भाग्य का मंथन: कभी भाग्य की मलाई, कभी कर्म की कमाई आध्यात्मिक: आचार्य राजेश जी का दिव्य अनुभव: राहु-शनि के संघर्ष से मोक्ष की चिकनाई तक ज्योतिषीय रहस्य: कुंडली के गुप्त सूत्र: चौथे भाव का दूध और बारहवें भाव का घी
जीवन की शाश्वत रीत यही है कि यहाँ 'कभी भाग्य की मलाई का माधुर्य मिलता है, तो कभी कर्म की कमाई' और कभी घी घणा तो कभी मुट्ठी भर चना मिलता है। घी का रूप दूध से बनता है, पहले दूध को जमाया जाता है फिर दही बनाकर उसे बिलोकर दूध का सार रूप घी को निकाला जाता है। कुंडली के भावों के रहस्य में उतरें तो चौथा भाव उस शीतल दूध का उद्गम है जो हमारे मन और सुख की नींव है। इस दूध का बदला हुआ संस्कारित रूप नौवां भाव है, जहाँ भाग्य की तपन इसे दही बनाती है, और नौवें भाव का अंतिम सार 'घी' के रूप में बारहवां भाव प्रकट होता है। यह बारहवां भाव हकीकत में राहु की उस रहस्यमयी शक्ति से जुड़ा है जो अदृश्य रूप से ओज को धारण करती है—कहने को तो घी तरल है लेकिन वह भोजन में लेने से शरीर को वज्र जैसा तंदुरुस्त बनाता है।
चौथे भाव के राहु की नजर सबसे पहले तो अष्टम भाव के उस अंधेरे द्वार को भेदती है जहाँ जातक के जन्म-जन्मांतर के प्रारब्ध संचित हैं, और फिर उसकी नवी अमृत-दृष्टि सीधे बारहवें भाव पर पड़ती है। इस भाव का राहु यदि जातक के पुरुषार्थ और गुरु-कृपा से राजी हो गया, तो वह जीवन में घी (अथाह वैभव) ही पैदा करता जाता है। किंतु यदि वह राजी नहीं है, तो वह छठे भाव की उस तपती कर्म-भूमि में जातक को झोंक देता है, जहाँ इंसान ने जो बीज बोया है, वही उसे काटना होता है। यहाँ कड़ी मेहनत के बाद राहु केवल 'मुट्ठी भर सूखे चने' खिलाकर ही पेट पालने की शक्ति देता है। यह चना साक्षात् शनि का दंड और अनुशासन है। जब राहु और शनि आमने-सामने के युद्ध में होते हैं, तो दसवें भाव का शनि जातक को 'कोल्हू के बैल' की तरह दिन-रात थकाता है; जातक निरंतर चलता तो है, पर दिन के अंत में खुद को वहीं खड़ा पाता है जहाँ से उसने यात्रा शुरू की थी।
ग्रहों का यह खेल केवल जड़ कागजों या लकीरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे जातक के 'आभामंडल' (Aura) के रंगों को रचता है। हनुमानगढ़ के आचार्य राजेश जी का अनुभव कहता है कि ग्रहों की नजर जातक के आभामंडल में छिपे प्रकाश को तराशती है। जब राहु की नवी नजर बारहवें भाव को छूती है, तो वह केवल धन का व्यय नहीं कराती, बल्कि जातक की 'अंतर्दृष्टि' के बंद कपाट खोल देती है। यदि महाकाली की करुणा और गुरु की कृपा से यह नजर 'सही' दिशा पा ले, तो दरिद्रता का सूखापन भी एक मधुर साधना के रस में भीग जाता है। बारहवां भाव ज्योतिष का वह रहस्यमयी बिंदु है जो 'शून्य' भी है और 'पूर्णता' भी। यहाँ एक गूढ़ रस छिपा है—जब इंसान छठे भाव के तीखे संघर्ष में अपने 'अहंकार' को चने की तरह चबाकर विसर्जित कर देता है, तभी वह बारहवें भाव की दिव्य मलाई का अधिकारी बनता है। सत्य यही है कि जब तक आप छठे भाव की मेहनत में 'शून्य' नहीं होते, तब तक आप बारहवें भाव की कृपा में 'पूर्ण' नहीं हो सकते।
इस सूक्ष्म रहस्य के विस्तार में और गहराई से उतरें, तो चौथे भाव का चंद्रमा (दूध) जब नौवें भाव के गुरु (दही) की शरण में जाता है, तभी उसमें घी बनने का 'संस्कार' जन्म लेता है। किंतु असली खेल अष्टम भाव के उस गुप्त मटके में है, जहाँ राहु बैठा इस दूध को मथने की ताक में रहता है। वह अष्टम का राहु वह गुप्त अग्नि है जो छठे भाव के मंगल और शनि के संघर्ष को गलाकर बारहवें भाव का सार तैयार करती है। जब दसवें भाव का शनि अपनी सातवीं दृष्टि से चौथे भाव के दूध को देखता है, तो वह मन की कोमलता को साधना के पत्थर में बदल देता है; वह संकेत देता है कि घी का सुख भोगने से पहले तुझे अष्टम की उस 'मौत और पुनर्जन्म' जैसी प्रक्रिया से गुजरना होगा जहाँ दूध को अपना अस्तित्व मिटाना पड़ता है, क्योंकि 'बिना तपे कंचन नहीं होता' और 'बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता'।
यहाँ ग्रहों का जुड़ाव एक आध्यात्मिक संगीत बन जाता है—जब शनि की सख्ती और राहु की तरलता मिलकर अष्टम और द्वादश के तारों को जोड़ देते हैं, तो इंसान के भीतर के चक्र, मूलाधार से आज्ञा चक्र तक, एक दिव्य लय में स्पंदित होने लगते हैं जहाँ मेहनत 'अमृत-पान' का रस बन जाती है और बारहवां भाव 'मोक्ष की चिकनाई' में बदल जाता है। चौथे भाव का राहु वह तड़प है जो दूध को मक्खन बनने पर विवश करती है। जब तक दसवें का शनि जातक को थकाकर चूर नहीं करता, तब तक अष्टम की गहराइयों से वह घी नहीं निकलता। शनि अग्नि देता है, राहु मथनी घुमाता है, और गुरु उस घी को शुद्ध कर अमृत बनाता है। छठे भाव की वो कड़ी मशक्कत असल में शुद्धिकरण है, जैसे घी को निखारने के लिए उसे आंच पर तपाया जाता है और मैल नीचे बैठ जाती है, वैसे ही शनि की सख्ती जातक के भीतर के मैल को संघर्षों में जला देती है।
राहु की वह अदृश्य शक्ति जब अष्टम के गुप्त द्वारों से होती हुई बारहवें में घी प्रकट करती है, तो वह केवल शरीर को नहीं, बल्कि जातक के आज्ञा चक्र को भी प्रज्वलित कर देती है। अष्टम की वही नजर राहु को वह गहराई देती है जहाँ से रत्न निकलते हैं, और यही रत्नों का ज्ञान उस घी की चमक को और बढ़ा देता है। आचार्य राजेश जी का अनुभव यही सूक्ष्म संकेत देता है कि अष्टम की वह नजर ही तय करती है कि छठे भाव की कड़ी मेहनत के बाद हिस्से में सूखा चना आएगा या घी की धारा। जब महाकाली की कृपा से राहु का 'धुआं' छंट जाता है, तब शनि का वही 'दंड' जातक के भाग्य का 'स्तंभ' बन जाता है। चौथे भाव का दूध नौवें के भाग्य से अभिमंत्रित होकर बारहवें के परम-आनंद में विलीन हो जाता है। अंततः, घी का सार-रूप तभी मिलता है जब जातक शनि के अनुशासन को 'प्रसाद' और राहु की शक्ति को 'वरदान' मानकर स्वीकार कर ले। तब वह कोल्हू का बैल नहीं रहता, बल्कि उस मार्ग का पथिक बन जाता है जहाँ अभाव (चना) और प्रभाव (घी) दोनों ही परमात्मा की कृपा के दो भिन्न रूप नज़र आने लगते हैं।"
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