कहानी: जिज्ञासा और ब्रह्मांड का सत्य
"गुरुजी, मैं बहुत दुविधा में हूँ। ज्योतिष कहता है कि ग्रह हमें प्रभावित करते हैं, विज्ञान कहता है कि वे केवल पत्थर और गैस के गोले हैं, और धर्म उन्हें देवता कहता है। आखिर सत्य क्या है? क्या ये ग्रह हमेशा रहेंगे या सब कुछ मिट जाएगा?"
मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुराहट के साथ कहा— "बैठो, आज मैं तुम्हें वह बात समझाता हूँ जिससे तुम्हारे सारे संशय मिट जाएंगे।"
मैंने खिड़की से बाहर दिख रहे एक मोबाइल टावर की ओर इशारा करते हुए कहा— "देखो, ये ग्रह एक 'टावर' की तरह हैं जो हमें हर क्षण प्रभावित करते हैं।"
वह थोड़ा हैरान हुआ। मैंने विस्तार से समझाना शुरू किया:
"जैसे मोबाइल टावर लोहे का बना एक ढाँचा होता है, वैसे ही यह पृथ्वी, सूर्य और अन्य ग्रह भौतिक पिंड हैं। टावर स्वयं कोई संदेश पैदा नहीं करता, वह तो केवल पीछे से आने वाले अदृश्य सिग्नल्स को हम तक पहुँचाता है। ठीक वैसे ही, ब्रह्मांड की दिव्य शक्तियाँ जिन्हें हम 'देवता' कहते हैं, वे इन ग्रहों के माध्यम से अपनी ऊर्जा हम तक पहुँचाती हैं।"
जातक ने पूछा— "तो क्या ये टावर कभी नष्ट नहीं होंगे?"
मैंने उत्तर दिया— "यही सबसे बड़ा रहस्य है। यह ग्रह मंडल, यह पृथ्वी और हमारा सूर्य, ये सब एक दिन नष्ट होंगे। प्रलय आएगी और सब कुछ शून्य हो जाएगा। लेकिन देवता अमर हैं। प्रलय के बाद जब पुनः सृष्टि निर्मित होगी, तब सूर्य देव वही रहेंगे, केवल वे एक 'नया सूर्य' रूपी शरीर धारण करेंगे और फिर से उनका परिवार (ग्रह) बनेगा। यह क्रम अनादि काल से ऐसे ही चलता आ रहा है।"
वह मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। मैंने बात को और सरल करने के लिए कहा:
"इस अंतर को एक उदाहरण से समझो। दैत्य गुरु शुक्राचार्य को 'मृत-संजीवनी विद्या' आती है, लेकिन आकाश में दिखने वाले 'शुक्र ग्रह' को वह विद्या नहीं आती। विद्या चेतना (देवता) के पास है, जड़ पिंड (ग्रह) के पास नहीं। ग्रह तो बस वह माध्यम है जिससे वह शक्ति तुम तक पहुँच रही है।"
जातक के चेहरे पर अब संतोष की चमक थी। उसने हाथ जोड़कर कहा— "आज समझ आया गुरुजी, कि ग्रह केवल माध्यम हैं, असली शक्ति तो उन दिव्य देवताओं की है जो इन टावरों के जरिए हमारे जीवन को संचालित कर रहे हैं।"
मैंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा— "जब तुम इस अंतर को समझ लेते हो, तब तुम ज्योतिष और विज्ञान दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देखने लगते हो

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