेगा,अगर गुरु ही खराब है तो शुक्र अपने आप खराब हो जायेगा। गुरु के पीछे बुध लगा हुआ है यानी बुद्धि को सही प्रयोग में लाया गया है तो गुरु अपना सही काम करेगा,यह थी साधारण रूप में दिनो की समीक्षा। इस समीक्षा को अगर उदाहरणों के रूप में प्रकट करें तो इस प्रकार से प्रकट होगा:-बुद्धि को सही रूप से प्रकट करने के बाद गुरु यानी समबन्ध को सही बनाया गया है तो शुक्र यानी पत्नी उस सम्बन्ध को निभाकर शनि यानी अच्छे कर्म करेगी,और जब अच्छे कर्म होंगे तो सूर्य यानी पैदा होने वाली संतान भी सूर्य यानी पुत्र और चन्द्र यानी पुत्री अपने अपने अनुसार सही होंगे,और वे अच्छे अच्छे पराक्रम पैदा करने वाले होंगे उनकी बुद्धि भी सही होगी,और वे भी गुरु की सम्बन्ध वाली नीति को सही लेकर चलेंगे।
बुध को सही रूप से प्रकट नही किया गया है तो सम्बन्ध भी सही नही बनेगा,सम्बन्ध सही नही बनेगा तो वह वापस जहां से शुरु हुये थे वहीं जाकर पटक देगा,बुध से पीछे का दिन मंगल है,मंगल की सिफ़्त तीन जगह पर पायी जाती है,पहली तो धर्म स्थान में है जहां पर अपने किये गये माइनर पापों के लिये प्रायश्चित किया जा सकता है,दूसरी जगह पुलिस है जहां पापों का प्रायश्चित नही करने पर भी करवा लिया जाता है और सीधा जेल का रास्ता दिखा दिया जाता है वहां बैठ कर अपने पापों का प्रायश्चित आराम से करते रहो,तीसरा स्थान अस्पताल का होता है,डाक्टर पेट भी फ़ाडेगा और पेट फ़ाडने का धन भी लेगा,अथवा अपने ही घर पर उसका प्रायश्चित मिलेगा,डकैत आयेगा वह पेट भी फ़ाडेगा और धन भी ले जायेगा,अथवा रास्ते में प्रायश्चित करना पडेगा,एक्सीडेन्ट होगा अस्पताल जाना पडेगा,धन भी जायेगा और प्रायश्चित भी करना होगा,अगर किसी प्रकार से बुद्धि ने अपनी जगह सही नही प्राप्त की तो डाक्टर बजाय दाहिने हाथ के बायें हाथ का आपरेशन कर देगा,और भी बुद्धि ने काम नही किया तो वह सही किडनी को खराब और खराब को सही बताकर ऊपर का रास्ता दिखा देगा,इसलिये सबसे पहले अपनी बुद्धि को सुधारना जरूरी है तब दिनों के नाम लेने और दिनो को गिनने का फ़ल सही मिलेगा। मित्रों आगे हम बात करेंगे कि सृष्टि कैसे बनीं हमारे वेद क्या कहते हैं। आगे हमारे ऋषि मुनि की बानी क्या कहती है हमारे पुराणों में क्या लिखा है उन सब पर मैं आपको बताने की कोशिश करूंगा ताकि जो हमारा सनातन धर्म है हिंदू धर्म है। उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को ज्ञान प्राप्त हो क्योंकि ज्ञान बांटने से ही वड़ता है, इसलिए अगर आपके पास भी कोई ऐसी जानकारी है तो आप जरूर शेयर करें, धन्यवाद मित्रों

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

कालसर्प योग है या दोष है क्या है सच क्या है झूठ? (4) कालसर्प के उपाय

https://youtu.be/9VwaX00qRcw

https://youtu.be/9VwaX00qRcw


मित्रों मेरी चौथी पोस्टभी कालसर्प पर ही है जैसा कि मैंने आपको बताया था कि हम कालसर्प दोष के उपाय के बारे में बात करना पहले मैं कुछ और चर्चा करना चाहता हूं हमारे हिंदू धर्म के बारे में जैसा कि कालसर्प राहु और केतु के कारण बनता है राहु सर्प का मुख कहा गया है और केतु सर्प की पूंछ भगवान श्री विष्णु शेष शैय्या पर समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। भगवान सदा शिव आभूषणों के रूप में वासुकी आदि नागों को शरीर पर धारण किए हुए हैं। जैन धर्म से जुड़ी मान्यता के अनुसार 23वें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ के सिर पर जो छत्र है वह नागों का है। उन्हें नागकुमार भी कहा गया है।
कौटिल्य, आचार्य चाणक्य, जो स्वयं काल सर्प योगी थे, ने ईसा पूर्व तीसरी सदी में अपनी कूटनीति से विश्व विजय का सपना लेकर आए सिकन्दर को व्यास नदी की तट सीमा पर ही रोक कर यूनानी सेना को (स्वदेश) वापस जाने को बाध्य किया तथा चन्द्रगुप्त मौर्य को विशाल आर्यावर्त का सम्राट बनवाया।
इतिहास साक्षी है दसवीं शताब्दी में केरल में नम्बूदिरिपाद ब्राह्मण आचार्य विद्याधर के धर्मात्मा पुत्र शिवगुरु के यहां शंकर ने जन्म लिया। उनकी कुंडली में भी कालसर्प योग था, जो आगे चलकर आदिगुरु शंकराचार्य के नाम से विख्यात हुए। उन्होंने वैदिक धर्म की धर्मध्वजा फहरायी और हिन्दू धर्म को पुनर्जाग्रत कर चार धामों (केदारनाथ, बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम्) की स्थापना कर भारतीय जनजीवन में धार्मिक आस्थाओं को जीवन्त किया।
चंगेज खां, एडोल्फ हिटलर और मुसोलिनी सरीखे जातकों की कुंडली में भी कालसर्प योग था। मुगल बादशाह अकबर, राष्ट्रपति अय्यूब खां, सद्दाम हुसैन, श्रीमती भंडार नायके, सर हेरोल्ड विल्सन, श्रीमती मारग्रेट थैचर तथा स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, पी.वी.नरसिंहराव, अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहीम लिंकन, बिल क्लिंटन, स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल, फिल्मी दुनिया से अशोक कुमार, दिलीप कुमार, संगीत की देवी लता मंगेशकर खेल जगत से मेजर ध्यानचंद (हाकी), सचिन तेंदुलकर आदि सभी व्यक्तियों की जन्म कुंडलियां कालसर्प योग से प्रभावित रही हैं।
मेरी दृष्टि में जो जानकारी आई- कालसर्प योग से प्रभावित व्यक्तियों की वह तो सूक्ष्मतम् है। मेरा मकसद मात्र इतना है कि जिन व्यक्तियों की कुंडली कालसर्प योग से प्रभावित हो, वे संघर्ष करें, विचलित न हों, अपने-अपने इष्ट की मनसा, वाचा-कर्मणा से साधना करें। विद्यार्थीगण 12 से 16 घंटे प्रतिदिन अपने अध्ययन, मनन में अध्ययनरत रहें, मेरा विश्वास है कि सफलताएं उनके कदम चूमेंगी।
भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना, अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वाहन के साथ ही पूरी करें। राष्ट्र सेवा सदैव ईमानदारी से करें। यथा संभव गरीबों की मदद करें। मानवीय संवेदनाएं आपके व्यक्तित्व को सजीवता प्रदान करेगी। पद का अंहकार कभी न करें अन्यथा पद से च्युत होते ही मानव समाज हिकारत की नजर से देखती है। वे कुर्सियां, वे लाल-पीली बत्तियां, वे मनुहार करते लोगों की भीड़ न जाने कहां गुम हो जाती हैं। यकीन न हो तो देखिये- वे राजनैतिक, प्रशासनिक चेहरे जो पदों से जैसे ही मुक्त हुए, समाज में रहते हुए भी वानप्रस्थ की मानसिकता में जी रहे हैं।
[30/01, 21:29] Acharya Rajesh: इस योग की खासियत है कि काल सर्प योगियों का जन्म निश्चित रूप से कर्म-भोग के लिए है। किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए अवतरित आत्मा की सन्तान भी कालसर्प योगी ही होगी। सूक्ष्म दिव्य संचालन राहु केतु करते हैं।
'काल सर्पयोग व्यक्ति, सामान्य व्यक्ति से कुछ अलग होते हैं। इसके अलावा इस योग के सकारात्मक फल भी होते हैं। साथ ही नकारात्मक फल भी इस योग में अन्य ग्रहों के कारण बनते हैं। मित्रों कल बहुत करते हैं उनकी मित्रों वैसे तो उपाय आपकी कुंडली के अनुसार ही बताए जाते हैं पर यहां कुछ आसान से उपाय जिसका कोई दुष्प्रभाव नहीं वो यह बताने की कोशिश कर रहा हूं जिसको करके आप लाभ उठा सकते हो
कालसर्प योग अत्यन्त ही चर्चित विषय है। इस विषय में सही जानकारी एवं ज्ञान रखने वाले ज्योतिषी अत्यन्त ही सीमित संख्या में हैं। कालसर्प योग इतना प्राचीन है कि 'लाल किताब में भी इसके निवारण के उपाय मिलते हैं। कालसर्प योग मूलत: सर्पयोग का ही परिष्कृत स्वरूप है। किसी भी जातक के भाग्य का निर्णय करने में राहु-केतु का बहुत योगदान रहता है। इसी कारण विंशोतरी महादशा में अठारह वर्ष और अष्टोत्तरी महादशा में बारह वर्ष राहु दशा मानी गई है।लाल किताब के अनुसार उपाय

राहु की स्थिति केतु की स्थिति लाल किताब के अनुसार उपाय
1/ 7 ठोस चांदी से बनी गेंद अपने पास सदैव रखें
2 /8 दो रंग का कम्बल दान करें
3 /9 चना दाल को पानी में प्रवाहित करें
4 /10 एक चांदी के डिब्बे में शहद घर के सामने गाड़ दें
5 /11 ठोस चांदी से बना हाथी घर पर रखें
6/ 12 जातक पालतू जानवर रखें
7/ 1 चांदी के बर्तन में जल रखें व घर में चांदी से बनी कोई चीज़ गाड़ दें |
8 /2 नारियल जल में प्रवाहित करें
9/ 3 चना दाल को नदी में प्रवाहित करें
10 /4 पीतल के बर्तन में पानी भरकर घर में रखें
11/ 5 किसी धार्मिक स्थल पर मूली दान करें
12 /6 सोने को धारण करें
लाल किताब में कई ऐसे अन्य उपायों का विवरण भी है | जैसा की हमने पहले भी आपको अवगत करवाया कि जातक को किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली में स्थित दोष के बारे में विस्तार से जान लेना चाहिए और उसी के अनुसार उपाय भी करवाना चाहिए | आप अपनी कुंडली लाल किताब के अनुभवी जानकार के साथ साझा कर सकते है |

कालसर्प योग का निवारणके अन्य उपाय
शक्कर के बने पताशे जन्मकुंडली में बारहवें मंगल का रूप माने जाते हैं। जब भी किसी की कुंडली में राहु बहुत ज्यादा बुरा असर दिखाने लगे तो बतासे के प्रयोग से उसके सभी बुरे प्रभाव दूर हो जाते हैं।
(2) जिनकी कुंडली में कालसर्पयोग हो उन्हें अपने घर के नैऋत्य कोण (दिशा) में बम्बू (बांस) का पेड़ लगाना चाहिए। साथ ही रोजाना उसका पानी बदलते रहना चाहिए। इससे कालसर्पयोग से होने वाले सभी बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं।
कालसर्प दोष वालों को मोर पंख को अपने दाहिने हाथ में सफेद कपड़े में बांधना चाहिए। इससे जीवन भर के लिए कालसर्प दोष का असर खत्म हो जाता है।
(4)कोयला पानी में वहां
(5) अक्सर रहने के घरों में कई बार कीमती चीजें, जेवर, रूपया आदि छिपाने के लिए सीक्रेट जगह बना दी जाती है। यदि ऎसी जगह खाली रहे तो उस घर में कभी भी पैसा नहीं आ पाता वरन उस घर में हमेशा कर्जा ही चलता रहेगा। ऎसी सीक्रेट जगहों के बुरे असर से बचने के लिए वहां पर बादम, छुआरे या कोई दूसरी मीठी चीज रख देनी चाहिए जिससे घर में पैसा आना शुरू हो जाए।
आजकल मकान बनाते समय घर में कहीं भी खाली जगह (मिट्टी वाली जगह) नहीं छोड़ी जाती वरन पूरे फर्श को ही पक्का करवा लिया जाता है। ऎसे में उस घर में शुक्र का खात्मा हो जाता है जिसके कारण वहां सुख, सौन्दर्य, शांति और भोग-विलास के साधन खत्म हो जाते हैं। इससे बचने के लिए या तो घर में कुछ जगह खाली छोड़ देनी चाहिए। अथवा घर में मनीप्लांट तथा अन्य पौधे मिट्टी के गमलों में स्थापित कर लेने चाहिए।
(7) यदि किसी की लाल किताब के अनुसार बनाई कुंडली में शुक्र दसवें घर में बैठा हो तथा वह अत्यंत बीमार चल रहा हो तो परिजनों को उसके निमित्त कपिला गाय दान देनी चाहिए। गाय के दान करने से से लाभ हैगा जातक को चाहिए वो खाना रसोईघर में ही खाये व खाना बैठकर खाये
घर में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें
जातक काले व नीले कपड़े न धारण करें
जातक अपने ससुराल पक्ष से मधुर सम्बन्ध बना कर रखे
जातक अपने निवास स्थल में ठोस चांदी से बना हाथी रखें
जातक को किसी लाल किताब के महाज्ञाता से मिलकर उनके राय के अनुसार मंगल या गुरु कर उपाय करें
राहु की पूजा करें
गंगा जल भरकर घर में रखे |
गले में चांदी का चौकोर ठोस टुकड़ा धारण करें
- केसर का तिलक प्रतिदिन मस्तक पर लगाएं।
- रात को सोते समय गीले कपड़े में वाघ कर 'जौ सिरहाने रखें और सुबह होते ही पक्षियों को खाने के लिए डाल दें।
- 108 दिनों तक नित्य पांच पाठ के हिसाब से हनुमान चालीसा का पाठ करें।
- चांदी की डिब्बी में शहद भरकर घर में रखें।

- शिवलिंग पर तांबे का सर्प प्राण-प्रतिष्ठा करके, विधि-विधान पूर्वक चढ़ाएं।
- 'ऊँ नम: शिवायÓ का मानसिक जाप हर समय करते रहें।
- घर तथा कार्यलय में मोर पंख स्थापित करे
- चंदन की लकड़ी के छोटे चौकोर टुकड़े पर चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा बनवाकर जड़वा लें और वह ताबीज गले में धारण करें मित्रों के कुछ उपाय मैंने आपको बताए हैं फिर भी आप किसी अच्छे जानकार को अपनी कुंडली दिखाकर उपाय करें या आप हम से भी संपर्क कर सकते हैं या अपने बच्चों की जन्मकुण्डली बनवाने या जन्मकुण्डली विश्लेषण करवाने लिए कॉल करें 9414481324/
7597718725 परामर्श लेने के लिए अभी कॉल करें - Appointment के लिए हमारे नंबर पर कॉल करें - परामर्श में आपको समाधान दिया जायेगा जोकि निःशुल्क नहीं है अतः आपको परामर्श शुल्क देना होगा जिसे आप PayTm, Bank Account से या GooglePay कर सकते है।मित्रों हमारा रत्नों का होलसेल का कारोबार है अगर आप अच्छी क्वालिटी के रत्न जेमस्टोन लेना चाहते हो तो भी संपर्क कर सकते हैं हमारे पास आपको बाजार से बहुत कम रेट पर अच्छी क्वालिटी के रत्न मिल जाएंगे


गुरुवार, 30 जनवरी 2020

,, कालसर्प योग है या दोष है क्या है सच क्या है झूठ ( 3)

https://youtu.be/rLabGPgeiFU
मित्रों यह यह पोस्ट कालसर्प पर ही है इससे पहले मैं दो पोस्ट कालसर्प पर लिख चुका हूं आप पढ़ सकते हो उसको पढ़ने से ही आपको आगे की पोस्ट समझ में आएगी मित्रों जैसा कि मैंने अपनी पहली पोस्ट में आपको बताया था कि राहुल जिस ग्रह के साथ बैठता है उसको खराब कर देता है आज हम उसी पर चर्चा करेंगे सबसे पहले हम बात करेंगे कालसर्प की पहचान कैसे करेंकालसर्प दोष की पहिचान
काल सर्प दोष की पहिचान के लिये कुन्डली के भावों में राहु केतु की स्थिति को देखनी पडती है,लगन को पहला भाव कहते है और पहले भाव से बारहवें भाव तक राहु केतु की स्थिति के अनुसार ही काल सर्प दोष का वर्गीकरण किया जा सकता है,राहु केतु के एक तरफ़ ग्रहों का स्थित हो जाना अथवा दूसरी तरफ़ एक या अधिक ग्रहों का बक्री हो जाना,अस्त रहना कालसर्प दोष का निर्माण करता है,कालसर्प का मतलब होता है कि राहु या केतु पर किसी खराब ग्रह की नजर,युति या साथ,खराब ग्रह का मतलब है,कि शनि,मंगल या छठे,आठवें,या बारहवें भाव के स्वामी का साथ भी राहु केतु को खराब कर सकता है,राहु का मतलब पितरों से माना जाता है जो कि पिता के खानदान से सम्बन्धित होते है,और केतु का मतलब माता खान्दान से होता है,जैसे नाना या पडनाना आदि,इन ग्रहों पर किसी खराब ग्रह की युति या सम्बन्ध उसी प्रकार की प्रकृति पैदा करता है,जो कि उनके अन्दर होती है,जैसे लगन में राहु है,और शनि ने राहु को अपना साथी बनाया हुआ है,राहु का मतलब शिक्षा से भी होता है,तो जातक के अन्दर शनि वाली चालाकी फ़रेबी और नीच प्रकृति की भावनाओं का उदय होगा,जातक नेकी के रास्ते पर चल ही नही पायेगा,शनि ठंडा ग्रह भी है,जातक के अन्दर आलस भरा रहेगा,और जब आलस का भाव दिमाग में रहेगा तो जातक चाह कर भी कार्य समय पर नही कर पायेगा,और जीवन यापन के लिये परेशान होता रहेगा,दिमाग भारी रहेगा,जातक को समय पर बात करने और विद्या क प्रयोग करने का समय ही नही मिलेगा,या तो वह समय पर आलस और अन्य कारणों से निश्चित जगह पर पहुंच नही पायेगा,अगर किसी प्रकार से पहुंच भी गया तो वह चालाकी का भाव पैदा करेगा,और वक्त पर पकडा जायेगा,बाद में सिवाय दुखों के और कुछ मिलता नही है,शनि रात का राजा है जहां पर सूर्य की सीमा खत्म होती है शनि की चालू हो जाती है,जातक को निशाचरी काम अच्छे लगेगे,वह दिन में तो अपनी कार्य सीमा को न के बराबर रखेगा और रात में वह चोरी डकैती वाले काम करेगा.इसी प्रकार से अन्य भावों के राहु का और केतु का प्रभाव देखा जा सकता है.
कालसर्प दोषों के प्रकार
कालसर्प दोष बारह प्रकार के होते हैं:-
१.अनन्त कालसर्प दोष,यह पहले भाव में राहु और सातवेम भाव में केतु के रहने तथा अन्य ग्रहों का पहले भाव से सातवें भाव के बीच में रहने पर माना जाता है.
२.कुलिक कालसर्प दोष,यह कुलिक यानी कुल (कुटुम्ब) दूसरे भाव में राहु और आठवें भाव में केतु के रहने पर अलावा ग्रहों के दूसरे भाव से आठवें के मध्य में रहने प माना जाता है.
३.वासुकि कालसर्प दोष,यह कालसर्प दोष तीसरे भाव में राहु और नवें भाव में केतु के रहने तथा अन्य ग्रहों के तीसरे से नवें के मध्य रहने पर माना जाता है.
४.शंखपाल कालसर्प दोष,राहु चौथे भाव में और केतु दसवें भाव मे हो तथा सभी ग्रह एक तरफ़ हों.
५.पद्यम काल सर्प योग,राहु पांचवे और केतु ग्यारहवें भाव में हो तथा अन्य सभी ग्रह एक तरफ़ हों.
६.महापद्यम काल सर्प योग,राहु छठे और केतु बारहवें भाव में तथा अन्य ग्रह एक तरफ़ हों.
७.तक्षक कालसर्प योग,राहु सातवें और केतु पहले भाव में
८.करकट कालसर्प योग,राहु आठवें और केतु दूसरे भाव में तथा अन्य ग्रह एक तरफ़ हों.
९.शंखचूड कालसर्प योग,राहु नवें और केतु तीअरे भाव में तथा अन्य ग्रह एक तरफ़ हों.
१०.घातक कालसर्प योग,राहु दसवें और केतु चौथे भाव में तथा अन्य ग्रह एक तरफ़ हों.
११.विषधर कालसर्प योग,राहु ग्यारवें और केतु पांचवें भाव में विद्यमान हो और अन्य ग्रह एक तरफ़ हों.
१२.शेषनाग कालसर्प योग,राहु बारहवें और केतु छठे भाव में विद्यमान हो तथा अन्य सभी ग्रह एक तरफ़ हों.
कालसर्प योगों का प्रभाव
कालसर्प योगों का प्रभाव जीवन में सुख से भरा भी होता है,और दुख से भरा भी होता है,जन्म राशि के प्रभाव से राहु और केतु तत्वों के अनुसार अपना प्रभाव देते हैं,कुन्डली में मेष,सिंह और धनु राशियां अग्नि तत्व की मानी जाती है,राहु सकारात्मक छाया ग्रह है और केतु नकारात्मक छाया ग्रह.एक तत्व में बढोत्तरी करता है और दूसरा घटाता है,लेकिन प्रभाव दोनो का ही खतरनाक माना जाता है,राहु अक्स्मात अग्नि तत्वॊ वाली राशियों में किये जाने वाले संकल्पों में,द्रढ इच्छा में,कर्मशीलता में,गतिशीलता में बढोत्तरी करता है,और केतु घटा देता है,पृथ्वी तत्वों वाली राशियों में जिनमें वृष,कन्या और मकर है,जातक की मेहनत करने मे,धैर्य में,और आत्म संतोष में सांसारिक वस्तुओं में,समस्याओं के प्रति उदासीनता मे,राहु वृद्धि करता है और केतु घटा देता है.वायु तत्व वाली राशियां जिनमें मिथुन तुला और कुम्भ राशियां आती है,में कल्पनाशीलता में,बुद्धिमानी में,अनुशासन प्रियता में राहु बढोत्तरी करता है,और केतु घटा देता है.जल तत्व वाली राशियों के अन्तर्गत जिनमें कर्क,वृश्चिक और मीन राशियां आती है,में राहु सन्देह,मित्र प्रेम,बातूनी और स्वाभिमानी स्वभाव में बढोत्तरी करता है और केतु घटा देता है.इसके अलावा राशियों के द्वारा भी राहु और केतु अपना प्रभाव देते है,ग्रहों के द्वारा दिये जाने वाले प्रभाव का जो असर मिलता है वह इस प्रकार से है:-
१.सूर्य राहु-दादा के बारे में प्रसिद्धि बखान करता है,जातक को पराविज्ञानी बनाता है,आंखों की रोशनी को चकाचौंध से खराब करता है,अनैतिक स्त्री या पुरुष सम्बन्ध से पुत्र या संतान पैदा करके छोड देता है,पिता की मौत राहु वाले कारणों से करता है,जातक से कानून विरुद्ध कार्य करवाता है,अपने जन्म के समय अपने पिता को और अपने पुत्र के समय पुत्र को कष्ट मिलने की सूचना देता है,संतान काफ़ी मुश्किलों से मिलती है,इसका कारण जातक को वीर्य (सूर्य) इकट्ठा करने में परेशानी होती है,वह अचानक कुत्सित विचार (राहु) दिमाग में आते ही राहु मंगल (जवान सजे धजे पुरुषॊ की तस्वीरें और फ़िल्म) को देख कर कृत्रिम तरीके से वीर्य को स्खलित कर देता है,या राहु शुक्र माया नगरी वाली मायावी स्त्रियों की तस्वीरें और फ़िल्म देख कर वीर्य को कृत्रिम साधनो से स्खलित कर देता है.यह सूर्य में अपना गलत भाव या पारिवारिक मर्यादाओं के अन्दर कृत्रिमता लाने से सूर्य पिता के अन्दर अपना प्रभाव देकर उसे अक्समात कुछ भी करने के लिये स्वतंत्र करता है.
२.सूर्य केतु:-सूर्य पिता और केतु पुत्र दोनो ही धार्मिक होते है,और अधिक धार्मिकता के कारण कर्म से दोनो की च्युति हो जाती है,धर्म के कारण किसी भी कार्य को करने में कठिनाई केवल इसलिये होती है,कि वे कर्म और धर्म का संयोग नही बिठा पाते है,कर्म के अन्दर अपना प्रभाव दिखाने वाली चालाकी आदि से उनको नफ़रत होती है.पिता के पास नकारात्मक जमीन भी होती है,जो किसी काम की नही होती है.३.चन्द्र राहु:-माता को जातक के जन्म के पूर्व कष्ट रहा है,की सूचना देता है,यहां पर राहु माता की सास के बारे में सूचना देता है,जो विधवा भी रही हो,माता के दिमाग में बेकार का अन्धेरा भी देता है,जिसे आज की भाषा में टेंसन कहते है,चन्द्र की हैसियत मस्तिष्क भी है अत: जातक का दिमाग भी चिन्ताओं से ग्रसित होता है,चन्द्र जनता है तो राहु जनता के अन्दर एक अन्जाना डर भी देता है,जिस डर के कारण जनता उसे चुनाव आदि में लगातार जीत या शासन देने के लिये बाध्य हो जाती है,चन्द्र राहु मिलकर विधवा माता के द्वारा पालित जिन्दगी को भी सूचित करते है,जातक का झूठा होने का संकेत भी दोनो ग्रह देते है,जातक बुद्धि को भ्रमित करने में माहिर भी माना जाता है,जन्म स्थान के पास दक्षिण पश्चिम में कुआ होने का संकेत भी मिलता है,माता या सास का लालच भी यह दोनो ग्रह बखान करते है,दादा के द्वारा दूर से आकर मकान बनाकर निवास करने का योग भी दोनो ग्रह बताते हैं,जातक को मानसिक परेशानी का ब्यौरा भी यह दोनो ग्रह देते है,अगर किसी प्रकार से मंगल का योग दोनो में मिल जाता है,जो जातक केमिस्ट्री में अपना अच्छा वर्चस्व बना लेता है.
४.चन्द्र केतु:-चन्द्र केतु दोनो मिलकर माता को धार्मिक बना देते है,अगर सभी ग्रह कुन्डली के दाहिनी तरफ़ होते है तो जातक की माता अपना सर्वस्व दूसरों को अर्पित कर देती है,जन्म स्थान के पास झन्डा लगा होता है,मीनार होती है,या जन्म स्थान के पास नहर तालाब या नदी होती है,धर्म मन्दिर या देवी मन्दिर की भी सूचना दोनो ग्रह मिलकर देते है,चन्द्र मस्तिष्क है तो केतु स्नायु मंडल,जातक को स्नायु वाली बीमारी भी होती है,जातक का मन अधिकतर सन्यास की तरफ़ लगा रहता है.
५.मंगल राहु:-मंगल इन्जीनियर है तो राहु मशीन,मंगल मशीन है तो राहु बिजली,मंगल भाई है तो राहु उसकी शिक्षिका पत्नी,राहु से हीरोइन पत्नी भी मानी जाती है,राहु से नाचने वाली पत्नी भी मानी जाती है,राहु से विधवा के साथ भाई की शादी भी मानी जाती है,राहु से भाई का शमशान वास भी माना जाता है राहु से अघोर पंथ की तरफ़ भाई का पलायन भी माना जाता है,मंगल धर्म स्थान है तो राहु धर्म स्थान के पास होने पाठ,मंगल मशीन है तो राहु गोल पहिया,मंगल बिजली है,तो राहु पहिया यानी बिजली से घूमने वाला पहिया,पंखा भी मान सकते है और बिजली वाली मोटर भी मान सकते है,मंगल भाई है तो राहु सिनेमा,भाई का काम सिनेमा में हो,राहु वाहन से भी सम्बन्ध रखता है,मगल वाहन का इन्जीनियर भी बनाता है,मंगल सैनिक है तो राहु आसमान का राजा,यानी स्पेस टेक्नोलोजी में अग्रणी भी बनाता मगर शर्त से गुरु भी साथ होना चाहिये.मंग्तल पराक्रम है तो राहु गाली,जातक बिना सोचे कुछ भी कह देता है,मंगल लोहे का गर्म पाइप है तो राहु बारूद,मंगल भवन है तो राहु सीमेंट,शुक्र साथ है तो भवन निर्माण में सीमेंट का प्रयोग,राहु पितामह यानी दादा है तो मंगल दुश्मन,यानी दादा के दुश्मन रहे हों,मंगल व्यक्ति है तो राहु आदेश,हिटलर की कुन्डली में भी यह दोनो अपना कालसर्प योग बना रहे थे.मंगल रक्त है तो राहु उच्च रक्त चाप की बीमारी,बुध साथ है तो प्लास्टिक के वाल चन्द्र ह्रदय में डाले जाते है.
६.मंगल केतु:-मंगल रक्त है केतु निम्नता यानी लो-ब्लड प्रेशर की बीमारी,स्त्री कुन्डली में मंगल पति है तो केतु साधु यानी मंगल पति केतु लंगोटी को धारण किये रहता है,केतु जटाओं को रखाये रहता है,लेकिन सूर्य का साथ होने पर मूंछों वाला जातक भी मानते है,खाना पकाने के स्थान पर ढाबे के नौकर भी माने जाते है,बिजली का काम करने वाले नौकर भी माने जाते है,गुरु साथ होने पर या युति होने पर बिजली विभाग में अधिशाषी अभियन्ता के पद पर भी आसीन करवा देता है,मंगल लडाई है तो केतु सैनिक,मंगल थाना है तो केतु सिपाही,मंगल भोजन है तो केतु चम्मच,मंगल गुस्सा है तो केतु थप्पड,दोनो मिलकर कुन्डली में महान मंगली दोष भी बना देते है,और पति या पत्नी की औकात को गर्म लोहे की छडी बना देते है,भाई को या पति को स्नायु रोग की बीमारी भी दोनो ग्रह बताते है,मंगल जमीन है तो शुक्र के साथ होने पर खेती करने वाला किसान भी बना देते है,चन्द्र के साथ मिलने पर शादी के योग में साठ प्रतिशत तक कमी आजाती है,शादी के बाद चन्द्र माता गुस्सा करती है,शुक्र पत्नी को भुगतना पडता है,मंगल और शुक्र के बीच में चन्द्रमा होने पर माता प्यार प्रेम में दखल देती है.गृहस्थ जीवन में कथिनाई होती है.
७.बुध राहु:-बुध भूमि है तो राहु मुस्लिम और केतु क्रिस्चियन,शनि साथ है तो जन्म कब्रिस्तान के पास हुआ है,निवास है,बुध व्यापार है तो राहु फ़िल्म लाइन,फोटोग्राफ़ी का कार्य भी बताता है,बुध रीति रिवाज को नही मानता है,अगर राहु साथ हो,जातक अनर्जातीय शादी भी करता है,बुध बहिन है तो राहु विधवा या बदचलन का हाल भी बताता है,्मंगल का साथ है तो कम्प्यूटर पर पोर्न साइट भी बनाता है,पोर्न पिक्चर का निर्माण भी करता है,शुक्र साथ है तो पिक्चरों के द्वारा ब्लैक मेल भी करता है,मुस्लिम या क्रिस्चियन से शादी और प्रेम प्यार भी बताता है,बुध वाणी है तो राहु बकवास,यानी जातक बकवासी भी होगा.बुध त्वचा है तो राहु खुजली,बुध व्यापार है तो राहु आतंकवादी.सीमेंट,बिजली,दवाई,पिक्चर,मीडिया,कमन्यूकेशन,पेट्रोल,डीजल,का व्यापार भी करवाता है.
८.बुध केतु:-बुध वाणी है तो केतु साधन,बोलने का साधन यानी रेडियो,प्रवचन करने वाला,बुध हरा है तो केतु झण्डा,यानी मुस्लिम राष्ट्र का ध्वज,केतु लम्बा और बुध हरा,नारियल या खजूर का पेड भी है,बुध बहिन बुआ बेटी है तो केतु भान्जा,नाती,या फ़ुफ़ेरा भाई भी है,बुध बहिन है तो केतु नाना भा है बहिन का पालन पोषण नाना के द्वारा भी है,चौथे भाव में राहु शुक्र चन्द्र और दसवे भाव में बुध केतु है तो पिता के नाना की जमीन पर अधिकार भी है,जन्म स्थान कच्चे घर मे है और जन्म के दस साल तक जन्म स्थान के घर का सत्यानाश भी है.
९.गुरु राहु:-गुरु जीवन है तो राहु खतरा,जीवन में बलारिष्ट योग भी मिलता है,जब राहु गोचर से गुरु के ऊपर सन्क्रमण करे,तो गोचर के पूरे समय तक जीवन को खतरा बना रहे,और जब गुरु राहु के ऊपर गोचर करे तो जातक दर दर का होकर भटकता रहे,शम्शानो की धूल छानता रहे,भाइयों को और अपने से छोटों को हमेशा प्रवचन ही दिया करे,गुरु हवा है राहु गन्दगी,जातक का निवास गंदी जगह पर हो जहां पर वह गंदगी की बदबू सूंघता रहे,जातक के साथ एक काना या काला आदमी निवास करे,अथवा जातक के पास में निसन्तान व्यक्ति रहता हो,जातक का दरवाजा पूर्व में हो,दरवाजे के नीचे से या मकान के पीछे से नाली या खिडकी लगी हो,मंगल साथ होने पर मकान पर धर्म का झण्डा लगा हो,एक साधू स्वभाव का व्यक्ति साथ रहता हो,घर में प्रवचन कथा वाचन होता रहे,पितामह महान आदमी रहे हों,राहु वाहन और गुरु जीव,जातक हमेशा यात्रा में बना रहे,गुरु हवा और राहु वाहन,जातक के जीवन में हवाई यात्रायें अधिक होती रहें,सूर्य साथ हो तो जातक ऊर्जा मंत्री की पोस्ट पर हो,राहु ऊर्जा और गुरु हवा,सूर्य से गर्मी लेकर जातक सौर ऊर्जा का जानकार हो.
१०.गुरु केतु:-गुरु केतु साथ में मिलकर नकारात्मक भाव जातक में भर देते है,जातक हमेशा नीचा सोच कर ही कार्य करता है,और नीचा सोच कर कार्य करने पर उसे सफ़लता जरूर मिल जाती है,पंडित जवाहर लाल नेहरू की कुन्डली में गुरु केतु छठे भाव में थे,गुरु महात्मा गांधी और केतु खुद,दोनो ने मिलकर अहिंसात्मक तरीके से भारत को आजाद करवा लिया था,लेकिन दोनो का छठे भाव में पुत्री के घर में निवास करने से पुत्री को राजयोग देकर श्रीमती इन्दिरा गांधी को भारत वर्ष का राज भी दिया,फ़िर नाती यानी बुध केतु के साथ मिलकर लडकी के लडकों को भी राजयोग दिया,बारहवां राहु गुरु केतु के लिये खतरनाक बन गया और बुध यानी श्रीमती इन्दिरा गान्धी,केतु यानी उनके दोनो पुत्रों को हवाई राहु यानी विमान हादसे से तथा बारूदी विस्फ़ोट से दोनो नातियों का खात्मा भी कर दिया,श्रीमती इन्दिरा गान्धी को उनके ही मन्गल यानी जो रक्षा करने वाले लोग थे,उन्ही के द्वारा मन्गल यानी बन्दूक और राहु यानी बारूदी गोली से उनकी भी मौत हुई.गुरु केतु मोक्ष की तरफ़ लेकर चला जाता है,मोक्ष का मतलब होता है कि आगे कोई नाम लेने वाला रहे,यही हाल उनके साथ भी हुआ,आगे की संतान पुत्री के रूप में हुई और कोई पुरुष संतान नही होने से उनका भारत वर्ष में कोई आगे पोता पडपोता नही है,लडकी की संतान को भारत में नाम की मान्यता के लिये नही माना जाता है.
११.शुक्र राहु:-शुक्र माया है तो राहु चकाचौन्ध,जातक माया की चकाचौन्ध में खोया रहता है,राहु काल है तो शुक्र पत्नी पत्नी के प्रति हमेशा भय बना रहता है,राहु की गति उल्टी होती है,और वह अपने प्रभाव के कारण पत्नी के अन्दर भय पैदा करता है,पद्यम नामक कालसर्प योग में जब शुक्र कर्क राशि का हो तो यह निश्चित सा होता है,क्योंकि उस समय राहु सूर्य के घर में होता है,और जातक के अन्दर राहु का पूरा का असर व्याप्त होता है,इस कारण चलते अगर किसी तरह से जातक को अपनी पत्नी की बीमारी या खराब सेहत का पता चले तो उसे दुर्गा पाठ बेहतर फ़ायदा देता है. मित्रों अगली पोस्ट में हम कुछ उपायों पर चर्चा करेंगे आप जरुर पढ़े

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कालसर्प योग है या दोष है क्या है सच क्या है झूठ? (२)

https://youtu.be/9WaPJ7ofLsg
मित्रों मेरी पिछली पोस्ट भी इस विषय पर हैं यानि काल सर्प पर यह जरूर पढ़ें कालसर्प दोष को लेकर लोगों में काफी भय और आशंका-कुशंकाएं रहती हैं, लेकिन कुछ आसान और अचूक उपायों से इसके असर को कम किया जा सकता है। कोई इसे कालसर्प दोष कहता है तो कोई योग। कोई इसे मानता है और कोई नहीं, मित्रों अगर आपको किसी एस्ट्रोलॉजर में कालसर्प बताया है कि आपकी कुंडली में कालसर्प योग है तो पहले आप उसकी अच्छी तरह जांच कर ले क्या कालसर्प योग बनता है कि नहीं बनता और वह जो आपको अशुभ फल दे रहा है या अशुभ फल दे रहा है समय आपको कोई परेशानी आ रही है तो किसी वजह से आ रही है किसी अन्य ग्रह की वजह से यह सब देखना जरूरी होता है मित्रो
किसी भी प्रकार के कालसर्प दोष की समाप्ति के लिये ज्योतिष में भगवान शिव की आराधना को मुख्य बताया गया है। समुद्र मन्थन के समय में समुद्र से निकले चौदह रत्नों में हलाहल विष को जगत में स्थापित करने के लिये जगह नही थी,उस विष की गर्मी से सम्पूर्ण जगत जब जलने लगा तो भगवान शिव को बुलाना पडा,उन्होने उस विष जो अपने गले में स्थापित किया और नीलकंठ कहलाये। उसी समय जब समुद्र से अमृत निकला तो उसे लेकर देवताओं और दैत्यों में युद्ध शुरु हो गया,आखिर में भगवान विष्णु को मोहिनी का रूप धारण करना पडा और देवताओं को उनका प्रिय अमृत तथा दैत्यों को उनकी प्रिय सुरा का पान करवाया गया,लेकिन असुरों की सेना से एक दैत्य निकला और देवताओं की सेना में जाकर शामिल हो गया,धोखे से उस दैत्य ने अमृत का पान कर लिया,सूर्य और चन्द्र की निगाह उस दैत्य पर पड गयी,उन्होने भगवान विष्णु को इशारे से बता दिया,उनके सुदर्शन चक्र ने उस दैत्य का सिर धड से अलग कर दिया,लेकिन अमृत शरीर में चला गया था इसलिये वह सिर और धड दोनो ही हमेशा के लिये अमर हो गये,सिर का नाम राहु और धड का नाम केतु रखा गया। यह कथा केवल ज्योतिष और पुराणों की शिक्षा को कंठस्थ रखने के लिये बनाई गयी। इसका विश्लेषण इस प्रकार से है। इस संसार रूपी समुद्र में जब जातक जन्म लेता है तो उसे अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्राप्त साधनो और विद्या के द्वारा संसार का मन्थन शुरु करता है। उस मन्थन में कभी तो शरीर को हमेशा पूर्ण रखने वाले साधन प्रकट हो जाते है,कभी बहुत ही दुख दायी विष रूपी कष्ट पैदा हो जाते है। कभी लक्ष्मी रूपी धन की आवक हो जाती है,कभी ऐरावत रूपी वाहन आदि की प्राप्ति हो जाती है। कभी कभी ऐसी रोजी रोजगार की उपलब्धि हो जाती है जो कामधेनु रूपी गाय बनकर जीवन को सुरक्षित चलाने के लिये अपना सहयोग करती है। इसी बीच मे सात्विक विचार जो देवताओं के रूप में होते है,और गलत विचार जो दैत्यों के रूप में होते है,अपनी अपनी शक्ति से मिलने वाले साधन रूपी मथानी और विद्या रूपी शेषनाग की रस्सी से संसार रूपी समुद्र का मंथन करते है। शिव रूपी गरल जब पैदा होता है जो क्रोध के रूप में माना जाता है,अगर उस क्रोध रूपी वचनों को संसार रूपी सागर में छोड दिया जाये तो वह पूरे जग को जलाने में अपना कार्य करेगा,जैसे कोई बहुत ही खतरनाक अस्त्र बना लिया और उसे अगर सुरक्षित स्थान में नही रखा गया तो वह किसी भी समय दुरात्मा के द्वारा संसार को ठिकाने लगाने से बाज नही आयेगा,उस समय उस शस्त्र को किसी सुरक्षित और शांत प्रिय स्थान में स्थापित किया जाता है। इसके साथ ही जब बहुमूल्य अमृत निकलता है तो कोई भी दुरात्मा अपने को बुरे विचारों से पूर्ण रखने के बाद भी स्थापित रखना चाहता है तो उसे ही आत्मा रूपी विष्णु के द्वारा ज्ञान रूपी सुदर्शन चक्र से काटना पडता है,यह कारण मानसिक सोच रूपी चन्द्रमा और द्रश्य कारणों के रूपी सूर्य से इंगित किया जाता है,लेकिन जो बुरा कारण अगर किसी प्रकार से भले भलाई वाले शस्त्र से विभूषित हो गया तो वह उस शस्त्र को अपने शरीर में भलाई रूपी रूपी जामा पहिन कर बुरे आचरण करने लगेगा और इस कारण से जो अच्छे विचारों से सुसज्जित लोग है वे उस बुरे विचारों वाले व्यक्ति के कारण बदनाम होने लगेंगे। यही बात राहु और केतु के रूप में मानी जाती है। राहु और केतु को छाया ग्रह के रूप में भी मानने के कारण है,जब कोई व्यक्ति अपने ही विचारों में खो जाये और उसे अपने आसपास के बारे में पता नही चले तो वह जीवन की गति में कुछ से कुछ करने लगता है। उसका शरीर अपने ही विचारों में खोये रहने के कारण जो भी उसके पास साधन होते है उनके अन्दर विद्या रूपी शक्ति को संचार देने से रुक जाता है,शरीर की मानसिक गति जब बिगड जाती है तो शरीर के अन्दर की ऊर्जा का स्थान केन्द्रित नही हो पाता है,पाचन क्रिया से लेकर सोने जागने तथा रोजाना के काम करने की गति भी बिगड जाती है। इस बिगाड से शरीर की ऊर्जा रूपी शक्ति समाप्त होती जाती है और शरीर धीरे धीरे कमजोर होता हुआ बरबाद होने लगता है। अक्सर देखा होगा कि जब व्यक्ति तन्द्रा में नही होता है तो उसे पानी के छींटे दिये जाते है यह एक प्राथमिक उपचार होता है। इसके बाद भीड भाड और समुदाय के अन्दर उस व्यक्ति को स्थापित किया जाता है जिससे उसके अन्दर चलने वाले विचार धीरे धीरे समाप्त होने लगते है और वह अपने द्वारा किये जाने वाले वास्तविक कामो की तरफ़ अग्रसर होने लगता है। हमारे देश में तीर्थ स्थानों का महत्व तभी पूर्ण माना जाता है जब वहां पर स्नान करने के साधन हों,उन साधनों के अन्दर किसी न किसी प्रकार की प्रभाव वाली शक्ति का साक्षात करना हो,जैसे गंगा स्नान समुद्र स्नान और किसी जल विशेष की छींटे देना आदि। इन कारणों से लगातार चलने वाले दिमागी सोच मे परिवर्तन सोच मे परिवर्तन देना और उस परिवर्तन के बाद स्थिति में सुधार लाना आदि बाते मानी जाती है। सम्बन्धित देवता के प्रसाद के रूप में भी मीठा प्रसाद ही अधिकतर मामले में काम में लाया जाता है,साथ ही प्रसाद के रूप में खील और बतासे तथा शक्कर दाने प्रयोग में लाये जाते है,जो लार विचारों के समय में खारी हो गयी होती है उस लार को स्नान ध्यान या पूजा के बाद जब मानसिक स्थिरता को सुधारा जाता है तो उस प्रसाद को लेने के बाद मीठा स्वाद खारे पन में अन्तर लाता है। स्थान बदलना भी एक प्रकार से सुखद माना जाता है। तत्वों की पूर्ति भी शरीर मे बल देने वाली होती है जैसे रत्न धारण करना भोजन करना या करवाना मन्त्र ध्वनि से शरीर की गति में परिवर्तन करना यन्त्र में ध्यान लगाने से दिमागी दबाब को कम करना आदि। कालसर्प योग का एक बेहतर और सर्व सुलभ उपाय है कि रोजाना सुबह को जागकर ऊँ नम: शिवाये का इकत्तीस बार दक्षिण की तरफ़ फ़ेस करके जाप करना और दोपहर को शिवलिंग पर एक धार में जल चढाते हुये यही मन्त्र जपना,सोने से पहले इसी प्रकार की क्रिया करना।जो लोग शिवजी से अपनी आध्यात्मिक शक्ति से जुडे है उन्हे यह पता है कि उनके शिवलिंग के साथ या उनकी छवि के साथ सर्प को दर्शाया गया है। शिव लिंग को तो सर्प के फ़न से ढका बताया गया है और जललहरी से उस सर्प के प्रवेश को दिखाकर बाकी का पूंछ वाला हिस्सा जललहरी के पास दर्शाया गया है। शिव जो संहार के कारक है और शिवलिंग की जललहरी को सम्भालने का कार्य माता पार्वती के रूप मे दिखाया गया है। यह दोनो ही रूप में शिव और शक्ति को दर्शाया गया है। राहु जो सांप के फ़न से और पूंछ केतु के रूप मे मानी जाती है। केतु रक्षा करने वाला होता है और राहु समाप्त करने वाला होता है। दोनो ही छाया ग्रह है,भगवान शिव के अलावा भी भगवान विष्णु की तस्वीर को देखा जाये तो क्षीर सागर में शेषनाग के ऊपर भगवान विष्णु की शैया है और राहु के रूप मे शेषनाग के फ़न की छाया उनके ऊपर है। राहु को आकाश और केतु को पाताल का कारक भी कहा गया है,आदि काल से राहु के लिये आसमानी सहायता और केतु से जमीनी सहायता का रूप मान्यता मे है जब आसमानी बारिस नही होती है तो जमीनी पानी से जीने के लिये पौधो और फ़सलो की रक्षा करना भी पाया जाता है। देवताओं और असुरों की सहायता से सागर के मंथन की कथा भी सभी ने सुनी होगी उस मंथन से निकलने वाला हलाहल भी था और अमृत भी था। हलाहल को भगवान शिव ने पान किया था अमृत को पान करने के लिये देवताओं को छद्म वेष मे भगवान विष्णु ने अपने अनुभव को आधार बनाया था,लेकिन उस जगत व्यापी अन्तर्यामी भगवान विष्णु ने सूर्य और चन्द्र के अन्दर यह भावना पैदा कर दी थी कि एक असुर भी अमृत पान को कर गया है। सुदर्शन चक्र से उस असुर के दो हिस्से कर दिये गये,सिर का हिस्सा राहु नाम से और धड वाला हिस्सा केतु के नाम से जाना गया। ईश्वर की प्रत्येक लीला मे राहु केतु का खात्मा करने की कथा का वृतान्त है। वह राम रावण युद्ध में रावण जिसके बीस सिर और दस भुजा का वर्णन दिया है। भगवान श्रीकृष्ण की कथा मे कालियादह में कालिया नाग के फ़न को नाथ कर अपने पौरुष का वर्णन और अपने को श्यामल रंग में रंगने की कथा है। चण्ड मुण्ड विनाश मे भी काली जो केतु के रूप मे मानी जाती है का वृतान्त दुर्गासप्तशती जो मार्कण्डेय पुराण यानी देवी भागवत में भी कही गयी है। आदि बातो से पता चलता है कि व्यक्ति का आजीवन इन्ही ग्रहों की चाल से जुडा होना माना जाता है।
जो लोग पौराणिक बातो को या चलने वाली मर्यादा को खतम करने की कोशिश तीसरे राहु से करते है उनके लिये यह भी माना जाता है कि वही तीसरा राहु जब उल्टी गति से दूसरे भाव मे आता है तो कुटुम्ब नाश के साथ धन नाश और बुद्धि नाश के लिये भी अपना प्रभाव देता है। अक्सर इस राशि वालो को जब राहु तीसरे से दूसरे भाव मे प्रवेश करता है तो जहर खाकर या किसी पारिवारिक क्लेश के कारण अपनी आत्महत्या तक करते हुये देखा गया है।
कालसर्प दोष की मान्यता दक्षिण के मन्दिरों देखी जाती है,नासिक में भी कालसर्प दोष का निवारण किया जाता है.
रामेश्वरम मे नागनादिर मन्दिर और रामकुण्ड के पास मे बनी शेषनाग की वाटिका कालसर्प योग की निवृत्ति से ही जोडे गये है,जहां राहु को समुद्र और केतु को शिव लिंग के रूप मे मान्यता दी गयी है.
सुचिन्द्रम मे हनुमानजी के घुटने मे मक्खन लगा कर कालसर्प दोष की पूजा की जाती है.
इसी मन्दिर में नवग्रह की आराधना करने के लिये जो कालसर्प योग की सीमा मे आते है एक वस्त्र जो नीचे का होना जरूरी है और केवल पुरुष वर्ग के द्वारा ही पूजा की जाती है,ऊपर का वस्त्र धारण करने के बाद या तो पूजा लगती नही है या वह वस्त्र ही किसी न किसी कारण से कुछ समय मे बरबाद हो जाता है.
बंगाल मे भी दक्षिणेश्वर के पास मे बारह महादेव को शिव के रूप मे और माता काली को केतु के रूप मे प्रस्तुत किया गया है.
कालीघाट मे भी साततल्ला शमशान को राहु और कालीमाता को केतु के रूप मे प्रस्तुत किया गया है।
आसाम के कामाख्या मन्दिर मे भी शिवलिंग का अन्तर्भाग स्थापित करने के बाद उसके अन्दर माता कामाख्या को विराजमान किया गया है.जो भक्त गये होंगे उन्हे जो एक अहसास हुआ होगा वह राह और जो उन्हे द्रश्य हुआ होगा वह केतु के रूप मे माना जा सकता है.
अमरनाथ जाने पर भी बनने वाला शिवलिंग केतु और पहाडों की दुर्गम यात्रा को राहु के रूप मे माना जाता है.
हिमाचल की जितनी भी देवियां है वह केतु के रूप मे दुर्गा के रूप मे पूजी जाती है और उनके द्वारा दी जाने वाली शक्ति को राहु को रूप मे माना जाता है.
(कृपया अपने अधूरे ज्ञान से चलने वाली मान्यताओं के प्रति लोगों की धारणा को समाप्त नही करे,पहले ही धारणाओ और मर्यादाओं को समाप्त करने में अंग्रेजी शासन और पूर्व के शासको ने अपनी कमी नही छोडी है आज के मानव की जो हालत है वह किसी भी प्रकार से शांति दायक नही है जिसे देखो वह अपनी ही धुन मे बहा जा रहा हैमित्रों अगली पोस्ट में हम राहु के साथ अन्य ग्रहों की युतियो के बारे में बात करेंगे

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कालसर्प योग हैं या दोष है क्या है सच क्या है झूठ?

https://youtu.be/rLabGPgeiFU
कालसर्प दोष एक ऐसा योग है या  दुर्योग है जिसका नाम सुनते ही जनमानस में भय व चिंता व्याप्त हो जाती है। साढ़े साती और काल सर्प योग का नाम सुनते ही लोग घबरा जाते हैं. इनके प्रति लोगों के मन में जोड भय बना हुआ है इसका फायदा उठाकर बहुत से ज्योतिषी लोगों को लूट रहे हैं. बात करें काल सर्प योग की तो इसको भी ्कुछ विद्वान इसे सिरे से नकारते हैं, तो कुछ इसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। मेरे देखे दोनों गलत हैं।कालसर्प दोष' को न तो महिमामंडित कर प्रस्तुत करना सही है और न ही इसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित है। शास्त्रों में सर्पयोग के नाम से स्वीकार किया गया है। उसी को ही आजकल काल सर्प का नाम दिया गया है चूंकि राहु को शास्त्रों में 'काल' कहा गया है और केतु को 'सर्प' की संज्ञा दी गई है इसलिए इसका नाम 'कालसर्प'  कहा गया है वराहमिहिर ने अपनी संहिता 'जानक नभ संयोग' में इसका सर्पयोग के नाम से उल्लेख किया है, वहीं 'सारावली' में भी 'सर्पयोग' का वर्णन मिलता है।अधिकांश ग्रन्थों में सर्पयोग की व्याख्या तो मिलती है किन्तु कालसर्प योग की व्याख्या किसी भी मानक ग्रन्थ में नहीं मिलती है।सी पिछली शता‍ब्‍दी के सातवें या आठवें दशक तक के अधिकांश ज्‍योतिषी भी इस योग के बारे में नहीं जानते थे, लेकिन इस योग के हर इंसान पर लागू किए जा सकने वाले फलादेशों ने कुछ ऐसा चमत्‍कार पैदा किया कि बड़ी संख्‍या में लोगों ने इसे मानना शुरू कर दिया।

पिछले कुछ सालों में तो कालसर्प योग (Kaal Sarp Yog) ने तेजी से विकास किया है। अब बाजार में आ रही पुस्‍तकों और कई ज्‍योतिषियों के कारण तो कालसर्प दोष के प्रति काफ़ी गलत धारणा लोगों के अन्दर व्याप्त हो रही हैं,हर कोई हर किसी को किसी न किसी प्रकार से कालसर्प दोष का अधिकारी बना कर पैसा बनाने की जुगत में लगा हुआ है,सबसे पहले राहु और केतु के बारे मे जानना जरूरी है,अगर किसी प्रकार से राहु और के केतु के एक तरफ़ सभी ग्रह आजाते है तो उसके बारे में कह दिया जाता है कि अमुक को कालसर्प दोष है,और हर मर्ज की एक दवा बताते हुऐ कहा जाता है,कालसर्प दोष की शांति करवा लेनी चाहिऐ,शांति के नाम पर पूजा जाप और  और न जाने कहां कहां स्नान और हवन आदि करने के लिये बोला जाता है.लेकिन होता वही है जो होना है,कर्म की गति तो रुकती नही है,राहु और केतु के बारे में जानने के लिये मैं आपको "लालकिताब ज्योतिष" की तरफ़ लिये चलता हूँ,लालकिताब में साफ़ तरीके से लिखा है, कि राहु की सिफ़्त सरस्वती की है,और केतु को गणेशजी की उपाधि दी गयी है,अगर सरस्वती और गणेशजी दोनो खराब है,तो फ़िर विद्या और साधन का महत्व ही नही रह जाता है,क्यों कि सरस्वती को विद्या की देवी कहा गया है,और गणेशजी को साधनों का देवता कहा गया है,गणेशजी को प्रथम पूज्य कहा गया है,हर किसी स्थान पर दैहिक,दैविक,और भौतिक कारणो में साधन के रूप में विद्यमान देवता को अगर बुरी नजर से देखा जाये तो कितना अच्छा है,यह तो कोई अनपढ भी समझ सकता है,दैहिक कारणों में गणेशजी शरीर के अन्दर खाने के समय हाथ के रूप में देखने के लिये आंख के रूप में,पचाने के लिये आंत के रूप में और मल त्याग करने के लिये गुदा के रूप में उपस्थित है,संतान पैदा करने के लिये लिंग और भग के रूप में,सोचने के लिये दिमाग के रूप में,आंखॊं की रक्षा करने के लिये पलक के रूप में सिर में बाल के रूप में,सुनने के लिये कान के रूप में जिंदा रखने के लिये ह्रदय के रूप में और खून में रुधिर कणिका के रूप में विद्यमान हैं,दैहिक कारणों में ही पुत्र के रूप में आगे का वंश चलाने के रूप में,भानजे के रूप में शारीरिक नाम को चलाने के रूप में,ससुराल में साले के रूप में,ननिहाल में नाना और मामा के रूप में विद्यमान है,घर की रखवाली के लिये कुत्ते के रूप में,लिखने के लिये पेन के रूप में,लोगों से संचार व्यवस्था रखने के लिये कम्प्यूटर के रूप में,और कम्प्यूटर में की बोर्ड और माउस के रूप में,टेलीफ़ोन और मोबाइल के रूप में,यू.एस.बी. पोर्ट में कोई भी नया सिस्टम लगाने के रूप में जब गणेशजी हर जगह विद्यमान है,यह सब दैहिक और भौतिक कारणों के अन्दर आजाते है,गाडी में ड्राइवर और टायर ट्यूब के रूप में,चलाते वक्त स्टेयरिंग के रूप में,सरकार में नेता के रूप में,आफ़िस में अधिकारी के रूप में,सडक पर साइनबोर्ड के रूप में,कोरियर कम्पनी में पत्र बांटने के रूप में,गणेशजी की महत्ता तो है ही,इसके अलावा देवताओं में बता ही चुका हूँ,कि वे सर्वपूज्य और प्रथम मान्य है,तो गणेशजी और माता सरस्वती का इतना अपमान क्यों काल सर्प दोष के नाम पर किया जा रहा है,लोग कहते हैं कि शत्रुता के चलते राहु खत्म कर देता है,केतु हाथ पैर तोड देता है,मगर शत्रुता वाले कारण कौन पैदा करता है,राहु केतु तो करने नही आते है न?,अगर आप हिन्दू धर्मालम्बी है,तो आपने भगवान शिव का नाम तो सुना होगा पूजा पाठ भी किया होगा,शिव परिवार को ही लेलो,शिवजी का वाहन नंदी है यानी बैल,और माता भवानी का वाहन है शेर,दोनों के अन्दर कितनी मित्रता है,शेर का भोजन ही बैल है,अब उनके पुत्र गणेशजी को लेलो,उनका वाहन चूहा है और शिवजी के गले में नागों की माला है,नाग का भोजन ही चूहा है,इधर कार्तिकेयजी को लेलो,उनका वाहन है मोर और शिवजी के गले में नाग हैं,मोर का भोजन ही नाग हैं,लेकिन शत्रुता को भी अगर काम में ले लिया जावे तो वह शत्रुता भी फ़ायदा देती है.इसे और अच्छी तरह से समझने के लिये लोहे और तेल का संगम समझना भी उचित होगा,तेल तरल है,लोहा कठोर है,लोहे को लोहे से लडाने के बाद उससे लाखों तरह के काम लिये जाते है,और तरल तेल से लोहे को स्मूथ चलाने के लिये तेल का काम लिया जाता है,तलवार तेज धार रखती है,उसमें मूंठ अगर गोल नही लगाई जावे तो वह चलाने वाला का हाथ ही काट डालेगी,इस तरह से लोहा अगर केतु है,तो तेल राहु है,तलवार अगर राहु है तो उसमे लगी मूंठ केतु है,इसी तरह से बन्दूक अगर केतु है तो उसमे चलने वाली बारूद की गोली राहु है,बिजली का तार अगर केतु है तो उसके अन्दर चलने वाला करेंट राहु है,किताब अगर केतु है तो उसके अन्दर लिखा हुआ राहु है,कम्प्यूटर अगर केतु है तो उसके अन्दर चलने वाले सोफ़्टवेयर राहु है,बैटरी अगर केतु है तो करेंट राहु है,मोबाइल अगर केतु है,तो उसके अन्दर लगी बैटरी राहु है.इस प्रकार से राहु और केतु को समझा जा सकता है.
अकेले राहु केतु कभी परेशान नही करते जैसे
श्यामसुंदर के दो पुत्र है,दोनो की कुन्डली मे काल सर्पदोष है,बडे की कुन्डली में राहु चौथा और केतु दसवां है,राहु के साथ शुक्र भी है और चन्द्रमा भी,केतु के साथ कोई भी नही है,केतु छठे शनि को देख रहा है,इधर राहु चन्द्र और शुक्र का बल लेकर भी शनि को देख रहा है,चन्द्र और शुक्र राहु का बल लेकर केतु से विपरीत हैं,शनि ने अपने धन के त्रिकोण मै बैठ कर (दूसरा,छठा और दसवां भौतिक सम्पदा के लिये देखा जाता है,दूसरा धन है तो छठा रोजाना के कार्य करने और कर्जा दुश्मनी बीमारी के लिये हुज्जत का घर है और दसवां घर कार्य और पिता तथा सरकार के लिये गिना ही जाता है) केतु ने शनि को देखा है,शनि कर्म का कारक है,कर्म भी छठे घर का यानी केवल नौकरी के द्वारा ही धन कमाने का उद्देश्य,केतु टेलीफ़ोन के लिये भी गिना जाता है,टेलीफ़ोन का काम भी किया है,लेकिन शनि ठंडा ग्रह भी है,चालाकी से भरा ग्रह भी है,नीच प्रकृति का ग्रह भी है,कन्या का शनि होने के नाते आजीवन लडकियों के लिये काम करने वाला शनि भी है,शनि और राहु के बीच में गुरु,सूर्य,और बुध भी फ़ंसे है,गुरु जीव है तो सूर्य आत्मा,गुरु जीव है तो बुध बुद्धि,सूर्य बुध दोनो मिलकर सरकारी लखटकिया हैं,मेला,प्रदर्शनी के अन्दर पैदा गिनने का काम भी करते है,कार्य किया तो जायेगा,लेकिन केतु का बल लेकर,अगर साथ में सहायक है तो काम बन्दा कर सकता है,और बिना सहायक के वह बेकार सा ही है,शनि यानी कर्य को सहारा देने के लिये सूर्य पिता के रूप में है,पिता के बाद पुत्र का उदय है,और वह सहायक के रूप में है,सूर्य सरकार है,वह भी समय पर सहायक होगी लेकिन पुत्र के लिये,गुरु शनि को सहारा दे रहा है,गुरु ज्ञान का कारक है जो भी काम किया जायेगा वह ज्ञान का सहारा लेकर किया जायेगा,गुरु और सूर्य पांचवें भाव में विराजमान है,हर काम को मजाक के रूप में किया जायेगा,एम्यूजमेन्ट का सहारा लेकर किया जायेगा,राहु चौथे घर में माता का बल देता है,मकान का बल देता है,पानी का बल देता है,चौथे घर में शुक्र माया नगरी को पैदा करता है,वह माया बिजली की रोशनी की माया हो या बारूद की आतिशबाजी की माया,अथवा राहु यानी बात की सत्यता की माया,वाहन की माया,जानने वाले लोगों की माया,ह्रदय की खूबसूरती की माया,चौथा घर खेत है,खेती में चन्द्र यानी चावल की माया,शुक्र यानी गेंहूं की माया,हरी घास या चरी की माया,राहु चन्द्र मिलकर मन को अशान्त करते है,राहु विद्या और चन्द्र ह्रदय,हमेशा हर बात में विद्या का प्रयोग करने की माया,शुक्र पत्नी है,तो चन्द्र छलिया औरत भी है,एक औरत के द्वारा छलने की माया,राहु पितामह है,और चन्द्र शुक्र मिलकर पितामह के लिये सूचित करते है कि वे भी अपनी पत्नी के यानी दादी के अलावा शुक्र पत्नी तो चन्द्र छलिया औरत से सम्बन्ध या ठगे गये थे,शुक्र खेती है,चौथा घर पानी है,चन्द्र पानी में पैदा होने वाली फ़सल है,यानी खेती में चावल का पैदा होना भी मिलता है,सफ़ेद वस्तुओं का पैदा होना भी मिलता है.राहु खाद है,चन्द्र से सफ़ेद और शुक्र से हरा रखने के लिये,सफ़ेद खाद यानी यूरिया का प्रयोग भी खेती के लिये होता है,राहु बिजली है,चन्द्र पानी है,शुक्र खेती है,तीनो का संगम करने के लिये बिजली से पानी निकालकर खेती करने वाली बातें भी मिलती है,राहु कुआ है,चन्द्र पानी है,शुक्र कच्चा घर भी है,जन्म का स्थान भी यही मिलता है,इस प्रकार से राहु हर जगह से सहायक मिलता है,केतु का काम सहायक होना भी मिलता है,शनि काम और दूसरे भाव के प्रति धन वाले काम,केतु तार है,तो शनि काम है,जातक तार का काम भी जानता है,केतु को चन्द्र देख रहा है,आमने सामने की टक्कर है,सहायक होना केवल पानी के लिये,माता के लिये घर के लिये और जान पहिचान वाले लोगों के लिये,लेकिन राहु को बल मिला,चन्द्र का शुक्र का,पितामह को शुक्र यानी खेती मिली,शुक्र यानी उनकी पत्नी यानी दादी के द्वारा,चन्द्र ने राहु का बल लिया,पितामह ने काफ़ी कुयें बनवाये,पितामह की हैसियत के बारे में भी राहु ने बखान किया,शुक्र और राहु मिलकर मायानगरी बना देते है,चन्द्र अपने घर में विराजमान है,माया नगरी का काम राहु ने दिया तो पितामह ने केतु यानी उस मायानगरी का सहायक बन कर यानी मल्टीनेशनल कम्पनी में ओहदेदार पोस्ट पर रह कर काम किया.इस प्रकार मालुम चलता है कि कभी राहु और केतु मिलकर परेशान नही करते हैं.वाकी अगली पोस्ट
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मंगलवार, 28 जनवरी 2020

राहु केतु का रत्न धारण करना चाहिए या नहीं?Should you wear the gem of Rahu Ketu or not?


राहू केतु का रत्न क्य धारण करना चाहिएया नहीं ? मित्रों सबसे पहले तो एक बात ख्याल में ले कि कोई भी जेमस्टोन जा रत्न ग्रहों को बल देने के लिए होता है ना कि उनकी शांति के लिए कुछ astrologer राहु केतु की शांति के लिए रतन पहना देते हैं हर एस्ट्रोलॉजर रत्न एक्सपर्ट नहीं होता मित्रों यह भी बात आप ध्यान में ले जो एस्ट्रोलॉजर ग्रहों की शांति के लिए रत्न पहना देते हैं उनको रत्नों के बारे में पूरी जानकारी नहीं हैंराहु , केतु दो ऐसे ग्रह है ये  जिस भी राशि में यह विराजमान रहते हैं वहां से पांचवें , सातवें और नौवें स्थान पर अपनी दृष्टि डालते हैं । इस प्रकार से देखा जाए तो कुंडली के बारह भाव में से 8 भावों पर इनका प्रभाव रहता है । केतु को ज्यादा क्रूर ग्रह ना माना जाए परंतु फिर भी राहु  केतु के सामने रहता है और उस पर हमेशा उसकी दृष्टि रहती है अतः केतु के अंदर भी राहु के गुण तो  समाहित हो ही जाते हैं । अब यदि 8 भावों में कहीं भी सूर्य ,  चंद्रमा , मंगल या गुरु पर इनकी दृष्टि पड़ जाए या इनसे युति  बन जाए तो यह ग्रह जिस भाव के स्वामी होते हैं उस भाव से सुख से संबंधित परेशानी देते हैं एवं जिस भाव में युति बनती है उस भाव में भी परेशानी पैदा कर देते हैं  । यदि राहु केतु मेष राशि  ,कर्क राशि , सिंह राशि , वृश्चिक राशि , धनु राशि या  मीन  राशि पर  विराजमान हो जाए  या   इन राशियों पर दृष्टि डालें तो     ये राशि जिस भाव में  रहते है उन भावों के सुख में भी परेशानी हो जाती है ।  इसलिए मेरा मानना है कि बिना कुंडली का विश्लेषण कराए  राहु , केतु का रत्न  कभी भी धारण नहीं करना चाहिए  । राहु  , केतु यदि आप को 20% लाभ देते हैं तो किसी न किसी प्रकार से 80 % नुकसान भी करते हैं । जन्म कुंडली में 12 भाव होते हैं ।इनके स्वामी सूर्य , चंद्रमा ,  मंगल ,  बुध  , गुरु ,  शुक्र एवं शनि के होते हैं  । जीवन  की  समस्या को ठीक करने के लिए इन 7 ग्रहों मे से कारक ग्रहों को रत्न द्वारा  प्रबल करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है तब राहु केतु का रत्न क्यों धरण करें , जिस ग्रह के साथ यजह कनेक्ट होते हैं उनको खराब करते हैं । सूर्य और चंद्र के साथ ग्रहण दोष गुरु के साथ गुरु चांडाल योग मंगल के साथ अंगारक योग शनि के साथ  प्रेतश्राप इसी तरह दूसरे ग्रहों के साथ हुई यह खराबी भी देता है 90 परसेंट लोगों की कुंडली में राहु केतु के कारण परेशानी आती है कुछ 10 परसेंट ऐसी कुंडल में होती है जिनको हम राहु केतु के रत्न धारण करने की सलाह देते है ।् मित्रों राहु केतु दोनों पापी ग्रह हैं। राहु खुफिया पाप तो केतु ज़ाहिरा पाप है तो इनके रत्न सोच समझकर ही पहनने चाहिए कई व्यक्तियों को रत्न धारण करने का शौक होता है। कुछ तथाकथित ज्योतिषी भी उनके इस शौक के लिए उत्तरदायी होते हैं जिनका रत्न विक्रेताओं के साथ बड़ा घनिष्ठ संबंध होता है। मैंने देखा है जब मैं किसी को राहु केतु के रतन रत्न ना धारण करने का परामर्श देता हूं तो उनमें से कुछ आश्चर्यचकित हो जाते हैं वहीं कुछ मायूस हो जाते हैं। सामान्यतः ज्योतिषीगण राशि रत्न, लग्नेश का रत्न, विवाह हेतु गुरू-शुक्र के रत्न धारण करने की सलाह देते हैं। रत्नों के धारण करने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। किसी रत्न को धारण करने से पूर्व उसके अधिपति ग्रह की जन्मपत्रिका में स्थिति एवं अन्य ग्रहों के साथ उसके संबंध का गहनता से परीक्षण करना चाहिए भले ही वे रत्न लग्नेश या राशिपति के ही क्यों ना हों। यह भी देखना आवश्यक है कि जिस ग्रह का रत्न आप धारण कर रहे हैं वह जन्मपत्रिका में किस प्रकार के योग का सृजन कर रहा है या किस ग्रह की अधिष्ठित राशि का स्वामी है। यदि जन्मपत्रिका में एकाधिक रत्नों के धारण की स्थिति बन रही हो तो वर्जित रत्नों का भी पूर्ण ध्यान रखना अति-आवश्यक है। पंचधा मैत्री चक्र के अनुसार ग्रहमैत्री की रत्न धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह सर्वथा गलत धारणा है कि रत्न सदैव ग्रह की शांति के लिए धारण किया जाता है। वास्तविकता इससे ठीक विपरीत है रत्न हमेशा शुभ ग्रह के बल में वृद्धि करने के लिए धारण किया जाता है। अनिष्ट ग्रह की शांति के लिए उस ग्रह के रत्न का दान किया जाता है। कुछ रत्न आवश्यकतानुसार ग्रह शांति के उपरांत अल्प समयावधि के लिए धारण किए जाते हैं जिनका निर्णय जन्मपत्रिका के गहन परीक्षण के पश्चात किया जाता है। अतः रत्न धारण करने से पूर्व अत्यंत सावधानी रखें। किसी विद्वान ज्योतिषी से जन्मपत्रिका के गहन परीक्षण के उपरान्त ही रत्न धारण करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है।समझदार के लिए इशारा ही काफी होता है । इस विषय  से संबंधित लेख लिखने लगे तो बहुत लंबा लेख हो जाएगा इसलिए मैं यहां समाप्त करता हूँ  । मेरे पहले भी रत्नों पर काफी आर्टिकल इस ब्लॉग में आपको पढ़ने को मिल जाएंगे आप उसको जरूर पढ़ें उस से आपको रत्नों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त होगी ।आचार्य राजेश

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