मेष लग्न काव्य: "अग्नि-पुत्र का आत्म-साक्षात्कार"
(शून्य से अनंत तक की एक अमर गाथा)
दृश्य १: महाशून्य का विस्फोट (जन्म और मस्तक का घाव)
अचानक... एक वज्रपात हुआ!
शांति के सीने को चीरते हुए एक 'अग्नि-पुत्र' का जन्म हुआ।
उसने अपनी रक्तिम आंखें खोलीं। उसके ललाट (माथे) पर जन्म से ही एक घाव का निशान था—ईश्वर का दिया हुआ हस्ताक्षर!
उसने ब्रह्मांड की ओर देखा और अपनी पहली हुंकार भरी— "मैं हूँ!" (अहंकार का जन्म)।
विधाता ने आकाश से कहा: "जाओ पुत्र! तुम्हारे पैरों में गति है और भुजाओं में बल। परन्तु याद रखना, तुम 'आरम्भ' हो, अंत नहीं।"
दृश्य २: वाणी का अभिशाप (धन और कुटुम्ब)
अग्नि-पुत्र दौड़ पड़ा। उसे भूख लगी। सामने ही मणियों और रत्नों का ढेर (द्वितीय भाव - वृषभ) लगा था।
उसने जैसे ही उसे पाने के लिए मुंह खोला, उसके मुख से शब्द नहीं, अंगारे निकले।
उसकी वाणी की कठोरता से वे रत्न राख बन गए। उसके अपने ही परिजन उससे डरकर भाग गए।
वह चिल्लाया: "मेरा धन जल क्यों जाता है? मेरे लोग मुझे छोड़ क्यों देते हैं?"
तभी हवाओं में देवी सरस्वती की अदृश्य वाणी गूँजी:
"हे अग्नि-पुत्र! तेरे कंठ में तलवार है। जब तक तू 'मौन' और 'मिठास' को नहीं अपनाएगा, तेरे पास कुबेर का खजाना भी नहीं टिकेगा। तेरी अग्नि जलाने के लिए है, पर घर में दीपक की तरह जलना सीख, दावानल की तरह नहीं।"
दृश्य ३: भुजाओं का एकांत (पराक्रम और भाई)
वह आगे बढ़ा। युद्ध का मैदान आया। उसने देखा कि उसके पीछे कोई सेना नहीं है। जिन भाइयों और मित्रों (तृतीय भाव) के लिए वह लड़ा था, वे सब नदारद थे।
वह घुटनों के बल बैठ गया, "मैं अकेला क्यों हूँ?"
सामने से एक नग्न फकीर (केतु) गुजरा और हंसते हुए बोला:
"मूर्ख! तू शेर है। शेर झुंड में नहीं चलते। तेरी भुजाओं का बल 'मांगने' के लिए नहीं, 'देने' के लिए है। जिस दिन तूने सहारे की उम्मीद छोड़ दी, उस दिन तू एक नहीं, ग्यारह के बराबर होगा।"
अग्नि-पुत्र खड़ा हुआ। उसने आंसू पोंछे और अकेले ही मार्ग बना लिया।
दृश्य ४: काल-भैरव से टक्कर (कर्म और पिता)
दौड़ते-दौड़ते वह एक विशाल, काले पर्वत (दशम भाव - मकर) से जा टकराया।
उसने अहंकार में कहा: "हट जा! मैं मंगल हूँ, मैं तुझे तोड़ दूंगा।"
पर्वत से एक भारी आवाज आई। वहां साक्षात काल-भैरव (शनि) बैठे थे।
काल ने कहा: "वेग से पत्थर नहीं टूटते बालक! यहाँ मेरी सत्ता है। यहाँ 'रक्त' नहीं, 'पसीना' चलता है।"
अग्नि-पुत्र ने प्रहार किया, पर वह खुद लहुलुहान होकर गिर पड़ा (शनि नीच का)।
काल-भैरव ने झुककर उसके कान में अंतिम मंत्र दिया:
"यदि सिंहासन चाहिए, तो पहले सेवक बन। यदि ऊंचाई चाहिए, तो झुकना सीख। जो सूर्य दोपहर में तपता है, उसे भी शाम को ढलना पड़ता है।"
दृश्य ५: दर्पण का टूटना (प्रेम और वियोग)
घायल योद्धा एक सुंदर महल (सप्तम भाव - तुला) में पहुँचा। वहां उसे एक 'प्रतिबिंब' दिखा—उसका साथी, उसका प्रेम।
उसने दौड़कर उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया। "तुम मेरी हो!"
किंतु हाय! उसकी पकड़ इतनी सख्त थी कि उसका साथी दम घुटने से छटपटाया और हाथ छुड़ाकर भाग गया।
अग्नि-पुत्र के हाथ खाली रह गए। वियोग की अग्नि ने उसे जला दिया।
उसने आकाश की ओर देखकर चीत्कार किया: "प्रेम दंड क्यों है?"
उत्तर मिला: "क्योंकि तुमने 'प्रेम' नहीं, 'व्यापार' किया था। तुमने साथी में 'ईश्वर' को नहीं, अपनी 'संपत्ति' को देखा। जब तक तू 'मैं' (Ego) को नहीं मारेगा, 'तू' (Partner) कभी वापस नहीं आएगा। प्रेम स्वतंत्रता है, बंधन नहीं।"
दृश्य ६: अंधेरी गुफा और छाया-युद्ध (मृत्यु और रूपांतरण)
हताश होकर वह एक अंधेरी, सीलन भरी गुफा (अष्टम भाव - वृश्चिक) में घुस गया। उसे लगा कि उसका अंत निकट है।
वहां उसे एक काली छाया दिखी।
अग्नि-पुत्र ने तलवार खींची: "कौन है तू?"
छाया ने अट्टहास किया: "मैं तेरा ही 'पाप' हूँ। मैं तेरा क्रोध हूँ, तेरी काम-वासना हूँ। तू बाहर जीत गया, पर भीतर हार गया।"
अग्नि-पुत्र ने तलवार फेंक दी। वह समझ गया कि लोहे से छाया नहीं कटती।
वह पद्मासन लगाकर बैठ गया। उसने नेत्र बंद किए और भीतर की अग्नि को मूलाधार से उठाया।
जैसे ही उसने अपनी वासना को जलाया, वह काली गुफा प्रकाश से भर गई। वह अब केवल योद्धा नहीं, एक 'योगी' बन चुका था।
दृश्य ७: सोने का जाल (लाभ और त्याग)
गुफा से निकलते ही उसे एक स्वर्ण-कलश (एकादश भाव - कुंभ) दिखा। वह इच्छाओं का कलश था।
परंतु वह कलश एक जादुई जाल में फंसा था। अग्नि-पुत्र ने उसे पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तो जाल ने उसका हाथ जकड़ लिया।
तभी उसे बारहवें भाव (मीन - मोक्ष) की याद आई।
उसने कहा: "मुझे यह नहीं चाहिए। यह जगत के कल्याण के लिए हो।"
जैसे ही उसने "छोड़ा", जाल खुल गया। और आश्चर्य! वह कलश हवा में तैरता हुआ उसके पीछे-पीछे चलने लगा।
उसने जान लिया— "जो मांगता है वो भिखारी, जो छोड़ता है वो अधिकारी।"
अंतिम दृश्य: महाबली का समर्पण (पूर्णता)
यात्रा के अंत में, वह समुद्र तट पर खड़ा था। शरीर पर घाव थे, पर चेहरे पर तेज था।
सामने उसके आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम राम (सूर्य) खड़े थे।
अग्नि-पुत्र के पास अब सब कुछ था—बल, सिद्धि, ज्ञान। वह चाहता तो ब्रह्मांड का राजा बन सकता था।
परंतु उसने अपना मुकुट उतारा। उसने अपनी गदा रखी।
और धीरे से प्रभु के चरणों में बैठ गया।
उसने कहा: "प्रभु! मैं 'मैं' बनकर निकला था, पर अब मैं 'आपका' होकर लौटना चाहता हूँ। मेरा अहंकार ले लो, मुझे सेवा दे दो।"
उसी क्षण, वह साधारण 'मेष' मिट गया।
और वहां से एक 'हनुमान' का उदय हुआ।
एक ऐसा अस्तित्व जो वज्र से भी कठोर था, और फूल से भी कोमल।
उपसंहार (Narrator's Voice)
"तो हे मेष लग्न के जातक! यह कथा किसी और की नहीं, तुम्हारी आत्मा की है।
तुम्हारे माथे का पसीना, तुम्हारे दिल का अकेलापन, और तुम्हारे रिश्तों का टूटना—यह सब तुम्हें तोड़ने के लिए नहीं, तुम्हें 'गढ़ने' के लिए है।
तुम काल-पुरुष के प्रथम स्वर हो।
भटकों मत। लड़ो मत।
बस अपनी 'दौड़' को प्रभु के 'चरणों' पर समाप्त कर दो।
जिस दिन तुम 'दास' बन जाओगे, तीनों लोक तुम्हारे मस्तक पर तिलक करेंगे।"
।। इति मेष लग्न कथा सम्पूर्णम् ।।

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